कनिका राणा
देशभर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चल रहे सियासी घमासान के बीच ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट ने सनसनी फैला दी है. रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि चुनाव आयोग के भीतर दो अन्य आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) ने पिछले 10 महीनों में आयोग के फैसलों पर 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं.
इस खुलासे के बाद विपक्षी दलों (INDIA ब्लॉक) ने आक्रामक रुख अपनाते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, गिरफ्तारी और संसद में महाभियोग की मांग कर दी है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे देश के खिलाफ राजद्रोह करार दिया है, जबकि ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं ने CEC को तुरंत गिरफ्तार किए जाने की मांग की है. वहीं, टीएमसी सांसद डेरेक ओब्रायन ने राज्यसभा चेयरमैन को पत्र लिखकर CEC को हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लाने की मांग की है. विपक्ष का मुख्य आरोप है कि SIR प्रक्रिया के तहत पात्र मतदाताओं के नाम साजिश के तहत सूची से हटाए जा रहे हैं.
दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने अपने बचाव में कहा है कि आयोग के भीतर अलग-अलग विचार और टिप्पणियां होना सामान्य आंतरिक विचार-विमर्श का हिस्सा हैं और सभी फैसले सामूहिक रूप से लिए गए हैं.
संसद में कैसे पास हुआ था विवादित कानून?
यह पूरा विवाद उस कानून से जुड़ा है जिसके तहत मौजूदा CEC की नियुक्ति हुई है. दिसंबर 2023 में जब यह बिल संसद में लाया गया था, तब देश की राजनीति में एक बड़ा भूचाल आया हुआ था. संसद सुरक्षा चूक मामले पर सरकार को घेर रहे 143 विपक्षी सांसदों को लोकसभा और राज्यसभा से निलंबित कर दिया गया था.
संसद के इतिहास के उस सबसे बड़े सामूहिक निलंबन के कारण सदन के भीतर विपक्ष की आवाज लगभग पूरी तरह दबा दी गई थी. लोकसभा में भारी हंगामे के बीच महज 1 घंटे 40 मिनट की संक्षिप्त चर्चा के बाद इस बिल को ध्वनि मत से पास करा लिया गया. उस दौरान सदन के भीतर अधिकांश विपक्षी सांसद नदारद थे, और विपक्ष लगातार यह आरोप लगाता रहा कि सरकार ने उनकी गैरमौजूदगी का फायदा उठाकर अलोकतांत्रिक तरीके से यह कानून चुपचाप पास करवा लिया.

इस कानून के तहत चयन समिति से मुख्य न्यायाधीश (CJI) को हटाकर एक केंद्रीय मंत्री को शामिल कर लिया गया, जिससे सरकार के पास समिति में 2-1 का बहुमत आ गया. ज्ञानेश कुमार इसी प्रक्रिया के तहत नियुक्त होने वाले पहले CEC हैं.
‘सेक्शन 16’ का आजीवन सुरक्षा कवच और सुप्रीम कोर्ट का मामला
दिसंबर 2023 में लाए गए ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ के सेक्शन 16 के तहत यह प्रावधान किया गया है कि CEC या कोई भी निर्वाचन आयुक्त अपने पद पर रहते हुए अपने आधिकारिक कर्तव्यों के तहत जो भी फैसला लेगा, कहेगा या करेगा, उसके खिलाफ कोर्ट में कोई दीवानी या आपराधिक मामला नहीं चलाया जा सकता. यह छूट सिर्फ कार्यकाल के दौरान ही नहीं, बल्कि पद छोड़ने के बाद भी जीवनभर बनी रहती है.
इसी आजीवन छूट को चुनौती देते हुए एनजीओ ‘लोक प्रहरी’ ने जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी. याचिका में कहा गया है कि यह सेक्शन निर्वाचन आयुक्तों को कानून की पहुंच से पूरी तरह बाहर कर देता है और इसमें भ्रष्टाचार या पद के दुरुपयोग पर भी कोई अपवाद नहीं रखा गया है.
12 जनवरी 2026 को चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने इस याचिका पर केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया था, लेकिन Section 16 पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था. फिलहाल Section 16 कानून का हिस्सा है और उस पर कोई रोक नहीं है. अब इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला बाकी है कि CEC और निर्वाचन आयुक्तों को दी गई यह कानूनी सुरक्षा संविधान के अनुरूप है या नहीं.

