कनिका राणा, जोहार लाइव
झारखंड का राज्य प्रशासनिक महकमा इन दिनों अजीब उलझनों के दौर से गुजर रहा है. अधिकारी ऑफिस तो जा रहे हैं, लेकिन केवल अटेंडेंस बना रहे हैं और दिन बीतने का इंतजार करते रहते हैं. ये नए अधिकारी हैं, सो दिन काटने में भी बेचैनी महसूस कर रहे हैं. इन्हें पता नहीं कि आगे क्या करना है. न ही कोई वरीय अधिकारी बताने को तैयार है.
जेपीएससी 11-13 और जेएसएससी के माध्यम से चयनित अभ्यर्थियों को विभिन्न पदों पर बहाल किया गया था. सरकारी आदेश के बाद एक झटके में इनकी नौकरी चली गई थी. लेकिन कोर्ट के स्टे लगाने के बाद इनकी नौकरी आधिकारिक तौर पर गई तो नहीं, लेकिन इन्हें यह नहीं पता है कि अब हर दिन ऑफिस आकर करना क्या है. सचिवालय में जो कर्मी कार्यरत हैं, वो ऑफिस जा रहे हैं, काम भी कर रहे हैं, लेकिन वेतन नहीं मिल रहा.
वैसे अधिकारी जो प्रखंड या अनुमंडल स्तर पर बहाल हुए थे, वो कार्यालय तो जा रहे हैं, लेकिन उनके वरीय अधिकारी उन्हें काम करने की इजाजत नहीं दे रहे हैं. अगर कोई खाद्य आपूर्ति पदाधिकारी है, तो उसके हिस्से का काम किसी दूसरे अधिकारी को सौंप दिया गया है. सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, यह सब बिना किसी लिखित आदेश के हो रहा है. पूरी व्यवस्था मौखिक आदेश पर चल रही है.
क्या है पूरा मामला
दरअसल पूरा मामला बीते 17 अगस्त को आए सीएम हेमंत सोरेन की एक घोषणा से जुड़ा हुआ है. जेपीएससी, जेएसएससी और सीजीएल भर्ती परीक्षा रद्द होने के बाद हाईकोर्ट ने उस रद्द करने वाले आदेश पर ही स्टे लगा दिया.
17 अगस्त को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने खुद प्रेस कॉन्फ्रेंस कर एलान किया कि टीडीपीएल एजेंसी से जुड़ी जेएसएससी सीजीएल समेत तमाम भर्ती परीक्षाएं रद्द की जा रही हैं. यह फैसला 24 दिन से चल रहे छात्र आंदोलन के दबाव में आया था.
18 अगस्त की देर रात कार्मिक, प्रशासनिक सुधार एवं राजभाषा विभाग ने आठ अलग-अलग अधिसूचनाएं जारी कीं. कुल 45 परीक्षाएं इसकी जद में आईं, 22 परीक्षाएं पूरी तरह रद्द, 6 अगले आदेश तक स्थगित, और 17 सीआईडी-एसआईटी जांच के दायरे में आ गई.
जेएसएससी सीजीएल यानी झारखंड सामान्य स्नातक स्तरीय संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा-2023, जो विज्ञापन संख्या 10 और 11/2023 के तहत हुई थी, इसी रद्द सूची में शामिल थी. सभी अधिसूचनाएं कार्मिक विभाग के सचिव प्रवीण कुमार टोप्पो के हस्ताक्षर से जारी हुई और उसी दिन से प्रवीण कुमार टोप्पो छुट्टी पर चले गए.
रद्द होने की खबर आते ही जिन अभ्यर्थियों की बहाली हो चुकी थी, वो प्रोजेक्ट भवन और कार्मिक मंत्रालय के बाहर धरने पर बैठ गए. कई ने कहा कि दूसरी नौकरी छोड़कर यह सरकारी नौकरी जॉइन की थी.
20 अगस्त, गुरुवार को झारखंड हाईकोर्ट ने जेपीएससी की 11वीं से 13वीं सिविल सेवा परीक्षा और फूड सेफ्टी ऑफिसर भर्ती (विज्ञापन संख्या 18/2023) को रद्द करने वाले आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी. इससे करीब 396 से 398 चयनित-नियुक्त अभ्यर्थियों की नौकरी फिलहाल बच गई.
अगले ही दिन, 21 अगस्त शुक्रवार को जेएसएससी सीजीएल कर्मियों ने भी हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की. अदालत ने इस पर भी वही रास्ता अपनाया और नियुक्ति रद्द करने वाली अधिसूचना पर स्टे लगा दिया. कोर्ट ने कर्मियों से एक शपथ पत्र मांगा है, जिसमें लिखना होगा कि आगे जांच में अगर कोई व्यक्तिगत रूप से दोषी पाया गया तो जिम्मेदारी उसी की होगी. अगली सुनवाई 15 सितंबर को तय हुई है.
स्टे के बाद माहौल क्या है?
यहीं से कहानी उलझती है. नाम न छापने की शर्त पर जब मुख्यमंत्री ने रद्द होने का एलान किया, अगले दिन कार्मिक विभाग का आधिकारिक पत्र आ गया. उसमें साफ लिखा हुआ था कि अब नौकरी पर मत जाना. लेकिन कोर्ट ने जब रद्द करने के आदेश पर ही स्टे लगा दिया, तब दूसरी तरफ से वैसा कोई आधिकारिक पत्र नहीं आया जिसमें लिखा हो कि अब पहले की तरह ड्यूटी पर जाया जाए.
नतीजा यह है कि कर्मचारी दफ्तर तो जा रहे हैं, काम भी करते हैं, लेकिन उनकी साइन की हुई फाइल आगे नहीं बढ़ती. कई तो सिर्फ अटेंडेंस लगाने जाते हैं. रिपोर्टिंग अथॉरिटी उन्हें काम करने ही नहीं देती, क्योंकि उनके पास भी कोई आधिकारिक पत्र नहीं पहुंचा है. जिस दिन हाईकोर्ट ने स्टे दिया, उसके अगले ही दिन कार्मिक विभाग के सचिव प्रवीण टोप्पो छुट्टी पर चले गए और तब से छुट्टी पर ही हैं.
झारखंड के धनबाद जिले में एक अलग पैटर्न दिख रहा है. यहां ब्लॉक सेफ्टी ऑफिसर यानी बीएसओ दफ्तर तो जाते हैं, लेकिन उनका प्रभार किसी और अधिकारी को सौंप दिया गया है. किसी ब्लॉक में यह जिम्मेदारी बीडीओ को दे दी गई है, तो कहीं महिला प्रसार पदाधिकारी को. बीएसओ के पास न काम है, न यह कहने का कोई आधार कि पद खाली है, बस दफ्तर जाना, अटेंडेंस लगाना और बैठे रहना.
1 सितंबर- मौखिक निर्देश, कोई कागज नहीं
सूत्रों के मुताबिक रांची के डीसी ने मौखिक रूप से कहा कि कर्मचारी दफ्तर जाएं और ड्यूटी पर लौटें. इसी आधार पर 1 सितंबर से ब्लॉक ऑफिसर फिर ड्यूटी पर जाने लगे. लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि यह निर्देश सिर्फ जुबानी है, किसी लिखित आदेश में नहीं. उसी दिन कर्मचारियों की एक डेलिगेशन टीम कार्मिक विभाग के सचिव प्रवीण टोप्पो से मिलने पहुंची लेकिन मुलाकात नहीं हो सकी. टीम को कहा गया कि फाइल आगे चली गई है.
यानी जब तक कोई आधिकारिक पत्र नहीं आता, तब तक न सैलरी मिलेगी, न साइन की हुई फाइल पर काम होगा.
हर महीने की आखिरी तारीख को सैलरी आ जाती थी, इस बार नहीं आई. बायोमेट्रिक में फिंगरप्रिंट रोज दर्ज हो रहा है, अटेंडेंस पूरी है, फिर भी खाते में पैसा नहीं आया. जिन कर्मियों ने इस सरकारी नौकरी के लिए पहले वाली नौकरी छोड़ी थी, उनके लिए यह सैलरी ही घर चलाने का पूरा जरिया थी. अब सवाल यही है – ईएमआई कौन भरेगा, कमरे का किराया कौन देगा, घर में रोटी कैसे बनेगी?
एक तरफ कोर्ट का स्टे है, दूसरी तरफ कोई आधिकारिक पत्र नहीं. एक तरफ कर्मचारी दफ्तर जा रहे हैं, दूसरी तरफ उन्हें काम करने की इजाजत नहीं. कभी परीक्षा रद्द, कभी स्टे, कभी सचिव की छुट्टी. हर बार फैसला किसी न किसी वजह से टल जाता है. सवाल यही है कि सरकार आखिर किस चीज का इंतजार कर रही है?
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