जोहार लाइव ब्यूरो
पूर्व ब्यूरोक्रेट आशीष जोशी एक बार फिर चर्चा मे है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत का इस्तीफा मांगा है.
गुरूवार 24 सितंबर को अपने एक्स हैंडल पर उन्होंने लिखा, न्यायाधीश भारत के संविधान से ऊपर नहीं हैं. जिन्होंने संविधान के साथ विश्वासघात किया है, उन्हें जवाबदेह ठहराया जाएगा. अब समय आ गया है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश और उन सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के इस्तीफे की मांग की जाए, जिन्होंने संविधान के साथ विश्वासघात किया है. देर-सबेर इसका जवाबदेही तय होगी.
भारत के मुख्य न्यायाधीश और उन न्यायाधीशों को, जिन्होंने इस पूरी व्यवस्था को मंजूरी दी, देश के प्रति अपने इस्तीफे की जिम्मेदारी लेनी चाहिए. कोई भी न्यायाधीश संविधान से ऊपर नहीं है. संविधान के साथ विश्वासघात का जवाब देर-सबेर दिया जाएगा.
उन्होंने लिखा, अब समय आ गया है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश और उन न्यायाधीशों के इस्तीफे की मांग की जाए, जिन्होंने कार्यपालिका के वर्चस्व वाली नियुक्ति प्रक्रिया को मंजूरी दी, SIR को बरकरार रखा और आयोग को पारदर्शिता के बिना काम करने की खुली छूट दी.
भारत के मुख्य न्यायाधीश और उन न्यायाधीशों के इस्तीफे की मांग होनी चाहिए, जिन्होंने संविधान के साथ विश्वासघात किया है. उस अदालत में कोई भी संविधान से ऊपर नहीं है. जवाबदेही तय होगी. उस अदालत में कोई भी संविधान से ऊपर नहीं है. जवाबदेही तय होकर रहेगी.
कौन हैं आशीष जोशी
आशीष जोशी बीते कई महीनों से केंद्र सरकार और उसकी कई नीतियों के आलोचक रहे हैं. मूल रूप से उत्तराखंड के रहनेवाले आशीष जोशी दूरसंचार विभाग (DoT) में कम्युनिकेशंस कंट्रोलर के पद पर रह चुके हैं. उनके LinkedIn प्रोफाइल के मुताबिक, उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, बेंगलुरु से मैनेजमेंट स्टडीज (पब्लिक पॉलिसी) में मास्टर डिग्री हासिल की है. नौकरशाही के अपने करियर के दौरान उन्होंने दूरसंचार विभाग में कई अहम पदों पर काम किया.
जोशी 1992 बैच के इंडियन पोस्ट एंड टेलीकम्युनिकेशन अकाउंट्स एंड फाइनेंस सर्विस (IP&TAFS) अधिकारी रहे हैं. उन्हें उत्तराखंड में DoT के कंट्रोलर ऑफ कम्युनिकेशंस के पद पर भी तैनात किया गया था. कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित के अनुसार, आशीष जोशी भारत सरकार में अतिरिक्त सचिव के पद से सेवानिवृत्त हुए थे.
मॉर्निंग वॉक के दौरान दिल्ली पुलिस ने उठाया था
इससे पहले बुधवार 2 सितंबर को देशभर वो चर्चा का केंद्र बन गए थे. दरअसल, सुबह की सैर के दौरान उन्हें दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की टीम अपने साथ ले गई और करीब नौ घंटे तक उनसे पूछताछ की गई. मामला तब सामने आया, जब जोशी ने X पर पोस्ट कर लिखा, “अभी-अभी घर वापस आया हूं. दिल्ली स्पेशल सेल मुझे घर छोड़कर गई है. विस्तृत जानकारी बाद में दूंगा.”
इसके बाद दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार को संबोधित एक पोस्ट में जोशी ने याद दिलाया कि किसी व्यक्ति से पूछताछ या उसे हिरासत में लेने के दौरान उसके परिवार को इसकी जानकारी देना कानूनी जिम्मेदारी है.
उन्होंने लिखा, सुबह की सैर के बाद मुझे यह आश्वासन देकर पूछताछ के लिए ले जाया गया कि इसमें बहुत कम समय लगेगा. हालांकि, जैसे-जैसे घंटे बीतते गए, मैंने बार-बार अपनी पत्नी को अपने बारे में जानकारी देने का अनुरोध किया. संबंधित पुलिस अधिकारियों ने केवल इतना कहा कि वे ‘निर्देशों का पालन कर रहे हैं’.”
घटना के अगले दिन यानी गुरूवार 3 सितंबर को आशीष जोशी ने बताया, दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा करीब नौ घंटे तक पूछताछ किए जाने के एक दिन बाद पूर्व सिविल सेवक आशीष जोशी ने गुरुवार को दावा किया कि उन्हें पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर 26 अगस्त को X पर किए गए अपने पोस्ट के संबंध में पूछताछ के लिए बुलाया गया था. हालांकि, पूछताछ का एक बड़ा हिस्सा उनके एक पुराने पोस्ट को लेकर था, जिसमें उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री और गृह सचिव के बीच कथित मतभेद का जिक्र किया था.
पुलिस का कहना है कि जोशी से उस मामले के संबंध में पूछताछ की गई, जिसे स्पेशल सेल की काउंटर इंटेलिजेंस (CI) यूनिट ने BNS की धारा 192 के तहत दर्ज किया है. यह धारा दंगा भड़काने के इरादे या इस जानकारी के साथ उकसावे से संबंधित है कि इससे दंगा होने की संभावना है.
इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, ‘’जोशी ने बताया था कि पुलिस के करीब 60-70 फीसदी सवाल उनके 12 अगस्त के उस पोस्ट से जुड़े थे, जिसमें उन्होंने गृह मंत्री और गृह सचिव का जिक्र किया था. जोशी के मुताबिक, पुलिस विशेष रूप से यह जानने में रुचि रखती थी कि उन्हें इस जानकारी का स्रोत कहां से मिला. हालांकि उनकी दिलचस्पी 12 अगस्त के ट्वीट में ज्यादा थी. ज्यादातर सवाल उसी को लेकर थे और वे जानना चाहते थे कि मुझे इसके बारे में किसने बताया था.”
उन्होंने बताया कि उन्होंने अपने सूचना स्रोत का खुलासा करने से इनकार कर दिया, क्योंकि ऐसा करना उनके मुताबिक “अनैतिक और बौद्धिक रूप से बेईमानी” होता.
जोशी ने बताया कि उनसे 26 अगस्त के पोस्ट को लेकर भी पूछताछ की गई थी, जबकि पुलिस के समन में इसी पोस्ट को पूछताछ का मुख्य विषय बताया गया था. इस पोस्ट में जोशी ने चुनावी प्रक्रिया के संचालन पर सवाल उठाए थे और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का जिक्र किया था.
इस पोस्ट में उन्होंने “नूरेमबर्ग-शैली के मुकदमे” का भी उल्लेख किया था. जोशी ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि पुलिस ने उनसे पूछा कि इसका क्या मतलब था.
जोशी के अनुसार, उन्होंने जवाब दिया, “मैंने कहा कि नूरेमबर्ग ट्रायल का संदर्भ यह है कि भारत के संविधान के साथ विश्वासघात करने वाले सभी लोगों को कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए. उन्हें उन कार्यों के लिए जिम्मेदार और जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, जो देश के नागरिकों के हितों के खिलाफ हैं.”
नूरेमबर्ग ट्रायल द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मित्र राष्ट्रों द्वारा नाजी जर्मनी के प्रमुख नेताओं पर युद्ध अपराधों के मुकदमे चलाने के लिए आयोजित किए गए थे.
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