जोहार लाइव ब्यूरो
जिस व्यवस्था में किसी समुदाय की पहचान उसकी सामाजिक हैसियत से तय होती हो, वहां उस समुदाय को सत्ता में अपनी हिस्सेदारी दिलाने के लिए केवल आवाज उठाना काफी नहीं होता, संगठन और राजनीतिक ताकत भी चाहिए. कांशीराम ने इसी विचार को अपनी राजनीति का आधार बनाया. उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ी, वंचित समुदायों के कर्मचारियों को संगठित किया, सामाजिक आंदोलन खड़ा किया और फिर बहुजन समाज पार्टी (BSP) बनाकर चुनावी राजनीति में उतर गए. उनका लक्ष्य था कि दलित, आदिवासी, पिछड़े और दूसरे वंचित समुदाय केवल राजनीतिक दलों के वोट बैंक बनकर न रहें, बल्कि अपने नेतृत्व के साथ सत्ता में भागीदारी भी हासिल करें.
कांशीराम का एक प्रसिद्ध कथन है – पहला चुनाव हारने के लिए होता है, दूसरा हरवाने के लिए और तीसरा चुनाव जीतने के लिए. कांशीराम को भी 1984 में जांजगीर-चांपा लोकसभा सीट से हार का सामना करना पड़ा था. वे निर्दलीय लड़े थे. उन्हें करीब 32 हजार वोट मिले थे. लेकिन उन्होंने संगठन बनाने और लोगों को राजनीतिक रूप से जागरूक करने का काम जारी रखा. धीरे-धीरे बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश की प्रमुख राजनीतिक शक्तियों में शामिल हुई.
उनकी बनाई पार्टी ने मायावती जैसे नेताओं को आगे बढ़ाया और भारतीय राजनीति में दलित नेतृत्व की भूमिका को नई पहचान दी.
साल 2006 में 9 अक्टूबर को कांशीराम का निधन हो गया. उनकी पुण्यतिथि पर उनकी यात्रा को याद करना केवल एक नेता को श्रद्धांजलि देना नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक विचार को समझना भी है, जिसने सामाजिक न्याय की लड़ाई को सत्ता में हिस्सेदारी के सवाल से जोड़ा.
सरकारी नौकरी छोड़कर उतरे सामाजिक आंदोलन में
कांशीराम का जन्म 15 मार्च 1934 को पंजाब के रोपड़ क्षेत्र में हुआ था. उन्होंने विज्ञान विषय से स्नातक की पढ़ाई की और सरकारी वैज्ञानिक संस्थानों में काम किया. नौकरी के दौरान जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता से जुड़े अनुभवों ने उनकी सोच को प्रभावित किया. डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों से उनका जुड़ाव मजबूत हुआ और उन्होंने सामाजिक बदलाव के लिए अपना जीवन समर्पित करने का निर्णय लिया.
कांशीराम ने महसूस किया कि सरकारी सेवाओं में पहुंचे वंचित समुदायों के कर्मचारी अपने व्यक्तिगत जीवन में आगे बढ़ने के साथ समाज में भी बदलाव ला सकते हैं. इसी सोच के तहत उन्होंने 1970 के दशक में सरकारी कर्मचारियों को संगठित करने का काम शुरू किया. इस प्रयास से BAMCEF यानी बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एम्प्लॉइज फेडरेशन का विकास हुआ. साल 1978 के आसपास इस संगठन को व्यवस्थित रूप दिया गया. इसका उद्देश्य वंचित समुदायों के शिक्षित और नौकरीपेशा लोगों को सामाजिक जागरूकता तथा संगठन के काम से जोड़ना था.
इसके बाद कांशीराम ने आम लोगों तक पहुंचने के लिए दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (DS-4) का गठन किया. साल 1981 में शुरू हुए इस मंच के जरिए उन्होंने सामाजिक असमानता के खिलाफ जनजागरण और राजनीतिक लामबंदी की कोशिश की. उनका मानना था कि सामाजिक बदलाव के लिए केवल अधिकारों की मांग करना पर्याप्त नहीं है. वंचित समुदायों को अपने हितों के लिए संगठित होकर राजनीतिक निर्णयों में भागीदारी हासिल करनी होगी.
इसी क्रम में 14 अप्रैल 1984 को डॉ. आंबेडकर की जयंती के दिन बहुजन समाज पार्टी की स्थापना हुई. कांशीराम ने सामाजिक संगठन से आगे बढ़कर चुनावी राजनीति में उतरने का रास्ता चुना. उनकी बहुजन अवधारणा में अनुसूचित जातियों के साथ अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों और दूसरे वंचित समूहों को भी शामिल करने की कोशिश की गई.
उनका चर्चित नारा था, ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी.’ इस नारे के जरिए उन्होंने शासन, प्रशासन और राजनीतिक संस्थाओं में आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व का सवाल उठाया. उनके लिए राजनीति का उद्देश्य केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि उन समुदायों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में जगह दिलाना था, जिनकी आवाज लंबे समय तक सीमित रही थी.
मायावती और बहुजन राजनीति का विस्तार
बहुजन समाज पार्टी के गठन के बाद कांशीराम ने चुनावी राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश की. शुरुआत में उन्हें कई चुनावों में हार का सामना करना पड़ा, लेकिन पार्टी ने उत्तर प्रदेश में धीरे-धीरे अपना जनाधार तैयार किया. साल 1989 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में BSP ने 13 सीटें जीतीं. इससे पार्टी को राज्य की राजनीति में पहचान मिली.
साल 1991 में कांशीराम उत्तर प्रदेश की इटावा लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे. साल 1996 में उन्होंने पंजाब की होशियारपुर सीट से जीत हासिल की. बाद में वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे. उनकी राजनीतिक यात्रा ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक न्याय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े सवाल उठाने का मंच दिया.
कांशीराम की राजनीति में मायावती की भूमिका महत्वपूर्ण रही. उन्होंने मायावती को संगठन और चुनावी राजनीति में आगे बढ़ाया. साल 1995 में मायावती पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. वहीं 15 दिसंबर 2001 को कांशीराम ने लखनऊ की एक रैली में उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया. साल 2003 में मायावती BSP की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं.
कांशीराम ने संगठन खड़ा करने और वंचित समुदायों को राजनीतिक रूप से लामबंद करने पर जोर दिया, जबकि मायावती ने उस आधार को चुनावी गठबंधनों और सरकार बनाने की रणनीति के जरिए आगे बढ़ाया. दोनों की भूमिका ने BSP को उत्तर प्रदेश की प्रमुख राजनीतिक शक्तियों में स्थापित करने में योगदान दिया.
कांशीराम का निधन 9 अक्टूबर 2006 को नई दिल्ली में हुआ. उनकी राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने वंचित समुदायों को केवल दूसरी पार्टियों के समर्थक के रूप में देखने के बजाय उन्हें स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनाने की कोशिश की. उन्होंने कर्मचारियों के संगठन से शुरुआत की, जनआंदोलन का मंच तैयार किया और अंततः राजनीतिक पार्टी बनाकर सत्ता में भागीदारी की राह चुनी.
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