जब भी हम आसमान की तरफ देखते हैं, सूरज हमें सिर्फ रोशनी और गर्मी देता हुआ नजर आता है. लेकिन इसी चमकते सूरज के भीतर ऐसे अनगिनत राज छिपे हैं, जिन्हें समझने की कोशिश वैज्ञानिक दशकों से कर रहे हैं. आखिर सूरज पर उठने वाले तूफान धरती तक कैसे पहुंचते हैं? उसकी एक छोटी सी हलचल अंतरिक्ष में घूम रहे सैटेलाइट और धरती पर चल रही हमारी तकनीक को कैसे प्रभावित कर सकती है? इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए भारत ने अपनी नजरें अब सीधे सूरज पर टिका दी हैं.
भारत का आदित्य-L1 मिशन सिर्फ एक अंतरिक्ष अभियान नहीं, बल्कि उस तारे को करीब से समझने की कोशिश है, जिसके बिना धरती पर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती. करीब 15 लाख किलोमीटर दूर से आदित्य-L1 सूरज की गतिविधियों पर नजर रख रहा है और वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद कर रहा है कि सूरज के भीतर और उसकी बाहरी परतों में आखिर हो क्या रहा है.
चंद्रयान-3 की सफलता के बाद जब भारत ने सूरज की ओर कदम बढ़ाया, तो दुनिया की नजरें एक बार फिर भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम पर टिक गईं. 2 सितंबर 2023 को श्रीहरिकोटा से लॉन्च हुआ आदित्य-L1 करीब चार महीने की लंबी यात्रा के बाद सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के L1 बिंदु के आसपास अपनी कक्षा में पहुंचा. यहां से वह बिना किसी ग्रह या चंद्रमा के बीच में आए सूरज को लगातार देखने की खास स्थिति में है.
यही वजह है कि आदित्य-L1 को भारत की अंतरिक्ष यात्रा का एक ऐसा मिशन माना जा रहा है, जो सिर्फ सूरज के रहस्यों से पर्दा नहीं उठाएगा, बल्कि भविष्य में धरती पर हमारी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने वाले अंतरिक्ष मौसम को समझने में भी मदद करेगा.
आखिर क्या है आदित्य-L1 मिशन?
आदित्य-L1 एक अंतरिक्ष यान है, जिसे सूर्य के बाहरी वातावरण और उससे जुड़ी गतिविधियों का अध्ययन करने के लिए बनाया गया है. यह मिशन सूर्य की अलग-अलग परतों, सौर ज्वालाओं, कोरोनल मास इजेक्शन यानी CME और सौर हवा जैसी घटनाओं को समझने की कोशिश करेगा.
सूर्य पृथ्वी से करीब 15 करोड़ किलोमीटर दूर है. ऐसे में सीधे सूर्य के पास जाकर उसका अध्ययन करना बेहद कठिन और जोखिम भरा है. इसलिए वैज्ञानिकों ने एक ऐसी जगह चुनी, जहां से सूर्य पर लगातार नजर रखी जा सके. यह जगह है लैग्रेंज पॉइंट-1 यानी L1.
क्या है L1 और क्यों चुना गया यही स्थान?
सूर्य और पृथ्वी के बीच अंतरिक्ष में कुछ ऐसे विशेष बिंदु हैं, जहां दोनों पिंडों के गुरुत्वाकर्षण बल और अंतरिक्ष यान की गति के बीच संतुलन की स्थिति बन सकती है. इन्हें लैग्रेंज बिंदु कहा जाता है. सूर्य-पृथ्वी प्रणाली में कुल पांच लैग्रेंज बिंदु हैं. इनमें से L1 सूर्य और पृथ्वी के बीच स्थित है.
आदित्य-L1 को पृथ्वी से करीब 15 लाख किलोमीटर दूर L1 के आसपास हेलो ऑर्बिट में स्थापित किया गया. यहां पहुंचने के लिए अंतरिक्ष यान को लगभग चार महीने की यात्रा करनी पड़ी. L1 को चुनने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यहां से सूर्य का लगातार अवलोकन किया जा सकता है. पृथ्वी या चंद्रमा के पीछे जाने जैसी स्थिति के कारण सूर्य का दृश्य बार-बार बाधित नहीं होता. यानी आदित्य-L1 को सूर्य पर लगातार नजर रखने के लिए अंतरिक्ष में एक बेहद खास ‘बालकनी’ मिल गई.
L1 की एक और खासियत यह है कि यह अंतरिक्ष अभियानों के लिए ऊर्जा की दृष्टि से उपयोगी स्थान है. यहां स्थापित अंतरिक्ष यान को सूर्य और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण प्रभावों का फायदा मिलता है. इससे किसी दूसरे स्थान की तुलना में यान को बनाए रखने के लिए अपेक्षाकृत कम ईंधन की जरूरत पड़ सकती है. यही वजह है कि L1 को सूर्य के अध्ययन के लिए बेहद उपयोगी स्थान माना जाता है.
चार महीने की लंबी यात्रा कैसे पूरी हुई?
आदित्य-L1 को लॉन्च करते ही सीधे 15 लाख किलोमीटर दूर L1 पर नहीं भेजा गया. इसकी यात्रा कई चरणों में पूरी की गई. सबसे पहले अंतरिक्ष यान को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया. इसके बाद अलग-अलग चरणों में इसकी कक्षा को अधिक अंडाकार बनाया गया.
जब यान पर्याप्त ऊर्जा और सही कक्षा तक पहुंच गया, तो उसके ऑन-बोर्ड प्रणोदन तंत्र(Propulsion system) का इस्तेमाल करके उसे पृथ्वी की कक्षा से बाहर L1 की दिशा में भेजा गया. इसके बाद शुरू हुआ इसका लंबा क्रूज चरण. धीरे-धीरे पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव से बाहर निकलते हुए यान सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के L1 क्षेत्र की ओर बढ़ा.
अंत में आदित्य-L1 को L1 के आसपास हेलो ऑर्बिट में स्थापित किया गया. इस पूरी प्रक्रिया में सटीक गणना, नेविगेशन और अंतरिक्ष यान की गति पर बेहद बारीकी से नियंत्रण की जरूरत थी.
सूर्य की किन परतों का होगा अध्ययन?
आदित्य-L1 का अध्ययन केवल सूर्य की सतह तक सीमित नहीं है. इसका मुख्य फोकस सूर्य के बाहरी वातावरण और वहां होने वाली गतिविधियों को समझना है. मिशन के जरिए सूर्य की फोटोस्फेयर, क्रोमोस्फीयर और कोरोना से जुड़ी घटनाओं का अध्ययन किया जाएगा. सूर्य का कोरोना वैज्ञानिकों के लिए खास तौर पर रहस्य का विषय है. यह सूर्य की सबसे बाहरी परत है और इसका तापमान सूर्य की सतह से भी बहुत अधिक हो सकता है. सवाल यह है कि कोरोना इतना गर्म क्यों है? आदित्य-L1 के वैज्ञानिक उपकरण इस तरह के सवालों के जवाब तलाशने में मदद कर सकते हैं.
सौर ज्वाला और कोरोनल मास इजेक्शन पर नजर
सूर्य पर कई बार बेहद शक्तिशाली विस्फोट होते हैं, जिन्हें सोलर फ्लेयर कहा जाता है. इन घटनाओं के दौरान भारी मात्रा में ऊर्जा निकलती है. इसी तरह सूर्य के कोरोना से बड़ी मात्रा में प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्र अंतरिक्ष में निकल सकता है. इसे कोरोनल मास इजेक्शन यानी CME कहा जाता है. अगर ऐसी घटनाओं का रुख पृथ्वी की ओर हो, तो वे हमारे अंतरिक्ष वातावरण को प्रभावित कर सकती हैं. आदित्य-L1 इन घटनाओं की उत्पत्ति और उनके विकास को समझने में महत्वपूर्ण जानकारी जुटा सकता है.
अंतरिक्ष मौसम क्या है?
‘स्पेस वेदर’ यानी अंतरिक्ष मौसम सुनने में भले ही मौसम की तरह लगे, लेकिन इसका संबंध पृथ्वी के वातावरण में होने वाली बारिश या गर्मी से नहीं है. यह सूर्य की गतिविधियों और उनके कारण अंतरिक्ष में होने वाले बदलावों से जुड़ा है.
सूर्य से निकलने वाले आवेशित कण और ऊर्जा पृथ्वी के आसपास के चुंबकीय वातावरण को प्रभावित कर सकते हैं. इसका असर सैटेलाइट, रेडियो संचार, नेविगेशन सिस्टम और अंतरिक्ष में काम करने वाले उपकरणों पर पड़ सकता है. इसलिए भविष्य में अंतरिक्ष मौसम की बेहतर निगरानी के लिए सूर्य की गतिविधियों को समझना बेहद जरूरी है. आदित्य-L1 इसी दिशा में भारत की बड़ी वैज्ञानिक कोशिश है.
सात पेलोड, सूर्य को समझने के सात तरीके
आदित्य-L1 अपने साथ सात वैज्ञानिक पेलोड लेकर गया है. इनका काम सूर्य और अंतरिक्ष में मौजूद कणों तथा चुंबकीय क्षेत्रों का अलग-अलग तरीके से अध्ययन करना है. इनमें VELC यानी Visible Emission Line Coronagraph सूर्य के कोरोना का अध्ययन करेगा. SUIT यानी Solar Ultraviolet Imaging Telescope पराबैंगनी तरंगदैर्ध्य में सूर्य की इमेजिंग करेगा और सूर्य के पराबैंगनी विकिरण से जुड़ी जानकारी जुटाएगा.
SoLEXS और HEL1OS सूर्य से निकलने वाले एक्स-रे विकिरण और सौर ज्वालाओं से जुड़ी गतिविधियों का अध्ययन करेंगे. वहीं ASPEX और PAPA सौर हवा में मौजूद कणों और प्लाज्मा का अध्ययन करेंगे. इसके अलावा MAG यानी Magnetometer L1 के आसपास चुंबकीय क्षेत्र को मापने में मदद करेगा. इन सात उपकरणों के जरिए वैज्ञानिकों को सूर्य को अलग-अलग कोणों से समझने का मौका मिलेगा.
मिशन से क्या हासिल होगा?
आदित्य-L1 से वैज्ञानिकों को सूर्य की कई महत्वपूर्ण घटनाओं को समझने में मदद मिलने की उम्मीद है. मिशन के प्रमुख उद्देश्यों में सूर्य के कोरोना की संरचना और गतिशीलता को समझना, सौर ज्वालाओं और CME की उत्पत्ति का अध्ययन करना, सौर गतिविधियों और अंतरिक्ष मौसम के बीच संबंध को समझना तथा सूर्य की गतिविधियों के पृथ्वी के आसपास के अंतरिक्ष वातावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करना शामिल है. इसके अलावा प्री-फ्लेयर और फ्लेयर गतिविधियों जैसी घटनाओं को समझने की दिशा में भी यह मिशन महत्वपूर्ण डेटा उपलब्ध करा सकता है.
भारत के इस सौर मिशन की लागत भी चर्चा में रही. आदित्य-L1 की शुरुआती मिशन लागत करीब ₹378 करोड़ बताई गई थी, जबकि लॉन्च की लागत अलग थी. इस तरह यह मिशन कई बड़े अंतरिक्ष अभियानों की तुलना में अपेक्षाकृत कम लागत में तैयार किया गया. भारत की अंतरिक्ष एजेंसी ने सीमित संसाधनों में जटिल अंतरिक्ष अभियानों को अंजाम देकर दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है. आदित्य-L1 भी इसी क्षमता का उदाहरण है.
चंद्रयान-3 के बाद सूर्य की ओर भारत की नजर
साल 2023 भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए बेहद खास रहा. अगस्त में चंद्रयान-3 ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के पास सफल सॉफ्ट लैंडिंग करके इतिहास रचा और उसके कुछ ही दिनों बाद भारत ने सूर्य के अध्ययन की दिशा में अपना अगला बड़ा कदम उठाया.
चंद्रमा से सूर्य तक की यह यात्रा सिर्फ दूरी की यात्रा नहीं थी. यह भारत के वैज्ञानिक लक्ष्यों के विस्तार की कहानी भी थी. अब सवाल केवल यह नहीं था कि भारत अंतरिक्ष में पहुंच सकता है या नहीं. सवाल यह था कि भारत अंतरिक्ष में पहुंचकर कितने बड़े वैज्ञानिक सवालों के जवाब खोज सकता है. आदित्य-L1 इसी सवाल का जवाब तलाशता मिशन है.
सूरज को समझने की कोशिश, भविष्य को सुरक्षित करने की तैयारी
सूरज हमारे लिए ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है. लेकिन उसकी गतिविधियां कभी-कभी पृथ्वी और अंतरिक्ष में मौजूद हमारी तकनीकी व्यवस्था के लिए चुनौती भी बन सकती हैं. इसलिए सूर्य को समझना केवल वैज्ञानिक जिज्ञासा नहीं है. यह भविष्य की तकनीकी दुनिया के लिए भी जरूरी है.
आदित्य-L1 सूर्य से करीब 15 लाख किलोमीटर दूर जाकर उसकी गतिविधियों पर नजर रखता है. वहां से मिलने वाला डेटा वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद कर सकता है कि सूर्य के भीतर और उसके बाहरी वातावरण में क्या चल रहा है और उसका असर पृथ्वी तक कैसे पहुंच सकता है.
श्रीहरिकोटा से शुरू हुई यह यात्रा भारत के लिए केवल एक और अंतरिक्ष मिशन नहीं है. यह उस कोशिश का हिस्सा है जिसमें इंसान अपने सबसे करीबी तारे को समझने की कोशिश कर रहा है. चांद और मंगल के बाद अब भारत की नजर सूरज पर है. और इस बार मंजिल सिर्फ अंतरिक्ष तक पहुंचना नहीं, बल्कि सूर्य के उन रहस्यों को समझना है, जिनका असर सीधे हमारी दुनिया पर पड़ता है.
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