कोलकाता में आयोजित एक बड़े इंटरनेशनल मुकाबले में रिंग के अंदर उतरते ही गोड्डा के एक लड़के ने वो कर दिखाया, जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी. इस युवा मिक्स मार्शल आर्ट्स (MMA) फाइटर ने नेपाल के एक बेहद अनुभवी और तगड़े फाइटर को महज कुछ ही सेकेंड्स में नॉकआउट कर धूल चटा दी. देवगन के इस खतरनाक पंच और पलक झपकते ही मिली धमाकेदार अंतरराष्ट्रीय जीत ने खेल जगत में तहलका मचा दिया है. इस ऐतिहासिक जीत के बाद से ही सोशल मीडिया से लेकर हर तरफ इस 22 साल के युवा फाइटर देवगन मरांडी की चर्चा हो रही है.
झारखंड के एक छोटे से गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा लहराने वाले देवगन की कहानी बेहद दिलचस्प और प्रेरणा देने वाली है. उनकी इस ताजा और शानदार उपलब्धि ने यह साबित कर दिया है कि अगर हौसला बुलंद हो, तो संसाधनों की कमी कभी भी आपके कदमों को रोक नहीं सकती.
टीवी में देख फाइटर बनने का हुआ भूत सवार
देवगन मरांडी गोड्डा जिले के ललमटिया इलाके के पास स्थित ‘नीमा कला’ गांव के रहने वाले हैं. वह एक बेहद साधारण आदिवासी परिवार से आते हैं. उनके पिता सांझला मरांडी ईसीएल (ECL) ललमटिया से एक छोटे कर्मचारी के रूप में रिटायर हुए हैं. परिवार में कुल 7 भाई और 1 बहन हैं, जिनमें देवगन चौथे नंबर पर आते हैं. उनकी शुरुआती पढ़ाई महागामा के बेथल मिशन स्कूल से हुई और इसके बाद वे इंटर की पढ़ाई के लिए भागलपुर चले गए.
हैरानी की बात यह है कि बचपन में देवगन का फाइटिंग या मार्शल आर्ट्स से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था. भागलपुर में पढ़ाई के दौरान उनके रूम पार्टनर केरल के रहने वाले अनुराग थे. अनुराग को फोन और टीवी पर UFC (फाइटिंग का सबसे बड़ा शो) देखने का बड़ा शौक था. अनुराग के साथ रहते-रहते देवगन के सिर पर भी फाइटर बनने का भूत सवार हो गया. उन्होंने अमेरिकी फाइटर ‘जॉन जोंस’ को अपना आदर्श मान लिया और तय कर लिया कि करियर तो इसी फील्ड में बनाना है.
चूंकि एमएमए (MMA) की ट्रेनिंग बहुत ज्यादा महंगी होती है और इसके लिए खास डाइट और सप्लीमेंट्स की जरूरत होती है, जो एक सामान्य परिवार के बजट से बाहर थी. लेकिन देवगन के पिता ने बेटे के इस अनोखे सपने पर पूरा भरोसा जताया. उन्होंने अपनी पेंशन के पैसों से बेटे का सारा खर्च उठाया. देवगन दिल्ली गए और वहां की मशहूर ‘हाउस ऑफ ग्लैडिएटर्स’ एकेडमी में करीब 3 साल तक दिन-रात कड़ा पसीना बहाया. रिंग में उनकी फुर्ती और आक्रामकता को देखकर ही आज उनका नाम ‘द ग्लैडिएटर बीस्ट’ पड़ गया है.
दुनिया के सबसे बड़े मंच पर तिरंगा लहराने का लक्ष्य
कोलकाता में मिली इस बड़ी अंतरराष्ट्रीय जीत के बाद देवगन का हौसला सातवें आसमान पर है. उन्होंने दिखा दिया है कि झारखंड के सुदूर ग्रामीण इलाकों के युवाओं में भी गजब का टैलेंट है, बस उन्हें सही प्लेटफॉर्म और सपोर्ट की जरूरत है. हालांकि, आगे का सफर और भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि इंटरनेशनल लेवल पर बने रहने के लिए लाखों रुपये के फंड और स्पॉन्सरशिप की जरूरत होती है.
देवगन और उनके परिवार को अब झारखंड सरकार और खेल मंत्रालय से बड़ी उम्मीदें हैं. देवगन का कहना है कि उनके पिता ने अपनी पेंशन से अब तक उनका साथ निभाया है, लेकिन अगर आगे उन्हें थोड़ा सरकारी सपोर्ट या कोई अच्छी कॉर्पोरेट स्पॉन्सरशिप मिल जाए, तो वह दुनिया के सबसे बड़े मंच UFC (Ultimate Fighting Championship) में जाकर भारत का तिरंगा लहराना चाहते हैं. देवगन की यह ऐतिहासिक कामयाबी आज झारखंड के हजारों युवाओं के लिए एक बड़ी मिसाल बन चुकी है. सोशल मीडिया पर लोग उन्हें राज्य का असली ‘बाहुबली’ और आने वाले समय का बड़ा स्टार बता रहे हैं.
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