मुस्कान चौधरी
कभी रात के आसमान में सिर्फ एक लाल बिंदु नजर आने वाला मंगल गृह भारत के वैज्ञानिकों के लिए एक ऐसी मंजिल बना, जहां पहुंचना दुनिया की चुनिंदा अंतरिक्ष एजेंसियों के लिए ही संभव हुआ था. लेकिन भारत ने इस चुनौती को सिर्फ स्वीकार नहीं किया, बल्कि अपने पहले ही प्रयास में मंगल की कक्षा तक पहुंचकर दुनिया को चौंका दिया.
5 नवंबर 2013 को श्रीहरिकोटा से उड़ान भरने वाला भारत का मार्स ऑर्बिटर मिशन (MOM), जिसे दुनिया मंगलयान के नाम से जानती है, 24 सितंबर 2014 को मंगल की कक्षा में पहुंचा. इसके साथ ही भारत पहले प्रयास में मंगल की कक्षा में यान पहुंचाने वाला दुनिया का पहला देश बना था. यह किसी दूसरे ग्रह पर भेजा गया भारत का पहला अंतरिक्षयान भी था. मिशन की योजना सिर्फ छह महीने की थी, लेकिन यह अंतरिक्ष यान करीब 7 साल 6 महीने 8 दिन तक काम करता रहा. अप्रैल 2022 में इसका पृथ्वी से संपर्क हमेशा के लिए टूट गया और अक्टूबर 2022 में इसरो ने मिशन को आधिकारिक तौर पर समाप्त घोषित किया.
जब भारत ने मंगल की तरफ देखने का फैसला किया
मंगलयान की कहानी अचानक शुरू नहीं हुई थी. नवंबर 2008 में तत्कालीन इसरो अध्यक्ष जी. माधवन नायर ने मंगल पर भारत के मानवरहित मिशन की पहली सार्वजनिक घोषणा की थी. इससे पहले भारत चंद्रयान-1 के जरिए चंद्रमा तक अपनी वैज्ञानिक क्षमता दिखा चुका था.
2010 में इस मिशन की व्यवहार्यता पर काम शुरू हुआ और 3 अगस्त 2012 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने परियोजना को मंजूरी दी. इसके बाद चुनौती थी कि सीमित समय और संसाधनों में ऐसा अंतरिक्ष यान तैयार किया जाए जो पृथ्वी से करोड़ों किलोमीटर दूर मंगल तक पहुंच सके. और यहीं से मंगलयान सिर्फ एक अंतरिक्ष मिशन नहीं, बल्कि भारतीय इंजीनियरिंग और वैज्ञानिक प्रबंधन की परीक्षा बन गया.
सिर्फ 15 महीने में तैयार हुआ अंतरिक्ष यान
मंगलयान को तैयार करने के लिए इसरो की टीम ने बेहद कम समय में काम किया. अंतरिक्ष यान का विकास रिकॉर्ड करीब 15 महीनों में पूरा किया गया. इसके लिए उपलब्ध तकनीक और पहले के मिशनों से विकसित प्रणालियों का इस्तेमाल किया गया. इसकी अनुमानित लागत करीब 450 करोड़ रुपये थी. हालांकि इसका बजट हॉलिवुड फिल्म ‘ग्रैविटी’ से भी कम था.


5 अगस्त 2013 को मिशन के लिए पीएसएलवी-एक्सएल सी25 प्रक्षेपण यान की असेंबली शुरू हुई. पांच वैज्ञानिक उपकरणों को बेंगलुरु स्थित यूआर राव सैटेलाइट सेंटर में लगाया गया और तैयार अंतरिक्ष यान को 2 अक्टूबर 2013 को श्रीहरिकोटा भेजा गया. यह गति इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि मंगल तक जाने के लिए प्रक्षेपण का सही समय चुनना पड़ता है. मंगल के लिए उपयुक्त लॉन्च विंडो सीमित होती है और ऐसे अवसर लगभग 26 महीने में आते हैं.
मंगलयान में पांच वैज्ञानिक उपकरण लगाए गए थे. इनका इस्तेमाल मंगल की सतह और वातावरण से जुड़ी अलग-अलग जानकारियां जुटाने के लिए किया गया. मिशन के दौरान मंगल के अलावा उसके चंद्रमाओं फोबोस और डीमोस को देखने के अवसर भी मिले. मंगलयान ने डीमोस के दूर वाले हिस्से के दृश्य भी उपलब्ध कराए. 2015 में पृथ्वी और मंगल के सूर्य के विपरीत दिशा में आने वाली स्थिति के दौरान मिशन को सौर कोरोना का अध्ययन करने का भी अवसर मिला. मंगल से आने वाली एस-बैंड रेडियो तरंगों के सौर कोरोना से गुजरने की प्रक्रिया का इस्तेमाल वैज्ञानिक अध्ययन के लिए किया गया.
5 नवंबर 2013: जब मंगल की ओर बढ़ा भारत
5 नवंबर 2013 को दोपहर 2 बजकर 38 मिनट पर श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से पीएसएलवी-सी25 ने मंगलयान को लेकर उड़ान भरी. यह सीधे मंगल की ओर नहीं गया. पहले अंतरिक्ष यान को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया. वहां से उसकी कक्षा को कई चरणों में बढ़ाया गया. करीब एक महीने तक किए गए कक्षीय युद्धाभ्यासों के बाद 30 नवंबर 2013 को मंगल की ओर उसकी यात्रा शुरू हुई. इसके बाद शुरू हुआ 298 दिनों का लंबा सफर. पृथ्वी से निकलकर मंगल की कक्षा तक पहुंचना मिशन का सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा था.
फिर आया वह दिन जिसने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का इतिहास बदल दिया. 24 सितंबर 2014 को मंगलयान सफलतापूर्वक मंगल की कक्षा में दाखिल हो गया. यह भारत का पहला अंतरग्रहीय मिशन था. इस उपलब्धि के साथ भारत मंगल की कक्षा में पहुंचने वाला पहला एशियाई देश बना. भारत अपने पहले प्रयास में मंगल की कक्षा तक पहुंचने वाली दुनिया की चुनिंदा अंतरिक्ष एजेंसियों में शामिल हो गया.
इस सफलता की खास बात यह थी कि मिशन का मकसद केवल मंगल की तस्वीरें लेना नहीं था. भारत के लिए यह भविष्य के अंतरग्रहीय मिशनों के लिए जरूरी तकनीक को साबित करने भी था.

मंगलयान असल में किस काम के लिए भेजा गया था?
मंगलयान के दो बड़े लक्ष्य थे. पहला, भारत को अंतरग्रहीय मिशन की डिजाइनिंग, योजना, नेविगेशन, संचार, संचालन और नियंत्रण से जुड़ी तकनीक का अनुभव हासिल करना था. दूसरा, मंगल के बारे में वैज्ञानिक जानकारी जुटाना. इसके वैज्ञानिक उद्देश्यों में मंगल की सतह, उसकी आकृति, स्थलाकृति और खनिजों का अध्ययन शामिल था. इसके अलावा मंगल के वातावरण में मौजूद गैसों, खासकर मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड, का अध्ययन भी मिशन का हिस्सा था. मंगल के ऊपरी वायुमंडल, सौर पवन और विकिरण के प्रभावों को समझना भी इसका हिस्सा था. यानी मंगलयान सिर्फ एक कैमरा लेकर लाल ग्रह की तस्वीरें भेजने वाला यान नहीं था. यह भारत के लिए एक तरह की अंतरिक्ष प्रयोगशाला भी था.
कम खर्च में बड़ी छलांग
मंगलयान की सबसे ज्यादा चर्चा जिन वजहों से हुई, उनमें इसकी लागत भी शामिल थी. मिशन की कुल लागत करीब 450 करोड़ रुपये बताई गई. उपलब्ध विवरण के मुताबिक यह उस समय के सबसे कम लागत वाले मंगल मिशनों में शामिल था. कम लागत का मतलब यह नहीं था कि चुनौती कम थी. इसके पीछे मॉड्यूलर डिजाइन, उपलब्ध तकनीक का इस्तेमाल, अपेक्षाकृत सरल डिजाइन और सीमित पेलोड जैसे कई कारक बताए गए हैं. यही वजह थी कि मंगलयान को दुनिया भर में भारत के किफायती अंतरिक्ष अभियानों के उदाहरण के तौर पर देखा गया.
मंगलयान की सफलता के पीछे इसरो के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की लंबी टीम थी. इस मिशन का नेतृत्व तत्कालीन इसरो अध्यक्ष के. राधाकृष्णन ने किया. माइलस्वामी अन्नादुराई कार्यक्रम निदेशक थे, जबकि सुब्बिया अरुनन प्रोजेक्ट डायरेक्टर थे. मौमिता दत्ता प्रोजेक्ट मैनेजर थीं. नंदिनी हरिनाथ और रितु करिधल नौवहन विभाग से जुड़ी थीं. इसके अलावा मिशन की उड़ान, प्रणोदन, इलेक्ट्रिकल सिस्टम, डीप स्पेस नेटवर्क और लॉन्च सिस्टम से जुड़े कई वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने इसकी सफलता में भूमिका निभाई. इस टीम ने सिर्फ एक अंतरिक्ष यान नहीं बनाया था. उन्होंने भारत के लिए एक नई क्षमता तैयार की थी.
जब मंगलयान की यात्रा खत्म हुई
मंगलयान की मूल योजना सिर्फ छह महीने की थी. लेकिन मिशन ने उम्मीद से कहीं ज्यादा लंबा सफर तय किया और करीब साढ़े सात साल तक सक्रिय रहा. अप्रैल 2022 में एक लंबे ग्रहण काल के बाद मंगलयान से संपर्क टूट गया. बाद में इसरो ने इसे दोबारा सक्रिय करने की कोशिश की, लेकिन संपर्क बहाल नहीं हो सका. 3 अक्टूबर 2022 को इसरो ने मिशन को आधिकारिक रूप से समाप्त घोषित कर दिया.
मंगलयान अब काम नहीं करता. उसका पृथ्वी से संपर्क भी नहीं है. लेकिन इस मिशन की असली विरासत किसी एक तस्वीर, किसी एक वैज्ञानिक डेटा या किसी एक रिकॉर्ड में नहीं सिमटती. मंगलयान ने भारत को यह अनुभव दिया कि पृथ्वी की कक्षा से बहुत आगे जाकर किसी दूसरे ग्रह के आसपास अंतरिक्ष यान को पहुंचाना और संचालित करना संभव है. और शायद यही इस मिशन की सबसे दिलचस्प कहानी है. एक ऐसा सफर, जिसकी शुरुआत एक प्रयोग के तौर पर हुई थी, लेकिन जिसने भारत की अंतरिक्ष क्षमता की पहचान को हमेशा के लिए बदल दिया.
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