इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जनजाति (ST) की पहचान और आदिवासी जमीन की खरीद-बिक्री से जुड़े एक अहम मामले में 14 सितंबर को बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ जन्म से किसी जनजाति का सदस्य होना या ST प्रमाण पत्र होना हर स्थिति में पर्याप्त नहीं है. अगर किसी व्यक्ति के ST दर्जे पर सवाल उठता है, तो यह भी देखा जा सकता है कि जमीन खरीदने के समय तक वह संबंधित जनजातीय समुदाय से जुड़ा था या नहीं.
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सिर्फ धर्म परिवर्तन या दूसरे धर्म में शादी कर लेने से किसी व्यक्ति का ST दर्जा अपने आप खत्म नहीं होता. इसके लिए व्यक्ति की जनजातीय पहचान, सामाजिक संबंध और समुदाय से जुड़े रहने के सबूतों को देखा जाना जरूरी है.
सोनभद्र की महिला की तीन जमीन खरीद पर विवाद
मामला सोनभद्र जिले के दुद्धी तहसील की रहने वाली नन्हकी उर्फ नैमुनिशा से जुड़ा है. महिला ने दावा किया था कि वह जन्म से भुइयां अनुसूचित जनजाति से हैं. उनके पिता भी भुइयां समुदाय से थे और उनके पास तहसीलदार की ओर से जारी ST प्रमाण पत्र था.
महिला ने 2011, 2017 और 2018 में सोनभद्र में कृषि भूमि के तीन हिस्से खरीदे थे. उनका कहना था कि जिन लोगों से उन्होंने जमीन खरीदी, वे भी अनुसूचित जनजाति से थे. इसलिए दोनों पक्षों के बीच हुआ जमीन का लेन-देन कानून के मुताबिक था. बाद में राजस्व अधिकारियों ने इन जमीन सौदों की वैधता पर सवाल उठाया और महिला के ST status की जांच की.
मुस्लिम व्यक्ति से शादी के बाद बदली सामाजिक पहचान का हवाला
राज्य की ओर से अदालत में महिला की शादी और बाद की सामाजिक पहचान से जुड़े दस्तावेज पेश किए गए. राज्य का कहना था कि महिला ने सिराजुद्दीन नाम के मुस्लिम व्यक्ति से इस्लामी रीति-रिवाज से शादी की थी. इसके बाद वह नैमुनिशा नाम से जानी गईं.
राज्य ने यह भी बताया कि उनके परिवार से जुड़े रिकॉर्ड में मुस्लिम पहचान दर्ज थी और उनके बच्चों के नाम भी मुस्लिम नामों के रूप में दर्ज थे. सरकार का तर्क था कि महिला लंबे समय तक अपने मूल जनजातीय समुदाय की सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था से अलग रही.
महिला ने कहा- शादी से नहीं खत्म होता ST दर्जा
महिला की ओर से अदालत में कहा गया कि वह जन्म से भुइयां ST हैं और उन्होंने अपनी जनजातीय पहचान नहीं छोड़ी है. सिर्फ मुस्लिम व्यक्ति से शादी करने या किसी रिकॉर्ड में मुस्लिम दर्ज होने से उनका ST status खत्म नहीं हो सकता.
उन्होंने यह भी दावा किया कि वह अपने गांव में रहती रहीं और जनजातीय समुदाय से उनका संबंध बना रहा. इसलिए उनके पास मौजूद ST प्रमाण पत्र के आधार पर जमीन खरीद को अवैध नहीं माना जा सकता.
HC ने कहा- धर्म परिवर्तन अपने आप ST दर्जा नहीं छीनता
हाईकोर्ट ने इस मामले में एक अहम बात स्पष्ट की. अदालत ने कहा कि धर्म परिवर्तन अपने आप किसी व्यक्ति का ST status खत्म नहीं करता. यानी कोर्ट ने यह नियम नहीं बनाया कि अगर कोई आदिवासी व्यक्ति हिंदू धर्म से किसी दूसरे धर्म में चला जाता है या दूसरे धर्म के व्यक्ति से शादी करता है तो उसका ST दर्जा खत्म हो जाएगा.
लेकिन अदालत ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति की ST पहचान पर सवाल उठता है, तो यह देखना जरूरी होगा कि वह संबंधित जनजाति के रीति-रिवाज, सामाजिक जीवन, समुदाय और जनजातीय पहचान से लगातार जुड़ा हुआ था या नहीं.
महिला जनजातीय पहचान का पर्याप्त सबूत नहीं दे सकीं
हाईकोर्ट ने पाया कि महिला जमीन खरीदने की संबंधित तारीखों पर अपनी निरंतर जनजातीय पहचान साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सकीं. अदालत ने उनकी शादी, लंबे समय से चली आ रही सामाजिक पहचान, सरकारी रिकॉर्ड और जनजातीय समुदाय से उनके संबंध से जुड़े दस्तावेजों को सामूहिक रूप से देखा.
कोर्ट के मुताबिक महिला यह दिखाने में असफल रहीं कि वह जमीन खरीदने के समय भी भुइयां समुदाय के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन से उसी तरह जुड़ी हुई थीं और समुदाय उन्हें अपनी सदस्य के रूप में स्वीकार करता था.
हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह जीवनभर जनजाति की हर परंपरा और रीति-रिवाज का पालन करता रहे. इसी तरह केवल किसी दस्तावेज में धर्म का उल्लेख होने से भी ST status अपने आप खत्म नहीं माना जा सकता. इस मामले में कोर्ट ने पूरी परिस्थितियों और उपलब्ध सबूतों को एक साथ देखते हुए फैसला दिया.
तीनों जमीन सौदे रद्द
डिप्टी कलेक्टर, दुद्धी ने 22 जनवरी 2026 को महिला की तीनों जमीन खरीद को कानून के खिलाफ मानते हुए रद्द कर दिया था. महिला ने इन आदेशों को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. हाईकोर्ट ने 14 सितंबर 2026 को तीनों याचिकाएं खारिज कर दीं और डिप्टी कलेक्टर के आदेश को बरकरार रखा.
मामला उत्तर प्रदेश में ST जमीन के हस्तांतरण पर लागू कानूनी प्रावधानों से जुड़ा था. अदालत ने माना कि अगर जमीन का लेन-देन कानून के तहत प्रतिबंधित श्रेणी में आता है, तो सिर्फ रजिस्ट्री हो जाने या राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने से वह लेन-देन वैध नहीं हो जाता.
Case title – Nanhki @ Naimunnisha vs. State of U.P. and 3 others along with connected petitions

