दिल्ली हाईकोर्ट ने बेटी के नाम पर किए गए निवेश को लेकर अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ कहा है कि पिता अपनी बेटी के नाम पर जमा पैसे का इस्तेमाल पत्नी या बेटी को गुज़ारा-भत्ता यानी मेंटेनेंस देने की अपनी कानूनी जिम्मेदारी निभाने के लिए नहीं कर सकते. बेटी के नाम पर जमा रकम पर उसी का अधिकार है और पिता उस रकम को सिर्फ अभिभावक यानी गार्जियन के तौर पर संभाल सकते हैं. यह फैसला जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने सुधीर कवात्रा बनाम शामली कवात्रा मामले में 3 अगस्त को सुनाया.
मामला सुधीर कवात्रा और उनकी बेटी शामली कवात्रा से जुड़ा है. सुधीर ने साल 1999 में अपनी बेटी के लिए PPF खाता खुलवाया था. इस खाते में समय के साथ रकम जमा होती रही. शामली के मुताबिक, साल 2017 में जब वह PPF खाते की मैच्योरिटी के बाद बैंक पहुंचीं, तो उन्हें पता चला कि उनके पिता 2016 में ही खाते से 8 लाख रुपये से ज्यादा की पूरी रकम निकाल चुके हैं. इसके बाद PPF खाता बंद कर दिया गया था.
बेटी ने कहा- पढ़ाई के लिए नहीं मिला पैसा
शामली ने आरोप लगाया कि उनके पिता ने बैंक को बताया था कि वह PPF की रकम बेटी की पढ़ाई और उसकी भलाई के लिए निकाल रहे हैं. लेकिन उनके मुताबिक, इस रकम का इस्तेमाल उनकी पढ़ाई के खर्च में नहीं किया गया. शामली उस समय कॉलेज में पढ़ रही थीं और उन्होंने कहा कि फीस भरने में उन्हें आर्थिक परेशानी हो रही है. इसके बाद उन्होंने PPF की रकम वापस पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया.
मामले की सुनवाई के बाद जिला अदालत ने पिता को आदेश दिया कि वह बेटी को पूरी PPF रकम वापस करें. अदालत ने रकम पर 8 प्रतिशत ब्याज देने का भी निर्देश दिया. जिला अदालत के इस फैसले के खिलाफ सुधीर कवात्रा ने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया.
हाई कोर्ट में पिता की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने PPF से निकाली गई रकम में से करीब 6 लाख रुपये अपनी पत्नी के गुज़ारा-भत्ते में खर्च किए हैं. उनका कहना था कि फैमिली कोर्ट के आदेश के तहत वह अपनी पत्नी की देखभाल के लिए मेंटेनेंस दे रहे थे. उन्होंने यह भी कहा कि उत्तराखंड हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार वह अपनी पत्नी को अतिरिक्त गुज़ारा-भत्ता भी दे रहे हैं और उसका फायदा बेटी को भी मिल रहा है.
मामले में सामने आया कि माता-पिता के बीच वैवाहिक विवाद के चलते दोनों अलग रह रहे थे. शामली अपनी मां के साथ रहती थीं. बेटी का आरोप था कि उसके पिता ने जानबूझकर PPF की रकम निकाल ली, जिससे उसकी मां पर आर्थिक बोझ बढ़ गया. वहीं, पिता का कहना था कि वह अपनी कानूनी जिम्मेदारियों के तहत पत्नी को मेंटेनेंस दे रहे थे.

दिल्ली हाई कोर्ट ने जिला अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए साफ किया कि बच्चे की देखभाल करना पिता की स्वतंत्र कानूनी जिम्मेदारी है. इस जिम्मेदारी को बेटी के नाम जमा रकम से पूरा नहीं किया जा सकता.
कोर्ट ने कहा,
“चूंकि निवेश बच्चे के नाम पर था, इसलिए वह रकम पाने की हकदार थी। पिता ने वह पैसा लिया हो सकता है जिसकी हकदार वादी (बेटी) थी, लेकिन यह केवल एक अभिभावक के तौर पर भरोसे की हैसियत से था; पिता बच्चे के प्रति गुज़ारा-भत्ता देने की अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा करने के लिए इसका इस्तेमाल नहीं कर सकता।”
रोजमर्रा का खर्च और निवेश अलग चीजें हैं
कोर्ट ने कहा कि माता-पिता बच्चे के बचपन में उसके नाम पर पैसे जमा करके भविष्य के लिए एक फंड बना सकते हैं. लेकिन यह रकम बच्चे के भविष्य के इस्तेमाल के लिए किया गया निवेश है. वहीं, बच्चे के पालन-पोषण और रोजमर्रा के खर्च की जिम्मेदारी माता-पिता की अलग कानूनी जिम्मेदारी है. इन दोनों को आपस में मिलाकर नहीं देखा जा सकता.
कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ पति-पत्नी के बीच विवाद होने की वजह से पिता बेटी के नाम किए गए निवेश को मेंटेनेंस के भुगतान में इस्तेमाल नहीं कर सकते. ऐसा करना अपनी कानूनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए बच्चे के पैसे का इस्तेमाल करने जैसा होगा.

PPF पिता ने खोला था, लेकिन रकम पर बेटी का अधिकार
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि भले ही PPF खाता पिता ने खोला था, लेकिन यह बेटी के फायदे के लिए बनाया गया था. इसलिए बालिग होने के बाद बेटी उस रकम की हकदार थी. कोर्ट ने यह भी कहा कि पिता इस रकम को अपने खाते में ट्रांसफर नहीं कर सकते थे. वह बेटी को यह पैसा देने के लिए जिम्मेदार थे.
दिल्ली हाई कोर्ट ने पिता की याचिका खारिज करते हुए जिला अदालत के आदेश को बरकरार रखा. पिता को बेटी का पूरा PPF फंड 8 प्रतिशत ब्याज के साथ लौटाने का निर्देश दिया गया है. इस मामले में पिता की ओर से वकील रजनीश कुमार झा और डॉली रानी पेश हुए. वहीं, बेटी की ओर से वकील शुभम गुप्ता ने पक्ष रखा.
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