विजय उरांव
शरीर में दर्द या बुखार होने पर हम अक्सर तुरंत डॉक्टर के पास पहुंच जाते हैं, लेकिन जब मन बेचैन रहता है, लगातार तनाव महसूस होता है या बिना किसी स्पष्ट कारण के घबराहट होती है, तो कई बार इसे सामान्य परेशानी या कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. समाज में मानसिक बीमारी को लेकर बनी धारणाएं, जागरूकता की कमी और इलाज की सीमित उपलब्धता के कारण बड़ी संख्या में लोग मदद लेने से बचते हैं. इसका असर उनकी पढ़ाई, नौकरी, पारिवारिक संबंधों और रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है.
शहरों से लेकर भारत के अंतिम हिस्से यानी गांव तक मानसिक रोग पैर पसार चुका है. शहरी लोगों का रोग कह कर टाल देने वाली समस्या से उबरने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसकी तह तक जाने की पहल की. जो आंकड़ा सामने आया, वो बेहद चिंतित करने वाला है.
बीते 31 जुलाई 2026 को एआईएमएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने संसद में इसको लेकर सवाल किया था. जवाब में स्वास्थ्य राज्यमंत्री प्रताप राव जाधव ने मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के हवाले से बताया कि भारत के 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लगभग 10.6 प्रतिशत लोगों में किसी न किसी मानसिक विकार की मौजूदगी पाई गई थी.
दूसरी जो अहम जानकारी उन्होंने दी, वो और चौंकाने वाला था. मंत्री ने स्वीकार किया कि इसमें से 70 से 92 प्रतिशत लोगों को मानसिक रोग के इलाज की सुविधा नहीं मिल पाती है. बता दें, यह सर्वे नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंस के द्वारा 2024-26 में किया गया था.
हर साल 10 अक्टूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है. इसका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाना और लोगों को जरूरत पड़ने पर पेशेवर मदद लेने के लिए प्रोत्साहित करना है.
इस मौके पर रांची स्थित रिनपास के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सिद्धार्थ सिन्हा ने मानसिक बीमारी और सामान्य तनाव के बीच अंतर, इलाज में आने वाली बाधाओं, चेतावनी के लक्षणों और झारखंड में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति से जुड़े पांच अहम सवालों के जवाब दिए.
सामान्य तनाव और मानसिक बीमारी में क्या है अंतर?
डॉ. सिद्धार्थ सिन्हा के मुताबिक, रोजमर्रा की जिंदगी में परीक्षा, नौकरी, आर्थिक स्थिति या पारिवारिक समस्याओं के कारण तनाव होना सामान्य है. परिस्थितियों में सुधार होने या समय बीतने के साथ यह तनाव कम भी हो सकता है. लेकिन जब उदासी, निराशा, घबराहट या दूसरी परेशानियां लंबे समय तक बनी रहें और व्यक्ति के सामान्य जीवन को प्रभावित करने लगें, तो उन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
मानसिक बीमारी की स्थिति में व्यक्ति की पढ़ाई, कामकाज, रिश्तों और दैनिक गतिविधियों पर गंभीर असर पड़ सकता है. कई बार व्यक्ति के लिए अपनी परेशानी को संभालना भी मुश्किल हो जाता है. हालांकि, सामान्य तनाव और मानसिक विकार के बीच अंतर केवल लक्षणों की अवधि के आधार पर तय नहीं किया जा सकता. इसके लिए व्यक्ति की स्थिति, लक्षणों की गंभीरता और उनके दैनिक जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन जरूरी है.
अगर उदासी, निराशा, चिड़चिड़ापन या अन्य परेशानियां लगातार बनी रहें और जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होने लगे, तो मनोचिकित्सक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए.
मानसिक परेशानी होने पर भी लोग इलाज क्यों नहीं कराते?
डॉ. सिन्हा के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज में सामाजिक सोच एक बड़ी बाधा है. कई लोग मानसिक बीमारी को कमजोरी या नाकामी समझते हैं. उन्हें डर रहता है कि अपनी परेशानी बताने पर परिवार, दोस्त या समाज उनके बारे में क्या सोचेंगे. इस कारण वे अपनी स्थिति छिपाते हैं और समय पर मदद नहीं लेते.
जागरूकता की कमी भी एक बड़ी समस्या है. बहुत से लोग मानसिक बीमारी के शुरुआती लक्षणों को पहचान नहीं पाते. कुछ लोग चिकित्सकीय मदद लेने के बजाय झाड़-फूंक या अंधविश्वास का सहारा लेते हैं. कई मामलों में परिवार भी परेशानी को गंभीरता से नहीं लेता और व्यक्ति को अपनी स्थिति के लिए जिम्मेदार ठहराता है.
इसके अलावा, सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में मनोचिकित्सकों और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, इलाज के खर्च को लेकर चिंता और विशेषज्ञों तक पहुंचने में होने वाली कठिनाइयां भी उपचार में देरी की वजह बनती हैं. इन बाधाओं को दूर करने के लिए जागरूकता बढ़ाने के साथ मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को आम लोगों के करीब पहुंचाना जरूरी है.
किन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए?
डॉ. सिन्हा के मुताबिक, कुछ बदलाव ऐसे हैं जिन पर व्यक्ति और उसके परिवार को विशेष ध्यान देना चाहिए. इनमें लंबे समय तक उदास या निराश रहना, सामान्य से अधिक चिड़चिड़ापन, नींद में बदलाव, भूख कम या ज्यादा लगना और उन गतिविधियों में रुचि खत्म हो जाना शामिल है, जिन्हें व्यक्ति पहले पसंद करता था.
बिना स्पष्ट कारण के बार-बार डर या घबराहट महसूस होना, लोगों से दूरी बनाने लगना, रोजमर्रा के कामों में परेशानी होना और शराब या अन्य नशीले पदार्थों का सेवन बढ़ जाना भी ध्यान देने योग्य संकेत हैं. यदि ऐसे लक्षण लगातार बने रहें या व्यक्ति की सामान्य जिंदगी प्रभावित करने लगें, तो विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए.
आत्महत्या या खुद को नुकसान पहुंचाने के विचार आने पर दो सप्ताह तक इंतजार नहीं करना चाहिए. ऐसी स्थिति में तत्काल पेशेवर मदद लें, व्यक्ति को अकेला न छोड़ें और जरूरत पड़ने पर नजदीकी अस्पताल के आपातकालीन विभाग में पहुंचें.
झारखंड में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
डॉ. सिन्हा के अनुसार, झारखंड में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ बनाने की जरूरत है. जिलों और दूरदराज के इलाकों में मनोचिकित्सकों तथा विशेषज्ञ सेवाओं की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती है. ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी और स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंचने में होने वाली कठिनाइयां भी समय पर इलाज मिलने को प्रभावित करती हैं.
रांची स्थित रिनपास जैसे संस्थान मानसिक स्वास्थ्य उपचार और विशेषज्ञों के प्रशिक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. हालांकि, राज्य के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोगों के लिए विशेषज्ञ तक पहुंचना हमेशा आसान नहीं होता. ऐसे में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना जरूरी है.
मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की शुरुआती पहचान, प्राथमिक स्तर पर परामर्श और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ के पास भेजने की व्यवस्था बेहतर होने से लोगों को समय पर इलाज मिल सकता है. इसके लिए स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण और आम लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने पर भी ध्यान देना होगा.
टेली-मानस पर 47 लाख से ज्यादा कॉल, सेवा का हुआ विस्तार
मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार ने 10 अक्टूबर 2022 को टेली-मानस कार्यक्रम शुरू किया था. इसके तहत 24 घंटे मुफ्त मानसिक स्वास्थ्य सहायता के लिए 14416 हेल्पलाइन उपलब्ध कराई गई है. 10 अक्टूबर 2024 को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के मौके पर इसकी मोबाइल ऐप और वीडियो कंसल्टेशन सुविधा भी शुरू की गई.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, 27 जुलाई 2026 तक हेल्पलाइन पर 42 लाख से ज्यादा कॉल संभाली जा चुकी थीं. देश के 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 53 टेली-मानस सेल स्थापित किए गए थे और सेवा 20 भाषाओं में उपलब्ध थी. सरकार ने काउंसलरों और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की भर्ती, प्रशिक्षण तथा अस्पतालों से मरीजों को जोड़ने की व्यवस्था मजबूत करने की बात भी कही है.

