जोहार लाइव ब्यूरो
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार 15 सितंबर को अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दायर अवमानना याचिका पर नोटिस जारी किया. यह याचिका केंद्रीय शिक्षा सचिव टी.के. अनिल कुमार के खिलाफ दायर की गई है. इसमें आरोप लगाया गया है कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थानों को विनियमित करने के संबंध में उनके प्रतिनिधित्व पर विचार करने के सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देश का पालन नहीं किया गया.
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने शिक्षा सचिव को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने से भी छूट दे दी. कोर्ट ने मामले को चार सप्ताह बाद सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया.
यह अवमानना याचिका उपाध्याय के उस प्रतिनिधित्व से जुड़ी है, जिसमें 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को धर्मनिरपेक्ष या धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थानों के पंजीकरण और निगरानी की मांग की गई थी. याचिका में आरोप लगाया गया है कि सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देश के बावजूद केंद्रीय शिक्षा सचिव ने इस प्रतिनिधित्व पर कोई फैसला नहीं लिया.
उपाध्याय की याचिका के मुताबिक, हजारों गैर-पंजीकृत संस्थान धार्मिक शिक्षा देने की आड़ में मासूम छोटे बच्चों को कट्टरपंथ की ओर ले जा रहे हैं, क्योंकि इन संस्थानों की राज्य की ओर से निगरानी नहीं की जाती. उनका कहना है कि इसका असर केवल आंतरिक सुरक्षा पर ही नहीं, बल्कि बंधुत्व, एकता और राष्ट्रीय एकीकरण पर भी पड़ सकता है. उनका तर्क है कि धर्म के नाम पर छोटे बच्चों का आसानी से ब्रेनवॉश किया जा सकता है.
चार सप्ताह बाद फिर होगी सुनवाई
याचिका में यह भी मांग की गई है कि अर्ध-धार्मिक अल्पसंख्यक और गैर-अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को संविधान के अनुच्छेद 30 के दायरे में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि यह अनुच्छेद 19(1)(g) की विशिष्ट पुनरावृत्ति है और इससे कोई अतिरिक्त अधिकार नहीं मिलता.
उपाध्याय ने यह भी कहा है कि अनुच्छेद 30(a) में इस्तेमाल किए गए शब्द ‘अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान’ का अर्थ ‘अपनी पसंद के धर्मनिरपेक्ष/व्यावसायिक शैक्षणिक संस्थान’ होना चाहिए, न कि धार्मिक शिक्षण संस्थान. उनका दावा है कि किसी धर्म को बढ़ावा देने के लिए धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थान संविधान के अनुच्छेद 26(a) के तहत आते हैं.
प्रतिनिधित्व पर विचार नहीं किए जाने का आरोप लगाते हुए उपाध्याय ने अब अवमानना याचिका दायर की है. सुप्रीम कोर्ट ने मामले को चार सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है.
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