23वां मृत्युदंड सुनाने के बाद एक बार फिर मुजफ्फरनगर से लेकर उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक और कानूनी गलियारों में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (ADJ) रवि कुमार दिवाकर का नाम सुर्खियों में आ गया है. सितंबर 2026 में आए इस फैसले के साथ ही अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच उनकी फास्ट ट्रैक अदालत से कुल 11 मामलों में 23 दोषियों को मौत की सजा सुनाई जा चुकी है. हालांकि भारतीय कानून के तहत सत्र अदालत द्वारा दिए गए मृत्युदंड पर अमल के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट की पुष्टि अनिवार्य होती है.
कौन हैं रवि कुमार दिवाकर
रवि कुमार दिवाकर का जन्म 5 जुलाई 1980 को हुआ था और उनका गृह जनपद उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ है. उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा के दौरान वर्ष 2002 में बी. कॉम, 2005 में एलएल.बी. और 2007 में एलएल.एम. की डिग्रियां प्राप्त कीं. इसके बाद 17 दिसंबर 2009 को उन्होंने मुंसिफ अथवा सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के रूप में उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा में अपना कदम रखा.
उनके न्यायिक करियर की शुरुआत आजमगढ़ जिले में एडिशनल सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद से हुई, जहाँ उन्होंने 2009 से 2013 तक काम किया. इसके बाद 2013 से 2019 के दौरान उन्होंने सुल्तानपुर और बदायूं जिलों में ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट तथा सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के पदों पर जिम्मेदारियां संभालीं. वर्ष 2019 से 2022 के बीच उन्होंने वाराणसी में स्पेशल सीजेएम, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) के सचिव और सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के रूप में अपनी सेवाएं दीं. वाराणसी के बाद 2022 से 2025 के दौरान उन्होंने बरेली और चित्रकूट में जज स्मॉल कॉज कोर्ट तथा अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट) के पद पर काम किया. नवंबर 2025 से वह मुजफ्फरनगर में Fast Track Court No. 3 के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में तैनात हैं.
चर्चित मामले एवं विवाद
वाराणसी में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) रहने के दौरान 2022 में उन्होंने ज्ञानवापी परिसर का वीडियोग्राफिक सर्वे कराने और विवादित स्थल को सील करने का आदेश दिया था, जिससे उन्हें राष्ट्रीय पहचान मिली. इस फैसले के बाद मिली धमकियों को देखते हुए 2024 में एनआईए कोर्ट के विशेष जज ने हाईकोर्ट से उनकी सुरक्षा बढ़ाने की सिफारिश की थी.
बरेली में तैनाती के दौरान वर्ष 2024 में वह तब विवादों में आए जब उन्होंने एक फैसले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तुलना प्लेटो की ‘Philosopher King’ की अवधारणा से कर दी, जिसे बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदेश से हटा दिया.
हाल ही में मुजफ्फरनगर में उनकी अदालत से हत्या से जुड़े करीब 97 गंभीर मामलों को दूसरी अदालत में ट्रांसफर कर दिया गया. इस प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए और सुरक्षा खतरों का जिक्र करते हुए उन्होंने अपने एक फैसले में टिप्पणी की थी कि वह डरपोक जज कहलाने के बजाय मरना पसंद करेंगे.
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