मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक बेहद दिलचस्प और अहम बात सामने आई है. अदालत ने मौखिक रूप से कहा है कि साल 2023 के नए कानून के तहत चुनाव अधिकारियों को जो सुरक्षा दी गई है, वह देश के जजों को मिलने वाली सुरक्षा से भी ज्यादा मजबूत और बड़ी है.
यह मामला सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने आयी है. अदालत चुनाव आयोग के एक फैसले (विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी.
क्या है पूरा मामला और विवाद क्यों उठा?
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने साल 2023 में बने ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम’ की धारा 16 का मुद्दा उठाया.
इस कानून के मुताबिक, मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को उनके सरकारी या आधिकारिक कामों के लिए किसी भी दीवानी (सिविल) या फौजदारी (आपराधिक) कार्रवाई से पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है.
हैरानी की बात यह है कि यह सुरक्षा उनके पद पर रहते हुए ही नहीं, बल्कि पद छोड़ने के बाद भी बनी रहती है यानी वे रिटायरमेंट के बाद भी अपने फैसलों को लेकर कानूनी मामलों से बचे रहेंगे.
जजों और चुनाव आयुक्तों की सुरक्षा में क्या फर्क है?
याचिकाकर्ता के वकील ने जब इसकी तुलना जजों को मिलने वाली सुरक्षा (जजेस प्रोटेक्शन एक्ट, 1985) से की, तो एक बड़ा अंतर सामने आया:
जजों के मामले में: जजों को भी अपने फैसलों के लिए सुरक्षा मिलती है, लेकिन कानून में यह साफ लिखा है कि अगर कोई जज गलत काम करता है, तो सरकार या अदालतें जरूरत पड़ने पर उसके खिलाफ कानूनी या विभागीय कार्रवाई कर सकती हैं. यानी जजों की सुरक्षा पर एक लगाम या नियम है.
चुनाव आयुक्तों के मामले में: इसके विपरीत, 2023 के नए कानून में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिसके तहत चुनाव आयुक्तों पर कोई कानूनी या विभागीय जांच बिठाई जा सके.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
इसी अंतर को देखते हुए जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने टिप्पणी की कि इस तरह की पूर्ण और पक्की सुरक्षा तो शायद सिर्फ देश के राष्ट्रपति को मिलती है, जो जजों के पास भी नहीं होती.
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि चुनाव आयोग के कुछ फैसलों (विशेषकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा) को एकतरफा तरीके से लिया गया है. इसी को लेकर वे चुनाव अधिकारियों की जवाबदेही तय करना चाहते हैं.
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाने जैसी किसी भी मांग पर तुरंत कोई एकतरफा आदेश देने से इनकार कर दिया है. हालांकि, कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और चुनाव आयुक्तों को नोटिस भेजकर इस पर जवाब मांगा है.
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