झारखंड में डीजीपी की नियुक्ति का मामला पहले से सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. अब इसी विवाद के बीच केंद्र सरकार ने अलग से अवमानना याचिका दायर की है. केंद्र का आरोप है कि झारखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के डीजीपी नियुक्ति से जुड़े निर्देशों का पालन नहीं किया और 2025 में ऐसे नियम बनाए जो अदालत के निर्देशों के अनुरूप नहीं हैं. केंद्र की इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार, 8 अक्टूबर को सुनवाई होगी.
केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बुधवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने मामले का उल्लेख किया. पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं. केंद्र ने आग्रह किया है कि उसकी याचिका को डीजीपी नियुक्ति से जुड़े पहले से लंबित मामलों के साथ सुना जाए.
तदाशा मिश्रा की नियुक्ति का मामला पहले से सुप्रीम कोर्ट में
तदाशा मिश्रा को 30 दिसंबर 2025 को झारखंड का डीजीपी नियुक्त किया गया था. उनकी सेवानिवृत्ति 31 दिसंबर 2025 को होनी थी. यानी नियुक्ति के समय उनकी सेवा में सिर्फ एक दिन बचा था. इस नियुक्ति को लेकर पहले से सुप्रीम कोर्ट में मामला चल रहा है. सुनवाई के दौरान यह सवाल उठ चुका है कि क्या सेवानिवृत्ति से ठीक एक दिन पहले किसी अधिकारी को डीजीपी नियुक्त किया जा सकता है.
मामले में अदालत की मदद कर रहे वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने भी तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट के डीजीपी नियुक्ति से जुड़े पुराने निर्देशों के संदर्भ में उठाया था. अब केंद्र ने इसी विवाद में अपनी अलग याचिका दाखिल की है. केंद्र का कहना है कि मामला केवल एक अधिकारी की नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि झारखंड सरकार द्वारा डीजीपी नियुक्ति के लिए बनाए गए 2025 के नियम भी सवालों के घेरे में हैं.
केंद्र ने 2025 के नियम और नियुक्ति प्रक्रिया पर उठाए सवाल
झारखंड सरकार ने 8 जनवरी 2025 को डीजीपी की नियुक्ति से जुड़े नियम अधिसूचित किए थे. केंद्र का आरोप है कि इन नियमों को बनाते समय सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में दिए गए निर्देशों का पालन नहीं किया गया. सुप्रीम कोर्ट ने डीजीपी की नियुक्ति के लिए एक प्रक्रिया तय कर रखी है. इसके तहत राज्य सरकार को मौजूदा डीजीपी की सेवानिवृत्ति से कम से कम तीन महीने पहले अधिकारियों का प्रस्ताव संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) को भेजना होता है. यूपीएससी योग्य अधिकारियों का पैनल तैयार करता है और राज्य सरकार उसी पैनल में से डीजीपी का चयन करती है.
केंद्र का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के विपरीत कोई नियम बनाने से पहले राज्य को अदालत का रुख करना चाहिए था. लेकिन झारखंड सरकार ने 2025 के नियम अधिसूचित करने से पहले सुप्रीम कोर्ट से अनुमति नहीं ली. केंद्र ने अदालत से इन नियमों को चुनौती देने के साथ-साथ इनके आधार पर हुई नियुक्तियों को भी अवैध घोषित करने की मांग की है.

केंद्र की याचिका में 29 दिसंबर 2025 को झारखंड सरकार द्वारा नियमों में किए गए बदलाव का भी उल्लेख है. केंद्र के अनुसार, पहले डीजीपी पद के लिए अधिकारी के पास कम से कम छह महीने की सेवा बची होना जरूरी था. 29 दिसंबर को नियम में बदलाव कर यह शर्त हटा दी गई. इसके अगले दिन यानी 30 दिसंबर को तदाशा मिश्रा को डीजीपी नियुक्त कर दिया गया. उनकी सेवानिवृत्ति 31 दिसंबर को होनी थी.
अनुराग गुप्ता की नियुक्ति से लेकर मई की सुनवाई तक
केंद्र ने 2 फरवरी 2025 को अनुराग गुप्ता को डीजीपी बनाए जाने का भी मुद्दा उठाया है. केंद्र के अनुसार, उस समय अनुराग गुप्ता की सेवानिवृत्ति में करीब तीन महीने बचे थे, लेकिन उन्हें दो साल के कार्यकाल के लिए डीजीपी बनाया गया था. उनकी निर्धारित सेवानिवृत्ति 30 अप्रैल 2025 थी. बाद में अनुराग गुप्ता ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन दिया, जिसे झारखंड सरकार ने 6 नवंबर 2025 को मंजूर कर लिया.
केंद्र का कहना है कि इन नियुक्तियों के घटनाक्रम से यह सवाल उठता है कि झारखंड में डीजीपी की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय प्रक्रिया का पालन किस तरह किया गया.
डीजीपी नियुक्ति को लेकर मई 2026 में हुई सुनवाई में भी झारखंड का मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था. अदालत के समक्ष यह बताया गया था कि राज्य में कार्यवाहक डीजीपी काम कर रहे हैं और नियमित डीजीपी की नियुक्ति के लिए यूपीएससी को प्रस्ताव नहीं भेजा गया है.
अदालत ने राज्य सरकार से अनुपालन हलफनामा मांगा था. साथ ही यह सवाल भी उठाया था कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार डीजीपी की नियुक्ति के लिए यूपीएससी को प्रस्ताव क्यों नहीं भेजा गया.
Also Read : मुख्य चुनाव आयुक्त एक्ट से संबंधित फैसले पर होगा पुनर्विचार, CJI बोले- ‘जांच करेंगे और फिर फैसला लेंगे’

