झारखंड हाईकोर्ट ने पत्रकारों और मीडिया जगत के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण और राहत भरा फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई रिपोर्टर किसी पुलिस अधिकारी के आधिकारिक बयान या दी गई जानकारी के आधार पर खबर प्रकाशित करता है, तो सिर्फ उस बयान को छापने के लिए उसे आपराधिक मानहानि का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. कोर्ट ने कहा कि पत्रकार ने अपनी ओर से कोई नया आरोप नहीं लगाया था, बल्कि उसने केवल पुलिस अधिकारी के बयान को जनता के सामने रिपोर्ट किया था.
क्या था पूरा मामला?
यह पूरा कानूनी विवाद देवघर के ए.एस. कॉलेज से जुड़ा हुआ है. कॉलेज में कार्यरत एक हेड क्लर्क (शिकायतकर्ता) ने ‘प्रभात खबर’ अखबार में प्रकाशित एक रिपोर्ट को लेकर आपत्ति जताई थी. इस खबर में उनके निलंबन और तत्कालीन प्रिंसिपल डॉ. एच. नारायण के कार्यकाल के दौरान उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज होने की बात कही गई थी. शिकायतकर्ता का तर्क था कि इस रिपोर्ट के प्रकाशन से समाज में उनकी प्रतिष्ठा को गहरी ठेस पहुंची है और उन्हें मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी है.
शुरुआती दौर में ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में प्रतिवादी संख्या 2 से 4 को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 500 के तहत दोषी करार दिया था और उन्हें एक साल की साधारण कैद की सजा सुनाई थी. हालांकि, बाद में सेशन कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए आरोपियों की सजा को पूरी तरह रद्द कर दिया. इसी सेशन कोर्ट के फैसले के खिलाफ शिकायतकर्ता ने झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.
हाईकोर्ट की खंडपीठ की अहम टिप्पणियां
जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय और जस्टिस अरुण कुमार राय की डिवीजन बेंच के समक्ष सुनवाई के लिए आया था. अदालत ने मामले से जुड़ी मूल खबर की गहराई से जांच की और पाया कि रिपोर्ट में तत्कालीन एसडीपीओ (SDPO) विपुल शुक्ला का आधिकारिक बयान शामिल था. एसडीपीओ के बयान के अनुसार, बीए और बीकॉम में दाखिले के लिए फर्जी प्रमाण पत्र जमा किए गए थे और जांच के दौरान हेड क्लर्क समेत कुछ अन्य लोगों को इन अवैध दाखिलों के लिए जिम्मेदार पाया गया था.
कोर्ट ने अपने विश्लेषण में दो मुख्य बिंदुओं पर विशेष जोर दिया
- रिपोर्टर की सीमित भूमिका: अदालत ने माना कि प्रतिवादी नंबर 4 यानी ‘प्रभात खबर’ के रिपोर्टर ने अपनी तरफ से कोई मनगढ़ंत या झूठा आरोप नहीं लगाया था. उसने केवल एक जिम्मेदार पुलिस अधिकारी के बयान को निष्पक्ष रूप से प्रकाशित किया था.
- पुलिस अधिकारी पर कोई कार्रवाई नहीं: हाईकोर्ट ने इस बात को भी रेखांकित किया कि शिकायतकर्ता ने उस पुलिस अधिकारी (एसडीपीओ) के खिलाफ मानहानि की कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी, जिनके बयान को मुख्य आधार बनाकर वह खबर छापी गई थी.
डिवीजन बेंच ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि चूंकि संबंधित व्यक्ति केवल एक रिपोर्टर था और उसने आधिकारिक पुलिस बयान को प्रकाशित करने की अपनी पेशेवर जिम्मेदारी निभाई थी, इसलिए उसे उस बयान के लिए आपराधिक रूप से उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता.
इन सभी तर्कों और कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, हाईकोर्ट ने सेशन कोर्ट के फैसले में किसी भी तरह का हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और अपीलकर्ता की याचिका को खारिज कर दिया. साथ ही, अदालत ने मामले से जुड़े सभी लंबित अंतरिम आवेदनों को भी समाप्त कर दिया. यह फैसला स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता के दृष्टिकोण से एक बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है.
Case Title: Bimlendu Narayan Ball v. State of Jharkhand and Ors (29 अगस्त 2026)
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