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    Home»जोहार ब्रेकिंग»Indian Airlines Hijacking के 50 साल : जब आसमान में तनी बंदूकें, लाहौर में बेहोश हुए हाईजैकर्स, आज भी रहस्य बनी है ये पूरी कहानी
    जोहार ब्रेकिंग

    Indian Airlines Hijacking के 50 साल : जब आसमान में तनी बंदूकें, लाहौर में बेहोश हुए हाईजैकर्स, आज भी रहस्य बनी है ये पूरी कहानी

    Muskan ChoudharyBy Muskan ChoudharySeptember 10, 2026No Comments7 Mins Read4
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    1976 Indian Airlines Hijacking
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    10 सितंबर 1976 की सुबह दिल्ली का पालम एयरपोर्ट बाकी दिनों की तरह ही व्यस्त था. इंडियन एयरलाइंस का बोइंग-737 मुंबई के लिए उड़ान भरने की तैयारी में था. विमान में 83 यात्री सवार थे. किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही देर बाद यही विमान भारत के इतिहास की एक ऐसी हाईजैकिंग का हिस्सा बनने वाला है, जिसकी कहानी में डर, चालाकी, बातचीत, पाकिस्तान, बेहोशी की दवा और कई अनसुलझे सवाल शामिल हैं.

    हम इस घटना को इसलिए याद कर रहे हैं क्योंकि आज इस हाईजैकिंग को पूरे 50 साल हो गए हैं. पांच दशक बीत जाने के बाद भी यह घटना सिर्फ भारत की विमान सुरक्षा के इतिहास का एक अध्याय नहीं है, बल्कि यह बताती है कि संकट की उस घड़ी में पायलटों की सूझबूझ, बातचीत की रणनीति और भारत-पाकिस्तान जैसे तनावपूर्ण रिश्तों के बीच हुई एक असाधारण कार्रवाई ने कैसे दर्जनों यात्रियों की जान बचाई.

    सुबह करीब 7:35 बजे विमान को दिल्ली से उड़ान भरी. मंजिल थी मुंबई. जहाज कमांडर बीएन रेड्डी और को-पायलट आरएस यादव विमान संभाल रहे थे. यात्रियों के लिए यह एक सामान्य हवाई सफर था. कोई खिड़की से बादलों को देख रहा था, कोई अपने गंतव्य के बारे में सोच रहा था और क्रू अपने रोजमर्रा के काम में व्यस्त था. लेकिन टेकऑफ करते ही दो लोग कॉकपिट में आ गए. उन्होंने रेड्डी की कनपटी पर बंदूक अड़ाई और विमान लीबिया ले जाने के लिए अड़ गए.

    विमान हवा में था. उनके हाथों में पिस्तौल थी. उन्होंने पायलटों को धमकाकर विमान पर कब्जा कर लिया. कुछ ही पलों में एक सामान्य यात्री विमान हाईजैक हो चुका था. कॉकपिट में बंदूक देखकर पायलटों के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि यात्रियों की जान बचाई जाए और विमान को ऐसी जगह पहुंचाया जाए जहां स्थिति को संभालने का मौका मिल सके.

    इधर विमान के हाईजैक होने की सूचना एयर ट्रैफिक कंट्रोल तक पहुंची. भारतीय एजेंसियां सक्रिय हो गईं. जमीन पर बैठे अधिकारियों के सामने सबसे बड़ा सवाल था कि विमान कहां जाएगा और अपहरणकर्ताओं का अगला कदम क्या होगा? शुरुआती जानकारी के मुताबिक अपहरणकर्ता विमान को लीबिया ले जाना चाहते थे. लेकिन विमान को इतने लंबे सफर के लिए पर्याप्त ईंधन नहीं था. यहीं से कमांडर बीएन रेड्डी की सूझबूझ काम आई.

    पायलट ने दिखाई चालाकी, विमान पहुंचा लाहौर

    पायलटों ने अपहरणकर्ताओं को बताया कि विमान में ईंधन कम है और इतनी लंबी दूरी तय करना संभव नहीं होगा. इस दौरान बातचीत के जरिए विमान का रुख बदलने की कोशिश हुई. अपहरणकर्ता कराची जाने पर जोर दे रहे थे. आखिरकार विमान पाकिस्तान की ओर बढ़ा और लाहौर में उतर गया. यहां कहानी ने एक और दिलचस्प मोड़ लिया.

    जिस समय भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते सामान्य नहीं थे, उसी समय पाकिस्तान की जमीन पर एक भारतीय विमान हाईजैक होकर पहुंच चुका था. विमान में दर्जनों भारतीय नागरिक थे और हथियारबंद अपहरणकर्ता उनके बीच मौजूद थे. भारत ने पाकिस्तान से मदद मांगी और पाकिस्तान ने मदद के लिए कदम बढ़ाया.

    लाहौर एयरपोर्ट पर शुरू हुआ दूसरा ड्रामा

    लाहौर में विमान को रोक लिया गया. अपहरणकर्ताओं के साथ बातचीत शुरू हुई. यात्रियों और क्रू को सुरक्षित बाहर निकालना प्राथमिकता थी. कई रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तानी अधिकारियों ने रात होने का हवाला देकर विमान को वहीं रोके रखा. इस दौरान विमान में खाने-पीने का इंतजाम किया गया.

    यहीं से इस पूरी घटना की कहानी सबसे ज्यादा रहस्यमयी हो जाती है. रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तान में अधिकारियों ने हाईजैकर्स के लिए खाने-पीने का इंतजाम किया. फिर उन्हें नाश्ते के दौरान पानी दिया गया. उस पानी में कथित तौर पर बिना रंग वाली बेहोश करने वाली दवा यानी ट्रैंक्विलाइजर मिला हुआ था. हाईजैकर्स को इसका अंदाजा नहीं था. उन्होंने पानी पी लिया. कुछ देर बाद दवा ने असर करना शुरू किया और वे बेहोश हो गए. इसके बाद पाकिस्तानी अधिकारियों ने सभी छह हाईजैकर्स (सैयद अब्दुल हमीद दीवानी, सैयद एम. रफीक, एम. अहसान राठौर, अब्दुल रशीद मलिक, गुलाम रसूल और ख्वाजा गुलाम नबी इत्तू) को हिरासत में ले लिया. विमान में मौजूद यात्रियों और चालक दल को सुरक्षित निकाल लिया गया.

    हाईजैक के अगले दिन यानी 11 सितंबर 1976 को विमान यात्रियों और चालक दल के साथ भारत लौट आया. इस पूरे घटनाक्रम में किसी यात्री की मौत नहीं हुई. कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ. और सबसे अहम बात, हाईजैकर्स को विमान से यात्रियों को छुड़ाने के लिए किसी आतंकी की रिहाई जैसी मांग भी पूरी नहीं करनी पड़ी. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई.असल सवाल तो इसके बाद शुरू हुआ.

    आखिर विमान हाईजैक क्यों किया गया था?

    इस घटना से जुड़े कई विवरण सामने आए. बताया गया कि हाईजैकर्स कश्मीर से जुड़े मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाना चाहते थे. कुछ रिपोर्टों में इन्हें कश्मीरी अलगाववादी युवकों से जोड़कर बताया गया. हालांकि, इस मामले की अलग-अलग रिपोर्टों में हाईजैकर्स की संख्या और उनकी पहचान को लेकर अंतर मिलता है. यही वजह है कि इस घटना को समझने में आज भी सावधानी जरूरी है.

    हाईजैकर्स को पाकिस्तान में गिरफ्तार किया गया. भारत की ओर से भी इस मामले को गंभीरता से लिया गया. लेकिन कुछ महीनों बाद जनवरी 1977 में पाकिस्तान ने इन अपहरणकर्ताओं सबूतों के अभाव का हवाला देकर रिहा कर दिया. भारत ने इसका विरोध किया. यह फैसला उस दौर के भारत-पाकिस्तान संबंधों और सीमा पार राजनीति के संदर्भ में भी देखा गया.

    हाईजैकिंग के बाद भारत में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठे. घटना के बाद सुरक्षा कर्मचारियों के 11 सदस्यों को निलंबित किया गया. तत्कालीन पर्यटन और नागरिक उड्डयन मंत्री राज बहादुर ने घटना और एयरपोर्ट की सुरक्षा व्यवस्था की विस्तृत तथा गहन जांच का आदेश देने की बात कही.

    1971 के ‘गंगा’ से लेकर 1976 के बोइंग-737 तक

    भारत में विमान हाईजैकिंग की चर्चा अक्सर 1999 के कंधार कांड और IC-814 से शुरू होती है. लेकिन भारतीय विमानन इतिहास में इससे बहुत पहले भी हाईजैकिंग हो चुकी थी. 1971 में इंडियन एयरलाइंस के विमान ‘गंगा’ का अपहरण किया गया था. उसके कुछ साल बाद 1976 में बोइंग-737 हाईजैक हुआ.

    1976 की घटना इसलिए अलग थी क्योंकि इसमें हाईजैकर्स ने विमान को हथियारों के दम पर अपने कब्जे में लिया, लेकिन पायलटों की समझदारी और बाद में पाकिस्तान में हुई कार्रवाई ने हालात को बड़े हादसे में बदलने से रोक दिया. यह कहानी इस बात का भी उदाहरण है कि विमान हाईजैकिंग केवल बंदूक और धमकी का मामला नहीं होता. कॉकपिट में बैठे पायलट का हर फैसला यात्रियों की जिंदगी तय कर सकता है.

    आज 50 साल बाद भी कुछ सवाल बाकी हैं

    10 सितंबर 1976 को हुई इस घटना को आज 50 साल हो चुके हैं. वक्त गुजर गया, विमानन सुरक्षा के नियम बदल गए, एयरपोर्ट की सुरक्षा कई गुना बढ़ गई और हाईजैकिंग से निपटने के तरीके भी बदल गए. लेकिन इस घटना के कुछ सवाल आज भी इतिहास के पन्नों में मौजूद हैं. क्या हाईजैकिंग का मकसद सिर्फ कश्मीर के मुद्दे को दुनिया के सामने लाना था? क्या इसके पीछे कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क था? हाईजैकर्स को पाकिस्तान में इतनी आसानी से रिहाई कैसे मिली?

    इन सवालों के जवाब अलग-अलग रिपोर्टों और उपलब्ध दस्तावेजों में अलग-अलग रूप में मिलते हैं. लेकिन पूरी तस्वीर आज भी उतनी साफ नहीं है, जितनी किसी ऐतिहासिक घटना की होनी चाहिए. यही वजह है कि 10 सितंबर 1976 की वह सुबह आज भी भारतीय विमानन इतिहास में एक अनोखे अध्याय की तरह दर्ज है.

    Also Read : गैंगस्टर अबू सलेम की अग्रिम रिहाई की याचिका खारिज, 1993 मुंबई ब्लास्ट में काट रहा है उम्रकैद

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