लातेहार में वन अधिकार पट्टा की मांग को लेकर ग्रामीणों ने मंगलवार से ‘डेरा डालो’ अभियान शुरू कर दिया है. झारखंड जनाधिकार मंच के नेतृत्व में वनाधिकार समिति के सदस्य और लाभुक डीएफओ कार्यालय में ही अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए हैं. आंदोलनकारियों का कहना है कि जब तक पात्र लोगों को वन अधिकार पट्टा नहीं दिया जाता, तब तक वे धरना स्थल से नहीं हटेंगे.
आंदोलनकारी अपने साथ खाना बनाने का सामान और राशन लेकर पहुंचे हैं. धरना स्थल पर ही सामूहिक रूप से खाना बनाया जा रहा है. वहीं, ढोल-मांदर के साथ आदिवासी संस्कृति की झलक भी देखने को मिल रही है.
2010-12 से पट्टा नहीं मिलने का आरोप
झारखंड जनाधिकार मंच के हरि कुमार भगत ने आरोप लगाया कि अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के तहत पात्र लोगों को वन भूमि पर उनके अधिकार का पट्टा दिया जाना है. उन्होंने कहा कि निर्धारित अवधि से वन भूमि पर खेती या निवास करने वाले लोगों के दावों को वन अधिकार समिति और ग्राम सभा के माध्यम से आगे बढ़ाया जाता है.
भगत के मुताबिक, लातेहार में वर्ष 2010-12 से आदिवासी और वन निवासियों के कई दावे लंबित हैं. उनका आरोप है कि ग्राम सभा से आने वाले और अनुमंडल स्तर से स्वीकृत रिकॉर्ड को आगे बढ़ाने के बजाय इधर-उधर घुमाया जा रहा है.
उन्होंने कहा कि जिला स्तर पर गठित समिति में उपायुक्त अध्यक्ष होते हैं, जबकि संबंधित विभागों के अधिकारी और जनप्रतिनिधि भी शामिल रहते हैं. उनके मुताबिक, समिति स्तर पर निर्णय होने के बावजूद वन प्रमंडल पदाधिकारी की ओर से पट्टा जारी करने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जा रही है. भगत ने इसे कानून और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताया. उन्होंने दावा किया कि जिले में 2 हजार से अधिक वन पट्टे के मामले लंबित हैं.
परहिया गांव की पड़ताल ने भी सामने रखी वनपट्टा की तस्वीर
यह आंदोलन ऐसे समय शुरू हुआ है, जब जोहार लाइव की 6 अक्टूबर की ग्राउंड रिपोर्ट ‘अंतिम आदिवासी भाग-3’ में लातेहार के मनिका प्रखंड के तेहराई गांव में परहिया समुदाय के परिवारों के वन अधिकार और जमीन से जुड़े हालात सामने आए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, परहिया बहुल इस गांव के 53 घरों में किसी के पास भी वनपट्टा नहीं है. जमीन के अभाव में खेती नहीं हो पाने और रोजगार के लिए बिहार, उत्तर प्रदेश तथा दक्षिण भारत की ओर पलायन की स्थिति भी रिपोर्ट में दर्ज की गई है.
रिपोर्ट में वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन में ग्राम सभा की भूमिका और प्रशासनिक स्तर पर दावों के निपटारे को लेकर सवाल उठाए गए हैं. इसमें झारखंड जनाधिकार महासभा की दिसंबर 2025 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि व्यवहार में वन अधिकार दावों की प्रक्रिया में वन विभाग की भूमिका प्रभावी बनी हुई है.
जोहार लाइव की इसी रिपोर्ट के मुताबिक, झारखंड में अब तक 1.07 लाख से अधिक व्यक्तिगत और 3,700 से ज्यादा सामुदायिक दावे प्राप्त हुए हैं. इनमें करीब 59,800-60,030 व्यक्तिगत और लगभग 2,100 सामुदायिक वनपट्टे वितरित किए गए हैं. यानी बड़ी संख्या में दावे अब भी लंबित हैं.
10-15 साल से दफ्तरों के चक्कर लगा रहे लोग
फादर जार्ज मोनोपोली ने कहा कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 का उद्देश्य जंगल में रहने वाले और निर्धारित अवधि से वहां निवास या खेती करने वाले लोगों को उनके अधिकार देना है. उन्होंने व्यक्तिगत वन अधिकार के साथ ग्राम सभा को सामुदायिक वन संसाधनों पर अधिकार दिए जाने की बात कही.
उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 10-15 वर्षों से कानून का सही तरीके से क्रियान्वयन नहीं हुआ है. उनके मुताबिक, वन विभाग की भूमिका इस प्रक्रिया में प्रभावी रही है, जबकि जिला प्रशासन की ओर से अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई. उन्होंने कहा कि आंदोलन में जिले के 10 प्रखंडों के लोग शामिल हैं और आंदोलनकारी पट्टा लेकर ही लौटने की बात कह रहे हैं.
वहीं मुनेश्वर उरांव ने कहा कि इससे पहले भी एसडीओ कार्यालय के सामने आंदोलन किया गया था. उस समय जल्द काम शुरू होने का आश्वासन दिया गया, लेकिन कई महीने बीतने के बाद भी वन पट्टा नहीं मिला. उन्होंने कहा कि जब तक वन पट्टा नहीं मिलेगा, तब तक आंदोलनकारी धरना स्थल से नहीं हटेंगे.
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