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    Home»जोहार ब्रेकिंग»चमत्कारी या विवादों वाले बाबाः क्या है सद्गुरू कहे जानेवाले जग्गी वासूदेव की कहानी
    जोहार ब्रेकिंग

    चमत्कारी या विवादों वाले बाबाः क्या है सद्गुरू कहे जानेवाले जग्गी वासूदेव की कहानी

    joharlive NetworkBy joharlive NetworkSeptember 3, 2026Updated:September 3, 2026No Comments8 Mins Read3
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    भारत में आध्यात्मिक गुरुओं की कमी नहीं रही है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में जिस व्यक्ति ने आध्यात्मिकता को आधुनिक भाषा, बड़े मंच और सोशल मीडिया की ताकत के साथ दुनिया भर में पहुंचाया, उनमें जग्गी वासुदेव (जिन्हें आज दुनिया सद्गुरु के नाम से जानती है) एक प्रमुख नाम हैं.

    आज सद्गुरु सिर्फ एक योग गुरु नहीं हैं. वे एक लेखक हैं, सार्वजनिक वक्ता हैं, पर्यावरण अभियानों का चेहरा हैं और ईशा फाउंडेशन के संस्थापक हैं. उनकी बातें YouTube और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बड़े पैमाने पर देखी जाती हैं. ईशा फाउंडेशन खुद को मानव कल्याण, योग, आध्यात्मिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाला स्वयंसेवी संगठन बताता है.

    लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने की कहानी अचानक शुरू नहीं हुई थी. इसके पीछे एक कारोबारी युवक, एक आध्यात्मिक अनुभव, योग की साधना और फिर धीरे-धीरे तैयार हुआ एक ऐसा संगठन है, जिसका प्रभाव भारत से बाहर तक फैल गया. और इसी कहानी के दूसरे हिस्से में जमीन, जंगल, हाथियों, आदिवासी अधिकारों और संस्था से जुड़े कुछ लोगों को लेकर उठे विवाद भी आते हैं. इसलिए पहले यह समझना जरूरी है कि जग्गी वासुदेव से सद्गुरु बनने की कहानी आखिर शुरू कहां से हुई.

    डॉक्टर के बेटे से कारोबारी युवक तक

    जग्गी वासुदेव का जन्म 3 सितंबर 1957 को मैसूर, कर्नाटक में हुआ. उनके पिता डॉ. बी. वी. वासुदेव नेत्र रोग विशेषज्ञ थे और मैसूर रेलवे अस्पताल में कार्यरत थे और माता सुशीला वासुदेव गृहिणी थीं. पढ़ाई के बाद उन्होंने पारंपरिक नौकरी का रास्ता नहीं चुना. शुरुआती जीवन में वे कारोबार से जुड़े और पोल्ट्री फार्मिंग समेत अलग-अलग व्यावसायिक गतिविधियां करते रहे.

    उस समय तक वे किसी बड़े आध्यात्मिक संगठन के गुरु नहीं थे. उनकी जिंदगी में निर्णायक मोड़ 1982 में आया. साल 1982 का वह अनुभव, जिसने जिंदगी बदल दी सद्गुरु अपने जीवन के जिस अनुभव को सबसे बड़ा मोड़ बताते हैं, वह 23 सितंबर 1982 का दिन है.

    वे मैसूर की चामुंडी पहाड़ियों पर गए थे. उनके मुताबिक वहां उन्हें एक ऐसा गहरा आध्यात्मिक अनुभव हुआ, जिसने उनके जीवन को बदल दिया. यही वह दौर था जब उन्होंने योग को सिर्फ शारीरिक अभ्यास के रूप में नहीं, बल्कि जीवन और चेतना को समझने के माध्यम के रूप में देखना शुरू किया. इसके बाद उन्होंने योग सिखाना शुरू किया. वे 1982 से योग सिखा रहे हैं.

    शुरुआत छोटी थी. लेकिन धीरे-धीरे उनके योग कार्यक्रमों से जुड़ने वाले लोगों की संख्या बढ़ती गई. यहीं से जग्गी वासुदेव का सफर एक कारोबारी युवक से सार्वजनिक आध्यात्मिक शिक्षक की तरफ मुड़ता है.

    साल 1992 में ईशा फाउंडेशन की शुरुआत

    अगला बड़ा पड़ाव था साल 1992, जब ईशा फाउंडेशन की स्थापना हुई. तमिलनाडु के कोयंबटूर के पास वेल्लियांगिरी पहाड़ियों की तलहटी में बाद में ईशा योग सेंटर विकसित हुआ. यही जगह आगे चलकर सद्गुरु की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बनी. ईशा फाउंडेशन योग, ध्यान और आध्यात्मिक कार्यक्रमों के साथ-साथ ग्रामीण विकास और पर्यावरण से जुड़े अभियानों में भी सक्रिय हुआ.

    यहीं से सद्गुरु का प्रभाव सिर्फ योग की कक्षाओं तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने आध्यात्मिकता को एक ऐसे पैकेज में पेश किया, जिसमें योग, ध्यान, व्यक्तिगत विकास, मानसिक संतुलन और आधुनिक जीवन की समस्याओं पर बातचीत शामिल थी.

    उनके कार्यक्रमों में इनर इंजिनीयरिंग जैसी पहल प्रमुख हुईं. सद्गुरु की शैली ने उन्हें अलग पहचान दी. सद्गुरु की लोकप्रियता का एक कारण उनकी प्रस्तुति की शैली भी रही. वे कठिन आध्यात्मिक अवधारणाओं को रोजमर्रा की भाषा में समझाने की कोशिश करते हैं. वे मंच पर पारंपरिक साधु की तरह सीमित नहीं रहते. मोटरसाइकिल से लेकर बिजनेस, राजनीति, पर्यावरण, स्वास्थ्य और आधुनिक जीवन तक कई विषयों पर सार्वजनिक रूप से बात करते दिखाई देते हैं. यही शैली उन्हें एक पारंपरिक धार्मिक गुरु से अलग सार्वजनिक व्यक्तित्व देती है. धीरे-धीरे उनके कार्यक्रम भारत से बाहर भी पहुंचे और ईशा फाउंडेशन का नेटवर्क अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलने लगा.

    आध्यात्मिक गुरु से पर्यावरण अभियान के चेहरे तक

    सद्गुरु की सार्वजनिक पहचान का दूसरा बड़ा हिस्सा पर्यावरण से जुड़ा है. ईशा फाउंडेशन ने Project GreenHands, Cauvery Calling और बाद में Save Soil जैसे अभियानों को आगे बढ़ाया. साल 2022 में सद्गुरु ने मिट्टी के क्षरण के मुद्दे पर जागरूकता फैलाने के लिए दुनिया के कई हिस्सों की यात्रा की. पर्यावरण के मुद्दे पर उनका सार्वजनिक अभियान उन्हें आध्यात्मिक दायरे से निकालकर वैश्विक पर्यावरण विमर्श तक ले गया.
    इस बीच उन्हें भारत में पद्म विभूषण समेत कई सम्मान मिले. यानी कुछ दशकों में तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी थी. जग्गी वासुदेव, जो कभी कारोबार करते थे, अब सद्गुरु के नाम से दुनिया भर में पहचाने जाने लगे थे. लेकिन इसी बढ़ती लोकप्रियता के साथ ईशा फाउंडेशन के कामकाज और उसके परिसर को लेकर सवाल भी उठने लगे.

    कहानी का दूसरा हिस्सा: जमीन और जंगल

    ईशा योग सेंटर का स्थान इस पूरी कहानी को महत्वपूर्ण बनाता है. यह केंद्र कोयंबटूर के पास वेल्लियांगिरी पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है. आसपास का इलाका जंगल और वन्यजीवों के लिहाज से महत्वपूर्ण है. यहीं से जमीन और निर्माण का विवाद शुरू होता है. आलोचकों और कुछ याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया कि ईशा फाउंडेशन ने जिस क्षेत्र में अपना विशाल परिसर विकसित किया, वहां जमीन की स्थिति क्या थी और निर्माण के लिए आवश्यक अनुमतियां ली गई थीं या नहीं. दूसरी तरफ ईशा फाउंडेशन का कहना है कि उसका परिसर निजी पट्टा भूमि पर बना है और उसने वनभूमि पर अतिक्रमण नहीं किया.

    इस विवाद में 2017 की CAG रिपोर्ट का भी उल्लेख आता है, जिसमें तमिलनाडु के पहाड़ी और हाथी आवास वाले इलाकों में निर्माण तथा Hill Area Conservation Authority से संबंधित अनुमति के मुद्दे उठाए गए थे. ईशा फाउंडेशन ने CAG के निष्कर्षों की अपनी व्याख्या पेश करते हुए आरोपों को खारिज किया है.

    यानी जमीन के मामले में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आज रिकॉर्ड में जमीन किसके नाम है. सवाल यह भी है कि उस जमीन का पुराना रिकॉर्ड क्या है, जमीन का इस्तेमाल कैसे होता था और निर्माण के समय किन सरकारी अनुमतियों की जरूरत थी.

    आदिवासी जमीन का सवाल

    यहीं कहानी का एक और संवेदनशील पहलू सामने आता है—आदिवासी समुदायों के पारंपरिक अधिकार. भारत के कई वन क्षेत्रों में आदिवासी समुदायों का जंगल और जमीन से संबंध आधुनिक राजस्व रिकॉर्ड से बहुत पुराना है. वन अधिकार कानून, 2006 ने ऐसे समुदायों के कुछ व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को कानूनी मान्यता देने का ढांचा बनाया.

    इसलिए किसी जमीन के विवाद में केवल रजिस्ट्री या पट्टा रिकॉर्ड देखना हमेशा पूरी तस्वीर नहीं देता. यह भी देखना पड़ता है कि वहां पहले कौन रहता था, किस जमीन का पारंपरिक रूप से इस्तेमाल करता था, क्या कोई सामुदायिक अधिकार था और सरकारी रिकॉर्ड में उन अधिकारों की क्या स्थिति थी.

    ईशा फाउंडेशन ने आदिवासी जमीन पर कब्जे के आरोपों से इनकार किया है और अपने पक्ष में जमीन के कानूनी रिकॉर्ड का हवाला दिया है. इस मामले में निर्णायक सवाल पुराने राजस्व रिकॉर्ड और संबंधित भूमि दस्तावेजों से ही निकलता है.

    हाथी कॉरिडोर: विवाद का सबसे चर्चित हिस्सा

    जमीन के बाद सबसे ज्यादा चर्चा हाथियों की आवाजाही को लेकर हुई. ईशा योग सेंटर के आसपास का क्षेत्र हाथियों के आवागमन से जुड़ा हुआ है. सरकारी रिकॉर्ड में आसपास के Reserve Forest को elephant habitat के रूप में वर्णित किया गया है.

    आरोप लगाने वालों ने कहा कि बड़े पैमाने पर निर्माण और वहां आने-जाने वाले लोगों तथा वाहनों की संख्या बढ़ने से हाथियों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है और मानव-हाथी संघर्ष का खतरा बढ़ सकता है. लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है. वन विभाग के रिकॉर्ड में यह अंतर किया गया कि आसपास का जंगल हाथियों का habitat है, लेकिन संबंधित क्षेत्र को आधिकारिक रूप से notified elephant corridor घोषित नहीं किया गया था.

    यानी हाथियों का वहां आना-जाना एक तथ्य हो सकता है, लेकिन किसी इलाके का आधिकारिक elephant corridor होना अलग कानूनी स्थिति है. यही अंतर इस विवाद को समझने के लिए महत्वपूर्ण है. ईशा फाउंडेशन भी इसी आधार पर elephant corridor में अतिक्रमण के आरोपों को खारिज करता रहा है.

    दो वयस्क महिलाओं का मामला

    ईशा फाउंडेशन से जुड़ा एक अलग विवाद 2016 में सामने आया, जब दो वयस्क महिलाओं के पिता ने आरोप लगाया कि उनकी बेटियों को Isha परिसर में रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है. मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट के सामने दोनों महिलाओं ने स्वयं कहा कि वे अपनी इच्छा से ईशा फाउंडेशन में रह रही हैं. अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक दोनों महिलाएं वयस्क थीं और उन्होंने किसी तरह के जबरदस्ती या अवैध बंधन से इनकार किया.

    इसके बाद habeas corpus की कार्यवाही समाप्त कर दी गई. यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें शिकायतकर्ता के आरोप के साथ-साथ संबंधित महिलाओं का अपना बयान और अदालत की कार्यवाही, दोनों रिकॉर्ड पर आए.

    बच्चों और स्कूल से जुड़े आरोप

    ईशा फाउंडेशन से जुड़ा एक और अलग मामला 2025 में सामने आया. ईशा होम स्कूल से जुड़े कुछ लोगों के खिलाफ POCSO Act के तहत FIR दर्ज किए जाने की रिपोर्ट सामने आई. शिकायत में एक पूर्व छात्र के साथ कथित यौन दुर्व्यवहार से जुड़े आरोप लगाए गए थे. इस मामले में ईशा फाउंडेशन ने आरोपों को खारिज किया और अपना पक्ष रखा.

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    जग्गी वासुदेव
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