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    Home»जोहार ब्रेकिंग»66 साल का विश्वास, लाखों छात्रों के सपनों का आधार बना रांची विश्वविद्यालय
    जोहार ब्रेकिंग

    66 साल का विश्वास, लाखों छात्रों के सपनों का आधार बना रांची विश्वविद्यालय

    Muskan ChoudharyBy Muskan ChoudharyJuly 12, 2026Updated:July 13, 2026No Comments5 Mins Read12
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    रांची विश्वविद्यालय
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    हर विश्वविद्यालय की अपनी एक इमारत होती है, लेकिन कुछ संस्थानों की असली पहचान उनकी दीवारों से नहीं, बल्कि वहां से निकले लाखों लोगों की उपलब्धियों से बनती है. रांची विश्वविद्यालय भी ऐसी ही एक संस्था है. 12 जुलाई 1960 को शुरू हुआ यह सफर आज 66 साल पूरे कर चुका है. इन वर्षों में यहां से निकले डॉक्टर, वैज्ञानिक, न्यायाधीश, शिक्षक, खिलाड़ी, प्रशासक, पत्रकार और राजनेता देश-दुनिया में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं.

    आज रांची विश्वविद्यालय सिर्फ डिग्री देने वाला संस्थान नहीं, बल्कि झारखंड के सामाजिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक विकास का एक मजबूत आधार बन चुका है. बदलते समय के साथ इसने खुद को भी बदला और हर चुनौती के बावजूद अपनी साख बनाए रखी.

    1960 में हुई शुरुआत, दक्षिण बिहार का सबसे बड़ा शिक्षा केंद्र बना

    12 जुलाई 1960 को तत्कालीन बिहार सरकार के एक्स्ट्राऑर्डिनरी गजट के जरिए रांची विश्वविद्यालय की स्थापना हुई. शुरुआती दौर में इसके अधीन दक्षिण बिहार के अधिकांश कॉलेज थे. उस समय उच्च शिक्षा के लिए यह सबसे बड़ा केंद्र माना जाता था.

    वर्ष 2000 में झारखंड राज्य बनने के बाद कई नए विश्वविद्यालय बने, लेकिन रांची विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा और महत्व बरकरार रहा. आज भी यह राज्य के सबसे पुराने और सबसे बड़े विश्वविद्यालयों में शामिल है.

    चुनौतियां भी आईं, लेकिन हर बार मजबूत होकर उभरा विश्वविद्यालय

    66 वर्षों के सफर में विश्वविद्यालय ने कई उतार-चढ़ाव देखे. छात्र संघ चुनाव, छात्र आंदोलन, कुलपति नियुक्ति को लेकर विवाद, सत्र में देरी, परीक्षा और रिजल्ट में विलंब जैसी समस्याएं समय-समय पर सामने आती रहीं. वित्तीय संसाधनों की कमी और आधारभूत ढांचे को मजबूत करने की चुनौती भी लंबे समय तक बनी रही.

    इसके बावजूद हर दौर में सुधार की कोशिशें हुईं. पिछले कुछ वर्षों में ऑनलाइन नामांकन, डिजिटल परीक्षा प्रणाली, ई-गवर्नेंस, छात्र सेवाओं का डिजिटलीकरण, NAAC मूल्यांकन और नई शिक्षा नीति (NEP) के अनुरूप पाठ्यक्रमों में बदलाव जैसे कदम उठाए गए. इससे विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पहले की तुलना में अधिक पारदर्शी और आधुनिक बनी.

    10 विभागों से शुरू हुआ सफर, आज 67 कॉलेज और 30 पीजी विभाग

    स्थापना के समय विश्वविद्यालय में केवल 10 पीजी विभाग, 20 संबद्ध कॉलेज और एक कॉन्स्टिट्यूएंट कॉलेज था. आज इसके अधीन 67 संबद्ध संस्थान संचालित हैं. इनमें 19 डिग्री कॉलेज, 19 कॉन्स्टिट्यूएंट कॉलेज, 29 बीएड कॉलेज और 19 नर्सिंग कॉलेज शामिल हैं.

    इसके अलावा 30 पीजी विभाग, 26 वोकेशनल कोर्स, मैनेजमेंट संस्थान, फिल्म मेकिंग एंड जर्नलिज्म विभाग, लॉ इंस्टीट्यूट, योग विभाग और नौ जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के विभाग संचालित हो रहे हैं.

    राज्य का पहला कम्युनिटी रेडियो ‘90.4 एफएम रेडियो खांची’ भी इसी विश्वविद्यालय के पास है. कोरोना काल में यह विद्यार्थियों के लिए पढ़ाई का महत्वपूर्ण माध्यम बना.

    शहीद चौक से मोराबादी तक बदली विश्वविद्यालय की तस्वीर

    रांची विश्वविद्यालय की शुरुआत शहीद चौक स्थित छोटे से परिसर से हुई थी. आज मोराबादी कैंपस आधुनिक सुविधाओं से लैस एक बड़े शैक्षणिक केंद्र के रूप में विकसित हो चुका है. यहां बहुउद्देशीय भवन, आधुनिक परीक्षा भवन और अधिकांश विभागों के अपने भवन हैं.

    विश्वविद्यालय ने खेलों में भी अपनी अलग पहचान बनाई है. हॉकी, तीरंदाजी, एथलेटिक्स और क्रिकेट में यहां के खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर झारखंड का नाम रोशन किया है. टोक्यो ओलंपियन निक्की प्रधान, सलीमा टेटे और तीरंदाज मधुमिता कुमारी इसकी प्रमुख मिसाल हैं. वर्तमान में विश्वविद्यालय में करीब 1.36 लाख विद्यार्थी अध्ययनरत हैं.

    पूर्व छात्रों ने देश-दुनिया में बनाई अलग पहचान

    रांची विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों में झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास, केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी, पूर्व लोकसभा उपाध्यक्ष करिया मुंडा, बिहार विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह और भारतीय क्रिकेट के दिग्गज महेंद्र सिंह धोनी जैसे नाम शामिल हैं.

    न्यायपालिका में भी विश्वविद्यालय का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. पूर्व छात्र न्यायमूर्ति एम. वाई. इकबाल सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहे. इसके अलावा विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र प्रशासन, चिकित्सा, शिक्षा, शोध, पत्रकारिता और विज्ञान के क्षेत्र में देश और विदेश में अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

    66 वर्षों में 44 कुलपति, अब भविष्य पर फोकस

    विश्वविद्यालय के 66 वर्षों के इतिहास में अब तक 44 कुलपति अपनी सेवाएं दे चुके हैं. वर्तमान कुलपति अजीत कुमार सिन्हा का कहना है कि विश्वविद्यालय शिक्षा, शोध और नवाचार के क्षेत्र में लगातार नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है.

    जनसंपर्क पदाधिकारी स्मृति सिंह और छात्र कल्याण संकायाध्यक्ष (डीएसडब्ल्यू) का भी कहना है कि संस्थान हमेशा विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को प्राथमिकता देता रहा है. शिक्षा, खेल, शोध और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों को मजबूत करने के लिए लगातार नए कदम उठाए जा रहे हैं.

    66 साल का सफर, अब भविष्य की नई उड़ान

    रांची विश्वविद्यालय का 66 वर्षों का सफर सिर्फ एक शिक्षण संस्थान का इतिहास नहीं है. यह उन लाखों विद्यार्थियों की कहानी है जिन्होंने यहां सपने देखे, संघर्ष किया और अपनी मेहनत के दम पर समाज में नई पहचान बनाई. चुनौतियां आज भी हैं, लेकिन आधुनिक शिक्षा, डिजिटल बदलाव और शोध पर बढ़ते फोकस के साथ विश्वविद्यालय नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहा है. यही इसकी सबसे बड़ी ताकत और आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी उम्मीद है.

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