मुस्कान चौधरी
चतरा की उस जमीन पर आज शायद वैसी कोई हलचल नहीं है, जैसी 1857 में रही होगी. समय ने बहुत कुछ बदल दिया है. रास्ते बदल गए, इमारतें बदल गईं और पीढ़ियां भी बदल गईं. लेकिन इस मिट्टी के भीतर आज भी उस दौर की कहानी दबी है, जब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत करने वालों को पेड़ों पर लटकाकर फांसी दी गई थी.
इसी जमीन पर एक नाम ऐसा भी है, जिसे इतिहास के बड़े पन्नों में वह जगह नहीं मिली, जिसका वह हकदार था. नाम था जयमंगल पांडेय. 4 अक्टूबर 1857. अंग्रेजी हुकूमत के सामने एक भारतीय सैनिक खड़ा था. कुछ दिन पहले तक वह उसी ब्रिटिश सेना की वर्दी पहनता था, जिसके खिलाफ अब वह बगावत कर चुका था. उसके साथ एक और सैनिक था- नादिर अली खां.
दोनों पर अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करने का आरोप था. उस दिन दोनों को फांसी दे दी गई. लेकिन फंदे पर झूलने से पहले वे सिर्फ दो सैनिक नहीं रह गए थे. वे उस विद्रोह का चेहरा बन चुके थे, जिसने छोटानागपुर की धरती पर अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी थी.
कहानी उस सैनिक की, जिसने अपनी ही सेना के खिलाफ बंदूक उठा ली
हजारीबाग के खीरगांव में 1793 में जन्मे जयमंगल पांडेय 1818 में ब्रिटिश सेना में भर्ती हुए थे. उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि अंग्रेजों की सेना में भर्ती हुआ यह युवक एक दिन उसी सत्ता के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व करेगा.
सेना में रहते हुए वे धीरे-धीरे आगे बढ़े और सूबेदार बने. उनकी तैनाती रांची की डोरंडा छावनी में हुई. डोरंडा उस समय अंग्रेजों के लिए सिर्फ एक सैन्य ठिकाना नहीं था. यह छोटानागपुर में उनकी सैन्य ताकत का महत्वपूर्ण केंद्र था और यहीं जयमंगल पांडेय की कहानी ने करवट ली.

उनके साथ गया के रहने वाले नादिर अली खां भी थे. दोनों सैनिक थे, लेकिन 1857 आते-आते उनके सामने एक ऐसा सवाल खड़ा हुआ, जिसने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी-क्या अंग्रेजों की नौकरी करते रहना है या उनके खिलाफ खड़ा होना है? उन्होंने दूसरा रास्ता चुना.
बैरकपुर से उठी आग डोरंडा तक पहुंची
1857 का विद्रोह अचानक पैदा नहीं हुआ था. लंबे समय से जमा असंतोष को बैरकपुर में मंगल पांडेय की बगावत ने एक चिंगारी दी. 29 मार्च 1857 को बैरकपुर में हुई घटना के बाद अंग्रेजों को समझ आने लगा था कि मामला सिर्फ एक सैनिक की बगावत तक सीमित नहीं रहेगा और हुआ भी यही.
मेरठ से दिल्ली, कानपुर से लखनऊ और झांसी से बिहार तक विद्रोह की लपटें फैलती गईं. फिर यह आग छोटानागपुर तक पहुंची. 30 जुलाई 1857 को हजारीबाग की रामगढ़ बटालियन के सैनिकों ने बगावत कर दी. अंग्रेज अधिकारियों ने विद्रोह को दबाने के लिए रांची से सैनिक टुकड़ियां भेजीं. लेकिन अंग्रेजों की परेशानी यहीं बढ़ गई.
जिन सैनिकों पर विद्रोह दबाने की जिम्मेदारी थी, वही रास्ते में बगावत पर उतर गए. डोरंडा की छावनी भी इससे बच नहीं सकी. रांची में रामगढ़ बटालियन के सैनिकों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हथियार उठा लिए. छोटानागपुर में 1857 की आग अब खुलकर भड़क चुकी थी.
डोरंडा से चतरा तक निकला कारवां
विद्रोह सिर्फ छावनी तक सीमित नहीं रहा. क्रांतिकारियों का लक्ष्य था अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहे बाबू कुंवर सिंह तक पहुंचना और उनके संघर्ष को मजबूत करना. 30 सितंबर को डोरंडा से एक क्रांतिकारी सैनिक टुकड़ी आगे बढ़ी. इस टुकड़ी की कमान दो सूबेदारों के हाथ में थी- जयमंगल पांडेय और नादिर अली खां. रास्ते में लोग जुड़ते गए. चुटिया के जमींदार भोला सिंह साथ आए. आगे कुरू, चंदवा और बालूमाथ का रास्ता तय हुआ. यह सिर्फ सैनिकों का जत्था नहीं रह गया था. इसमें स्थानीय लोग और जमींदार भी जुड़ते जा रहे थे.
ठाकुर विश्वनाथ शहदेव, पांडेय गणपत राय, शेख भिखारी, टिकैत उमराव सिंह, माधव सिंह और दूसरे स्थानीय योद्धाओं ने भी इस संघर्ष को ताकत दी. एक तरफ अंग्रेजों की प्रशिक्षित सेना थी. दूसरी तरफ ऐसे लोग थे, जिनके पास संसाधन कम थे, लेकिन अपने इलाके और अपने लोगों के साथ खड़े होने का हौसला था. अगला पड़ाव था चतरा.
चतरा में हुआ वह युद्ध, जिसने अंग्रेजों को भारी कीमत चुकाई
चतरा पहुंचते-पहुंचते अंग्रेजों को अंदाजा हो गया था कि अब सामने कोई छोटी-मोटी बगावत नहीं है. तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर सिम्पसन ने क्रांतिकारियों को रोकने के लिए मोर्चा संभाला. फिर शुरू हुआ चतरा का युद्ध.
1857 के इस संघर्ष में अंग्रेजी पक्ष को भारी नुकसान हुआ. 56 सरकारी सैनिक मारे गए. इनमें 46 यूरोपीय और 10 सिख सैनिक थे. बड़ी संख्या में सैनिक घायल हुए. लेकिन इस लड़ाई का अंत क्रांतिकारियों के पक्ष में नहीं हुआ. अंग्रेजों ने धीरे-धीरे विद्रोह को कुचल दिया. क्रांतिकारी पकड़े जाने लगे. जयमंगल पांडेय और नादिर अली भी गिरफ्तार कर लिए गए.
4 अक्टूबर : जब दो सूबेदार फांसी पर चढ़े
3 अक्टूबर को दोनों को अंग्रेज अधिकारी सिम्पसन के सामने पेश किया गया. अगले दिन 4 अक्टूबर 1857 को दोनों को फांसी दे दी गई. यह वही जयमंगल पांडेय थे, जिन्होंने अंग्रेजों की सेना में रहते हुए उनकी ताकत देखी थी. वही जयमंगल पांडेय, जिन्होंने डोरंडा की छावनी में सैनिकों को अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा किया. वही जयमंगल पांडेय, जिन्होंने चतरा तक सैनिक टुकड़ी का नेतृत्व किया. और वही जयमंगल पांडेय अब अंग्रेजी हुकूमत के लिए सिर्फ एक ‘विद्रोही’ थे.
उनकी जिंदगी का आखिरी पड़ाव वही बना, जहां उन्होंने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी थी. कहा जाता है कि चतरा में बड़ी संख्या में क्रांतिकारियों को आम के पेड़ों पर फांसी दी गई. जिस जगह पर यह हुआ, वह आज अलग-अलग नामों से जानी जाती है. लेकिन उसके नाम चाहे जो हों, उसकी मिट्टी में उस दौर के बलिदान की कहानी आज भी मौजूद है.
लकड़ी का वह बक्सा, जिसमें बची है एक भूली हुई कहानी
जयमंगल पांडेय की कहानी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. उनके वंशज सच्चिदानंद पांडेय आज भी अपने पूर्वज की स्मृतियों को संभालकर रखे हुए हैं. उनके पास जयमंगल पांडेय का लकड़ी का पुराना बक्सा सुरक्षित है. एक साधारण-सा बक्सा. लेकिन उसके भीतर एक पूरा दौर बंद है.
वह दौर, जब अंग्रेजी सेना की वर्दी पहनने वाला एक भारतीय सैनिक एक दिन उसी हुकूमत के खिलाफ खड़ा हो गया. नादिर अली की कहानी इससे भी ज्यादा अधूरी है. वे गया के रहने वाले थे, लेकिन उनके परिवार का पता आज तक नहीं चल पाया. दोनों ने एक साथ विद्रोह किया. एक साथ लड़ाई लड़ी. एक साथ पकड़े गए. और फिर एक ही दौर में फांसी के फंदे पर झूल गए. लेकिन आज उनकी याद भी एक जैसी नहीं बची.

