आज ए. के. रॉय की पुण्यतिथि है. आज उन्हें याद करते हुए उनकी किताब ‘New Dalit Revolution’ का एक पन्ना सामने है. इस पन्ने पर रॉय साहब एक ऐसा सवाल छोड़ गए हैं, जो आज भी उतना ही बेचैन करता है, क्रांतिकारी पार्टी आखिर बनती कैसे है और क्रांति करेगा कौन?
रॉय साहब लिखते हैं कि क्रांतिकारी पार्टी न ऊपर से टपकती है और न किसी दूसरे देश से आयात होकर आती है. वह सामाजिक संघर्षों के बीच तब पैदा होती है, जब क्रांतिकारी दर्शन उस क्रांतिकारी वर्ग तक पहुंचता है, जो उत्पादन से जुड़ा है. यहीं ए. के. रॉय उस विरोधाभास पर चोट करते हैं, जो आज भी हमारे समाज और वाम राजनीति के सामने खड़ा है.
हमारे यहां क्रांति की बात करने वाले बहुत मिल जाएंगे. झोले में कम्युनिस्ट घोषणापत्र, पार्टी संविधान और कार्यक्रम लेकर चौक-चौराहों और चाय की दुकानों पर क्रांति की अंतहीन बहस करने वाले भी मिल जाएंगे. उनके पास मार्क्स है, लेनिन है, सिद्धांत है, क्रांति की शब्दावली है और दुनिया बदलने का पूरा नक्शा भी. लेकिन जिनके श्रम से यह दुनिया चलती है, कई बार क्रांति का वह दर्शन उन्हीं तक नहीं पहुंचता.
खदान में उतरकर कोयला निकालने वाला मजदूर, खेत में अन्न पैदा करने वाला किसान, जंगल-जमीन से अपना जीवन रचने वाला आदिवासी, कारखानों में मशीनें चलाने वाला श्रमिक अपने पसीने से शहर खड़ा करने वाला मेहनतकश दलित-पिछड़ा समाज. हर कदम पर शोषण झेलने वाली महिलाएं. यही वह विशाल उत्पादक वर्ग है, जिसके श्रम और मेहनत के बिना व्यवस्था का पहिया एक दिन भी नहीं घूम सकता.
फिर सवाल उठता है कि जिस वर्ग के पास दुनिया चलाने की ताकत है, अगर उसी के पास दुनिया बदलने का विचार नहीं पहुंचेगा, तो क्रांति करेगा कौन?
यही ए. के. रॉय की राजनीति का केंद्रीय सवाल था. शायद इसीलिए उन्होंने क्रांति को केवल किताबों में नहीं खोजा. उन्होंने उसकी जमीन कोयला खदानों, मजदूर बस्तियों, खेतों, गांवों और आदिवासियों के संघर्षों में तलाश की.
वे संसद तक पहुंचे, लेकिन उनकी राजनीति का केंद्र संसद नहीं, संघर्ष करती जनता रही. वह मजदूर जिसके शरीर पर कोयले की कालिख थी, वह किसान जिसके हाथ मिट्टी से सने थे और वह आदिवासी जो अपनी जमीन, जंगल और अस्तित्व के लिए लड़ रहा था. इसीलिए रॉय साहब की यह बात आज भी बेचैन करती है.
आज दलित, आदिवासी, पिछड़े, किसान और मजदूर हर राजनीतिक भाषण में हैं. उनके नाम पर गठबंधन बनते हैं, समीकरण बनते हैं, घोषणापत्र लिखे जाते हैं और चुनाव जीते-हारे जाते हैं.
लेकिन असली सवाल है कि क्या उन्हें सिर्फ वोट में बदला जा रहा है, या उन्हें अपने वर्ग, अपने अधिकार और अपनी सामूहिक ताकत की चेतना से भी लैस किया जा रहा है?
ए. के. रॉय शायद इसी फर्क को समझाना चाहते थे. क्रांति कोई तैयार फार्मूला नहीं है, जिसे किताब से निकालकर समाज पर लागू कर दिया जाए. क्रांति तब जन्म लेती है, जब विचार संघर्ष से मिलता है, सिद्धांत श्रम से मिलता है और मेहनतकश अपनी ताकत पहचानकर अपने संघर्ष का नेतृत्व खुद करना शुरू करता है.
इसलिए क्रांतिकारी होने का अर्थ सिर्फ मार्क्स को पढ़ लेना या क्रांति पर शानदार भाषण देना नहीं है.
असली काम विचार को झोले से निकालकर खदान तक ले जाना है. किताब से निकालकर खेत तक. सेमिनार से निकालकर मजदूर बस्ती तक. नारे से निकालकर संघर्ष तक. और राजनीति को नेताओं के दरवाजे से निकालकर मेहनतकश जनता के हाथों तक पहुंचाना है. क्योंकि सवाल आज भी जिंदा है कोयला मजदूर निकालता है.अनाज किसान उगाता है. कारखाना मजदूर चलाता है. जंगल आदिवासी बचाता है. सड़कें, मकान और शहर मेहनतकश बनाता है.
जब देश बनाने वाले हाथ ये हैं, तो देश की दिशा तय करने की ताकत उनके हाथों में क्यों नहीं है? जिस दिन उत्पादन करने वाला वर्ग इस सवाल को खुद पूछना शुरू करेगा, अपनी ताकत पहचानेगा और क्रांतिकारी विचार मेहनतकशों के वास्तविक संघर्ष से जुड़ेगा उस दिन क्रांति पर चाय की दुकानों में बहस कम होगी और जमीन पर इतिहास ज्यादा लिखा जाएगा.
आज ए. के. रॉय की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करने का अर्थ सिर्फ श्रद्धांजलि देना नहीं है. उनके छोड़े हुए इन सवालों को जिंदा रखना भी है. क्योंकि ए. के. रॉय उस राजनीति की संभावना का नाम थे, जहां इतिहास बनाने वाले मेहनतकश हाथ ही इतिहास बदलने की ताकत भी अपने हाथों में लें.
लाल सलाम कॉमरेड, वर्तमान ने आपकी बातों को बहुत कम समझा, उम्मीद है इतिहास जरूर न्याय करेगा.
(सचिन झा शेखर, लेखक पत्रकार हैं, इंडियन कॉमरेड एके रॉय, हीरो ऑफ ग्राउंड पॉलिटिक्स नामक किताब के लेखक हैं )
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