मुस्कान चौधरी
एक ऐसा दौर, जब लड़की का घर से बाहर निकलना सवाल था, पढ़ने की इच्छा बगावत और नौकरी करने का सपना समाज की नजर में बेहयाई माना जाता था. उसी दौर में एक महिला ने न सिर्फ इन बंदिशों को तोड़ा, बल्कि मेडिकल कॉलेज की सीढ़ियां चढ़कर डॉक्टर बनने का सपना भी सच किया.
यह कहानी है कादंबिनी गांगुली की, उस महिला की जिसने 19वीं सदी के भारत में पश्चिमी चिकित्सा की पढ़ाई कर इतिहास रचा. वह कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने वाली पहली महिलाओं में थीं और आगे चलकर भारत की शुरुआती महिला चिकित्सकों में अपना नाम दर्ज कराया.
कादंबिनी की कहानी सिर्फ एक डॉक्टर की कहानी नहीं है. यह उस महिला की कहानी है जिसने शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के लिए बंद दरवाजों को एक-एक करके खोलने की कोशिश की.
भागलपुर की मिट्टी से निकली एक असाधारण लड़की
भागलपुर में जन्मी कादंबिनी का पालन-पोषण चंगी, बारीसाल (अब बांग्लादेश में) में हुआ. उनके बचपन पर बंगाल-क्रांति और नवजागरण का काफ़ी प्रभाव पड़ा. उनके पिता ब्रज किशोर बासु स्कूल में हेडमास्टर थे और साथ ही, ब्रह्म समाज से जुड़े हुए थे. उन्होंने भी अपने जीवनकाल में महिला उत्थान के लिए काफ़ी काम किया और 1863 में भागलपुर महिला समिति की स्थापना की. यह भारत में अपनी तरह का पहला महिला संगठन था.
युवा कादंबिनी ने अपनी औपचारिक शिक्षा बंगा महिला विद्यालय से पूरी की, जिसका विलय आगे चलकर बेथ्युन स्कूल के साथ हो गया था. बेथ्युन स्कूल से कोलकाता यूनिवर्सिटी की दाखिला परीक्षा के लिए बैठने वाली वे पहली प्रतिभागी थीं और फिर साल 1878 में इस परीक्षा को पास करने वाली वे पहली महिला बनीं.

उनकी सफलता ने बेथ्यून कॉलेज को 1883 में एफए (फर्स्ट आर्ट्स) और स्नातक पाठ्यक्रम (ग्रेजुएशन कोर्स) शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया. पूरे ब्रिटिश राज में स्नातक पास करने वाली वे और चंद्रमुखी बासु पहली दो स्नातक थीं.
कादंबिनी और द्वारकानाथ गांगुली
कादंबिनी ने सिर्फ पढ़ाई की रूढ़ियों को नहीं तोड़ा, बल्कि महिलाओं के रास्ते में खड़ी सामाजिक बंदिशों को भी चुनौती दी. उन्होंने अपने शिक्षक और समाज सुधारक द्वारकानाथ गांगुली से शादी की, जो उनसे करीब 20 साल बड़े थे. उनके इस रिश्ते को समाज की मंजूरी आसानी से नहीं मिली. यहां तक कि ब्रह्म समाज के कई नेताओं ने शादी का निमंत्रण तक स्वीकार नहीं किया.
शादी के बाद जब माना जा रहा था कि कादंबिनी की पढ़ाई खत्म हो जाएगी, तब द्वारकानाथ ने उन्हें मेडिकल की पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया. लेकिन एक महिला के डॉक्टर बनने के फैसले का रूढ़िवादी समाज ने जमकर विरोध किया.
विरोध इतना बढ़ा कि ‘बंगबाशी’ पत्रिका के संपादक महेशचन्द्र पाल ने अपने एक कॉलम में उन्हें ‘तवायफ़’ तक कह दिया था. संपादक की इस नीच हरकत से खफ़ा द्वारकानाथ ने उसे न सिर्फ़ खरी-खोटी सुनाई, बल्कि उन्होंने उसे पत्रिका का वह पन्ना निगलने के लिए मजबूर कर दिया जिस पर वह कॉलम लिखा था. साथ ही, उसे छह महीने कारावास और 100 रूपये बतौर जुर्माना भरने की सजा दी गयी.
कादंबिनी ने 1886 में पश्चिमी चिकित्सा की पढ़ाई पूरी की और चिकित्सा के क्षेत्र में काम करने वाली भारत की शुरुआती महिला डॉक्टरों में अपना स्थान बनाया. इसी दौर में आनंदीबाई जोशी ने भी पश्चिमी चिकित्सा में डिग्री हासिल की थी. इसलिए भारतीय महिला चिकित्सा इतिहास में दोनों का नाम बेहद महत्वपूर्ण है.
हालांकि आनंदीबाई का निधन कम उम्र में हो गया और उन्हें लंबे समय तक चिकित्सा सेवा करने का अवसर नहीं मिला. कादंबिनी ने भारत लौटकर चिकित्सा का अभ्यास किया और लंबे समय तक मरीजों का इलाज किया. यही वजह है कि उन्हें भारत की शुरुआती प्रैक्टिस करने वाली महिला चिकित्सकों में विशेष स्थान दिया जाता है. लेकिन कादंबिनी सिर्फ भारत में मिली मेडिकल शिक्षा से संतुष्ट नहीं थीं.
आगे की पढ़ाई के लिए पहुंचीं इंग्लैंड
कादंबिनी ने मेडिकल क्षेत्र में अपनी पढ़ाई को और आगे बढ़ाने का फैसला किया. 1890 के दशक में वह ब्रिटेन गईं और वहां चिकित्सा की उच्च शिक्षा और प्रशिक्षण हासिल किया. एडिनबर्ग, ग्लासगो और डबलिन से उन्होंने चिकित्सा से जुड़े प्रमाणपत्र प्राप्त किए. उस समय किसी भारतीय महिला का अकेले विदेश जाकर मेडिकल प्रशिक्षण हासिल करना अपने आप में असाधारण घटना थी.
भारत लौटने के बाद उन्होंने चिकित्सा सेवा जारी रखी. उन्होंने लेडी डफरिन अस्पताल में काम किया और बाद में निजी चिकित्सा प्रैक्टिस भी की. कादंबिनी अब सिर्फ डॉक्टर नहीं थीं. वह उन हजारों भारतीय महिलाओं के लिए उदाहरण बन चुकी थीं जो शिक्षा और रोजगार के सपने देखना शुरू कर रही थीं.
आठ बच्चों की मां और फिर भी डॉक्टर
कादंबिनी का जीवन आज के नजरिए से देखें तो और भी असाधारण लगता है. वह आठ बच्चों की मां थीं. परिवार की जिम्मेदारियां थीं. घर था. सामाजिक दबाव था. इसके बावजूद उन्होंने अपने पेशे को छोड़ा नहीं. उन्होंने यह साबित किया कि महिला की पहचान सिर्फ पत्नी या मां तक सीमित नहीं है.
वह एक मां हो सकती है, पत्नी हो सकती है और साथ ही डॉक्टर, सामाजिक कार्यकर्ता और सार्वजनिक जीवन की महत्वपूर्ण आवाज भी हो सकती है. उनकी बेटी ज्योतिर्मयी आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ीं. परिवार की अगली पीढ़ी पर भी कादंबिनी के विचारों का प्रभाव दिखाई दिया.
कादंबिनी की लड़ाई सिर्फ मेडिकल कॉलेज तक नहीं थी. उन्होंने महिलाओं के अधिकार, शिक्षा और कामकाजी महिलाओं की स्थिति को लेकर आवाज उठाई. विशेष रूप से महिला मजदूरों के मुद्दों में उनकी दिलचस्पी थी. कोयला खदानों में काम करने वाली महिला मजदूरों की परिस्थितियों को लेकर भी उन्होंने आवाज उठाई. उनका मानना था कि महिला को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता दोनों जरूरी हैं. उनका सार्वजनिक जीवन भी इसी सोच को आगे बढ़ाता था.
कांग्रेस के मंच पर भी महिलाओं की आवाज
उस समय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी लगभग नगण्य थी. लेकिन कादंबिनी ने यहां भी परंपरा को चुनौती दी. 1889 में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बंबई अधिवेशन में शामिल होने वाली शुरुआती महिला प्रतिनिधियों में थीं. इसके अगले वर्ष कलकत्ता अधिवेशन में उन्होंने भाषण दिया. कांग्रेस के मंच से किसी महिला का सार्वजनिक भाषण देना उस दौर में बड़ी घटना थी. कादंबिनी ने यह साबित किया कि महिला सिर्फ दर्शक नहीं हो सकती. वह मंच पर खड़ी होकर अपनी बात भी रख सकती है.
कादंबिनी की सबसे बड़ी विरासतों में से एक यह थी कि उन्होंने अपने लिए रास्ता बनाने के बाद पीछे आने वाली महिलाओं के लिए भी रास्ता तैयार किया. उन्होंने मेडिकल शिक्षा में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई. उनका संघर्ष सिर्फ इस बात के लिए नहीं था कि वह खुद डॉक्टर बनें. वह चाहती थीं कि आने वाली लड़कियों को उनके जैसी लड़ाई न लड़नी पड़े.
आज जब मेडिकल कॉलेजों में बड़ी संख्या में महिला छात्राएं पढ़ती हैं, तब यह समझना जरूरी है कि इस बदलाव की शुरुआत उन महिलाओं के संघर्ष से हुई थी जिन्होंने ऐसे समय में पढ़ाई की जब उनके लिए कॉलेज के दरवाजे तक खुले नहीं थे.
सामाजिक अभियान
उनके विचार हमेशा से प्रगतिशील थे. कई सामाजिक अभियानों का उन्होंने सबसे आगे रहकर सञ्चालन किया. पूर्वी भारत में कोयला खदानों में महिला मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई भी उन्होंने बढ़-चढ़ कर लड़ी. वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 5 वें सत्र में पहले महिला प्रतिनिधिमंडल (वोट देने के लिए चुनी गई महिलाएं) का भी हिस्सा थीं.
जब 1906 में बंगाल विभाजन के चलते देश भी बंटने लगा, तो कादंबिनी ने 1908 में कोलकाता में महिला सम्मेलन का आयोजन किया और इसके अध्यक्ष के रूप में कार्य किया. उसी वर्ष, उन्होंने सत्याग्रह का खुलकर समर्थन किया और कार्यकर्ताओं को समर्थन देने के लिए धन जुटाने के लिए लोगों को संगठित किया.
उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गाँधी को कारावास होने के बाद गठित हुई ट्रांसवाल इंडियन एसोसिएशन के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया और वहां के भारतीयों के लिए भी दिन-रात काम किया.
उन्होंने साल 1915 में सबके सामने कोलकाता मेडिकल कॉलेज के मेडिकल सम्मेलन में महिला छात्रों को दाखिला न देने की रिवायत के खिलाफ़ आवाज़ उठाई. यह उनके भाषण का ही असर था जिसने विश्वविद्यालय के अधिकारियों को अपनी नीतियों में संशोधन करने और सभी महिला छात्रों के लिए अपने दरवाजे खोलने के लिए प्रेरित किया.
1898 में अपने पति की मृत्यु के बाद वे सार्वजानिक जीवन से दूर हो गयीं और फिर धीरे-धीरे उनका स्वास्थ्य भी बिगड़ने लगा. अपनी मृत्यु से एक साल पहले उन्होंने बिहार और उड़ीसा में महिला खनन मजदूरों की मदद के लिए दौरा किया.
उन्होंने कभी भी किसी मेडिकल इमरजेंसी को संभालने से मना नहीं किया. अपनी मृत्यु वाले दिन, 3 अक्टूबर 1923 को भी अपनी मौत से 15 मिनट पहले वे किसी का इलाज करके लौटी थीं. पर बदकिस्मती से, जब तक उन्हें कोई मेडिकल मदद मिलती, वे इस दुनिया को छोड़कर जा चुकी थीं.
महिलाओं के हित और अधिकारों के लिए ताउम्र लड़ने वाली भारत की इस बेटी को कभी नहीं भुलाया जा सकता है!

