शिक्षक दिवस पर जब देशभर में गुरुजनों के सम्मान की तस्वीरें सामने आ रही हैं, वहीं झारखंड में कुछ शिक्षक ऐसे भी हैं जो सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बीच बच्चों का भविष्य गढ़ रहे हैं. किसी ने दुर्गम इलाके में शिक्षा की अलख जगाई, तो किसी ने वंचित बच्चों को स्कूल से जोड़ने की जिम्मेदारी उठाई. इन शिक्षकों की मेहनत बताती है कि बदलाव के लिए हमेशा बड़े संसाधन नहीं, बल्कि मजबूत इरादे की जरूरत होती है.
साहिबगंज के रवि ठाकुर ने 16 साल से अकेले संभाला है 54 बच्चों की पढ़ाई की कमान
साहिबगंज के एक छोटे से सरकारी स्कूल में हर सुबह बच्चे उम्मीद लेकर पहुंचते हैं. कोई किताब लेकर आता है, कोई कॉपी. किसी की आंखों में डॉक्टर बनने का सपना है, तो कोई शिक्षक, पुलिसकर्मी या अधिकारी बनने का सपना देखता है. लेकिन इन सपनों को दिशा देने के लिए स्कूल में शिक्षक सिर्फ एक है.
यह कहानी है रवि ठाकुर की. साहिबगंज जिले के UPS रामपुर बसजोरी स्कूल में रवि ठाकुर वर्ष 2010 से पारा शिक्षक के रूप में बच्चों को पढ़ा रहे हैं. करीब 16 साल से वे इसी स्कूल से जुड़े हैं और कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. स्कूल में कक्षा 1 से 5 तक ही 54 बच्चे हैं. इन बच्चों की पढ़ाई का बड़ा जिम्मा अकेले रवि ठाकुर के कंधों पर है. एक शिक्षक के लिए इतने बच्चों को संभालना और उन्हें पढ़ाना आसान नहीं है. लेकिन रवि के लिए यह सिर्फ नौकरी नहीं, जिम्मेदारी है.
रवि ठाकुर सिर्फ स्कूल में बच्चों को पढ़ाने तक सीमित नहीं हैं. सरकारी व्यवस्था में शिक्षकों को समय-समय पर कई दूसरे कामों में भी लगाया जाता है. जनगणना से लेकर BLO जैसे कामों तक की जिम्मेदारी उन्हें निभानी पड़ती है. इन अतिरिक्त जिम्मेदारियों का सीधा असर स्कूल की पढ़ाई पर पड़ता है. जिस समय शिक्षक को बच्चों के बीच होना चाहिए, उस समय उन्हें कई बार दूसरे सरकारी कामों में लगाया जाता है. नतीजा यह होता है कि बच्चों को जितना समय और ध्यान मिलना चाहिए, उतना देना मुश्किल हो जाता है. फिर भी रवि ठाकुर अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटते.
रवि ठाकुर की कहानी सिर्फ बच्चों को पढ़ाने तक सीमित नहीं है. उन्होंने खुद भी आगे बढ़ने की कोशिश जारी रखी. उन्होंने CTET की परीक्षा पास की. इसके साथ ही वे 13वीं JPSC और JSSC CGL 2023 जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में भी शामिल हुए. यानी जिस शिक्षक का दिन बच्चों को पढ़ाने और सरकारी जिम्मेदारियां निभाने में गुजरता है, वह अपने भविष्य के लिए भी लगातार कोशिश करता रहा.
यह तस्वीर उस संघर्ष को दिखाती है, जो सरकारी स्कूलों के कई शिक्षकों की जिंदगी का हिस्सा है. एक तरफ बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी. दूसरी तरफ खुद के भविष्य की चिंता. और इनके बीच सरकारी कामों का अतिरिक्त बोझ.
रवि ठाकुर के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ बच्चों की संख्या नहीं है. चुनौती यह भी है कि एक ही शिक्षक को अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों की जरूरतों को समझना पड़ता है. कक्षा 1 के बच्चे को अक्षर और गिनती सिखानी है, तो दूसरी तरफ बड़े बच्चों को आगे की कक्षाओं की तैयारी करानी है. हर बच्चे की सीखने की क्षमता अलग है. किसी को ज्यादा समय चाहिए, किसी को ज्यादा समझाने की जरूरत है. लेकिन जब शिक्षक सिर्फ एक हो, तो हर बच्चे तक उतना समय पहुंचा पाना अपने आप में चुनौती बन जाता है. फिर भी रवि ठाकुर स्कूल पहुंचते हैं, बच्चों के बीच बैठते हैं और पढ़ाने की कोशिश करते हैं.
32 साल से बूढ़ा पहाड़ की तलहटी में शिक्षा की लौ जला रहे अकरम अंसारी
झारखंड के बूढ़ा पहाड़ का नाम सुनते ही आंखों के सामने घना जंगल, ऊबड़-खाबड़ रास्ते और दुर्गम इलाका सामने आता है. लेकिन इसी मुश्किल भूगोल के बीच एक स्कूल ऐसा भी है, जहां हर दिन बच्चों की आवाज गूंजती है. यहां तक पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं. नेटरहाट से करीब 150 किलोमीटर दूर, बूढ़ा पहाड़ की तलहटी में स्थित राजकीय मध्य विद्यालय, सरनाडीह में बच्चे पढ़ने आते हैं. स्कूल में कुल 164 विद्यार्थी हैं और इन बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी सिर्फ दो शिक्षकों के कंधों पर है.
इन्हीं दो शिक्षकों में एक नाम है अकरम अंसारी. 56 साल के अकरम अंसारी वर्ष 1994 से बच्चों को पढ़ा रहे हैं. करीब 32 साल से उन्होंने शिक्षक के तौर पर अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा बच्चों के भविष्य को संवारने में लगा दिया. अब उनकी सेवानिवृत्ति में करीब चार साल का वक्त बचा है, लेकिन बच्चों को पढ़ाने का उनका जुनून आज भी कायम है.
स्कूल में 164 विद्यार्थी हैं, लेकिन उन्हें पढ़ाने के लिए सिर्फ दो शिक्षक. ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि दोनों शिक्षकों पर कितनी बड़ी जिम्मेदारी होगी. अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को संभालना, उन्हें पढ़ाना, उनकी समस्याएं सुनना और पढ़ाई के साथ स्कूल की दूसरी जिम्मेदारियां निभाना आसान नहीं है.
लेकिन अकरम अंसारी ने इस चुनौती को कभी अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटने की वजह नहीं बनने दिया. बूढ़ा पहाड़ की तलहटी में बसे इस इलाके में शिक्षा सिर्फ किताब और क्लासरूम तक सीमित नहीं है. यहां स्कूल तक बच्चों का पहुंचना भी अपने आप में एक संघर्ष है. ऐसे इलाके में शिक्षक का नियमित रूप से बच्चों के बीच रहना उनकी भूमिका को और महत्वपूर्ण बना देता है.
अकरम अंसारी के लिए शिक्षक होना सिर्फ एक सरकारी पद नहीं है. यह उन बच्चों के भविष्य से जुड़ी जिम्मेदारी है, जिनके लिए स्कूल और शिक्षक ही आगे बढ़ने का सबसे बड़ा रास्ता हैं. इसी समर्पण का नतीजा है कि स्कूल में विद्यार्थियों के UIDISE+ में 100 से ज्यादा नामांकन दर्ज किए गए हैं. यह आंकड़ा सिर्फ नामांकन संख्या नहीं है. यह बताता है कि दूर-दराज के इस इलाके में बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए स्कूल और शिक्षक लगातार काम कर रहे हैं.
अकरम अंसारी के काम को स्थानीय स्तर पर भी सम्मान मिला है. उन्हें प्रखंड पदाधिकारी, अनुमंडल पदाधिकारी और क्षेत्र शिक्षा पदाधिकारी की ओर से सम्मानित किया जा चुका है. ये सम्मान उनके वर्षों के काम और बच्चों के प्रति समर्पण की पहचान हैं. लेकिन शायद उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान वह है, जब कोई बच्चा स्कूल में आकर पढ़ता है, आगे बढ़ता है और अपने पैरों पर खड़ा होता है.
अकरम अंसारी अब 56 साल के हैं. करीब चार साल बाद वे सरकारी सेवा से रिटायर हो जाएंगे. लेकिन 32 साल की उनकी यात्रा बताती है कि शिक्षक की भूमिका सिर्फ नौकरी की अवधि तक सीमित नहीं होती. आज जब Teachers Day पर देशभर में शिक्षक सम्मानित किए जा रहे हैं, अकरम अंसारी की कहानी उन शिक्षकों की याद दिलाती है जो बड़े शहरों और सुविधाओं से दूर, मुश्किल इलाकों में रहकर बच्चों के भविष्य की नींव तैयार कर रहे हैं.
जब शिक्षक सिर्फ पढ़ाता नहीं, बच्चों का भविष्य बनाता है
झारखंड में इन शिक्षकों की कहानियां अलग-अलग इलाकों और परिस्थितियों से आती हैं, लेकिन इनके काम में एक समानता दिखाई देती है. इन्होंने बच्चों को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें स्कूल से जोड़ने, सीखने में रुचि पैदा करने और उनकी प्रतिभा को सामने लाने की कोशिश की.
राज्य में शिक्षा सुधार के लिए चलाए गए ‘ज्ञान सेतु’ जैसे कार्यक्रमों का उद्देश्य भी बच्चों को उनकी वास्तविक सीखने की क्षमता के स्तर से जोड़ना रहा है. झारखंड एजुकेशन प्रोजेक्ट काउंसिल के अनुसार, कार्यक्रम के शुरुआती छह महीनों में अधिकांश दक्षताओं में करीब 12 फीसदी सुधार दर्ज किया गया था और इससे शिक्षकों की रुचि व प्रेरणा बढ़ने की बात भी सामने आयी थी.
शिक्षक दिवस पर असली सम्मान यही
शिक्षक दिवस पर किसी शिक्षक को सम्मान मिलना निश्चित तौर पर गर्व का पल है, लेकिन शिक्षक की असली उपलब्धि तब होती है जब उसका पढ़ाया बच्चा आगे बढ़ता है. किसी बच्चे में आत्मविश्वास पैदा करना, उसे स्कूल से जोड़े रखना या उसके भीतर कुछ बेहतर करने का सपना जगाना ही शिक्षक के काम की सबसे बड़ी पहचान है.
इन कहानियों में संसाधनों से ज्यादा शिक्षक की सोच और पहल दिखाई देती है. यही वजह है कि शिक्षक दिवस पर ऐसे शिक्षकों को याद करना सिर्फ सम्मान देना नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि एक समर्पित शिक्षक का असर उसकी कक्षा से कहीं आगे तक जाता है.
