जोहार लाइव ब्यूरो
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा है कि खुद को “इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट” कहने वाली किसी निजी धार्मिक संस्था के पास किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति या उसके कानूनी अधिकारों और दायित्वों पर फैसला सुनाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है.
कोर्ट ने तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता पर फिलहाल कोई फैसला नहीं दिया. कोर्ट ने कहा कि इस संबंध में कुछ मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं. हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी धार्मिक संस्था या निजी निकाय को धार्मिक मान्यताओं के आधार पर किसी व्यक्ति की कानूनी स्थिति और अधिकार तय करने या उन्हें लागू कराने की अनुमति नहीं दी जा सकती.
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता के पहले पति की मौत के बाद उसने प्रतिवादी नंबर 10 से शादी की थी. बाद में प्रतिवादी ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता के पहले विवाह से हुए बच्चे नए परिवार के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे थे. इसी आधार पर याचिकाकर्ता को तलाक-ए-बिद्दत यानी ट्रिपल तलाक दिए जाने की बात कही गई.
मामले में एफआईआर दर्ज होने और सक्षम अधिकारियों के समक्ष कार्यवाही लंबित होने के बावजूद इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट ने 18 जनवरी 2022 को विवादित आदेश जारी कर दिया.
बुधवार 9 सितंबर को जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे. याचिका में 18 जनवरी 2022 को इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट की ओर से जारी आदेश को चुनौती दी गई थी. इस आदेश में कथित तौर पर कहा गया था कि याचिकाकर्ता को ट्रिपल तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत के जरिए तलाक दिया जा चुका है.
याचिकाकर्ता ने इस संस्था के अस्तित्व को भी संविधान, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों तथा मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 के खिलाफ बताया था.
इदारा-ए-शरिया को कोर्ट की मान्यता नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी को संविधान या किसी कानून के तहत गठित अदालत के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती. उसके पास याचिकाकर्ता की वैवाहिक स्थिति पर फैसला देने या यह तय करने का अधिकार नहीं है कि उसका पति से तलाक हुआ है या नहीं.
अदालत ने यह भी कहा कि इदारा-ए-शरिया को संविधान या सक्षम विधायिका द्वारा बनाए गए किसी कानून के तहत गठित अदालत के रूप में काम करने का अधिकार नहीं है. संस्था की ओर से जारी कोई राय, फैसला या आदेश जबरन कानूनी प्रक्रिया के जरिए लागू नहीं कराया जा सकता और न ही इसे पक्षकारों के नागरिक या वैवाहिक अधिकारों पर बाध्यकारी फैसला माना जा सकता है.
कोर्ट ने कहा कि धर्म किसी व्यक्ति की अंतरात्मा और व्यक्तिगत आस्था का मार्गदर्शन कर सकता है, लेकिन कोई धार्मिक संस्था या निजी निकाय कानून के तहत स्थापित अदालत का अधिकार अपने हाथ में नहीं ले सकता. धार्मिक विश्वास के आधार पर किसी व्यक्ति की कानूनी स्थिति और अधिकारों को तय या लागू नहीं किया जा सकता. कानून का शासन और संविधान का ढांचा सर्वोपरि है.
कोर्ट ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि फतवा बाध्यकारी नहीं होता और उसे किसी जबरदस्ती वाली कानूनी प्रक्रिया के जरिए लागू नहीं कराया जा सकता. इसके अलावा, फतवा जारी करने वाली संस्थाएं कानून के तहत स्थापित अदालत का दर्जा या अधिकार अपने पास नहीं रख सकतीं.
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