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    Home»जोहार ब्रेकिंग»‘कॉकरोच’ फिर लौट आए हैं: लेकिन क्या नीट आंदोलन की तरह लोगों का समर्थन मिल पाएगा?
    जोहार ब्रेकिंग

    ‘कॉकरोच’ फिर लौट आए हैं: लेकिन क्या नीट आंदोलन की तरह लोगों का समर्थन मिल पाएगा?

    Muskan ChoudharyBy Muskan ChoudharySeptember 25, 2026Updated:September 25, 2026No Comments5 Mins Read7
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    कॉकरोच जनता पार्टी
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    कनिका राणा

    नई दिल्ली में गुरुवार को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से 48 घंटे के भीतर इस्तीफा मांग लिया, वरना देशभर में आंदोलन छेड़ने की धमकी दे दी. यह ऐलान CJP के राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दीपके ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में किया, साथ में सह-संयोजक सौरव दास और आशुतोष रांका भी मौजूद रहे. यह अल्टीमेटम 24 सितंबर 2026 को जारी हुआ और इसमें देशव्यापी प्रदर्शन की चेतावनी दी गई है. संगठन का सीधा आरोप है कि Special Intensive Revision यानी SIR के दौरान वोटर लिस्ट में जो हेरफेर हुआ, उससे आम मतदाता के हक पर सीधा असर पड़ा है. अगर तय समय में इस्तीफा नहीं आया, तो दिल्ली में दोबारा “जंतर-मंतर 2.0” जैसा प्रदर्शन खड़ा किया जाएगा- वैसा ही जैसा इससे पहले NEET पेपर लीक के मुद्दे पर हुआ था.

    संगठन ने साफ तौर पर तीन मांगें रखी हैं. पहली, ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा और SIR से जुड़े विवादित फैसलों की स्वतंत्र जांच. दूसरी, वोटर लिस्ट से नाम काटने पर तुरंत रोक, जनवरी 2025 की इलेक्टोरल रोल को सुरक्षित रखना और पूरा रिकॉर्ड सुप्रीम कोर्ट या स्वतंत्र जांच आयोग को सौंपना. तीसरी, 2023 के चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून को बदलना, ताकि नियुक्ति प्रक्रिया में सिविल सोसाइटी और दूसरी संस्थाओं की भी भागीदारी हो, न कि सिर्फ सरकार की मर्जी चले.

    लेकिन असल सवाल ये है कि क्या सीजेपी दुबारा नीट के जैसा आंदोलन खड़ा कर पाएगी? क्या सीजेपी का आंदोलन, कांग्रेस पार्टी से अलग होगा या दोनों इस मसले पर साथ आएंगे. जंतर मंतर आंदोलन के मुकाबले स्कूल ठीक करो अभियान को उतनी सफलता नहीं मिली. कई जगहों पर पार्टी के लोगों को भारी विरोध का सामना करना पड़ा. हालांकि अधिकतर जगहों पर राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं, खासकर बीजेपी के कार्यकर्तआओं ने ही विरोध किया, बावजूद देशभर के लोगों का प्रयाप्त समर्थन नहीं मिला.

    दूसरी ओर, जंतर – मंतर पर हुए आंदोलन और उससे बाद बड़ी संख्या में लोगों पर हो रहे पुलिसिया कार्रवाई से भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि सीजेपी को अब ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित आंदोलन में भी उसी तरीके का समर्थन मिल पाएगा.

    तीसरी बात, नीट आंदोलन से देशभर के अभिभावक और छात्र खुद को जोड़कर देख रहे थे. एसआईआर एक गंभीर मुद्दा बनकर उभरा जरूर है, लेकिन पूर्व में भी इसमें वो लोग भी समर्थन देने सड़क पर नहीं उतर पाए, जिनका नाम कटा है. एक तरफ जहां जागरुक मतदाता, या डरे हुए मतदाता, जो ये सोचते हैं कि अगर उनके पास वोटर कार्ड नहीं होगा तो भविष्य में दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है, वो नाम जुड़वाने के लिए एड़ी-चोटी का जोड़ लगा रहे हैं. वहीं लाखों लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने फॉर्म तो सही से भरा, लेकिन चुनाव आयोग की तरफ से फिर भी आपत्ती आ गई और उन्हें अब अपना पक्ष रखने के लिए बुलाय़ा जा रहा है. ऐसे लोग चिढ़कर छोड़ दे रहे हैं. हालांकि समर्थन को लेकर पूरी तस्वीर अगले कुछ दिनों में ही स्पष्ट हो पाएगी.

    कॉकरोच जनता पार्टी कौन है और यह ताकत कहां से आई?

    यह समझना जरूरी है कि CJP कोई परंपरागत राजनीतिक दल नहीं है. यह मूल रूप से भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की 15 मई 2026 की उस टिप्पणी के जवाब में बना, जिसमें उन्होंने कुछ बेरोजगार युवाओं और सोशल मीडिया एक्टिविस्टों को “कॉकरोच” और “समाज के परासाइट” कहा था. इसी टिप्पणी को युवाओं ने पलटवार के तौर पर अपना नाम बना लिया. संगठन की शुरुआत 16 मई 2026 को राजनीतिक संचार रणनीतिकार अभिजीत दीपके ने की थी, और यह चुनाव आयोग में एक राजनीतिक दल के रूप में दर्ज नहीं है.

    जुलाई 2026 में इसी संगठन के दबाव में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को NEET पेपर लीक मामले में इस्तीफा देना पड़ा था, और उस आंदोलन के दौरान दिल्ली पुलिस की सख्ती को लेकर देश-विदेश में सवाल उठे थे. जुलाई की उस झड़प में करीब 150 प्रदर्शनकारी घायल हुए थे, जिसके बाद संगठन ने संसद तक मार्च रोकने का फैसला किया, हालांकि आंदोलन जारी रखने की बात कही. सितंबर की शुरुआत में भी CJP ने सरकार पर जुलाई के वादे पूरे न करने का आरोप लगाते हुए 5 सितंबर को दिल्ली में मार्च की घोषणा की थी. यानी SIR को लेकर मौजूदा टकराव, इस संगठन और सरकार के बीच पहले से चली आ रही खींचतान की अगली कड़ी है.

    फिलहाल गेंद चुनाव आयोग के कोर्ट में है. 48 घंटे की डेडलाइन खत्म होने के करीब है और अभी तक आयोग या केंद्र सरकार की तरफ से इस अल्टीमेटम पर कोई औपचारिक जवाब सामने नहीं आया है. अगर मांग नहीं मानी गई, तो CJP का कहना है कि वह पहले जैसा बड़ा जमीनी आंदोलन दोबारा खड़ा करेगी, जिसमें SIR से प्रभावित वोटरों और पहली बार वोट डालने वालों को आगे लाया जाएगा.

    दूसरी तरफ, चुनाव आयोग के भीतर आयुक्तों के बीच मतभेद की खबरें इस मुद्दे को केवल सड़क के आंदोलन तक सीमित नहीं रहने देंगी. यह सवाल अब संस्थागत भी बन चुका है कि आयोग के भीतर फैसले किस तरह लिए जा रहे हैं. जो भी हो, अगले कुछ दिन यह तय करेंगे कि यह टकराव बातचीत की मेज तक पहुंचता है, या दिल्ली की सड़कों पर एक और बड़े आंदोलन में बदलता है.

    Also Read : विपक्ष के 143 सांसदों का निलंबन और सेक्शन-16 से मिली वो ताकत, जिसने मुख्य चुनाव आयुक्त को कोई भी निर्णय लेने को कर दिया स्वतंत्र

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