सीजेपी के जुलाई में हुए प्रदर्शनों से जुड़े मामलों की जांच कर रहे पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड इंक्वायरी कमेटी के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने साफ किया कि जांच समिति खुद FIR दर्ज करने या आपराधिक जांच का आदेश नहीं दे सकती. किसी मामले में FIR या आपराधिक जांच का निर्देश देने का अधिकार अदालत के पास रहेगा.
पैनल जांच कर सकता है, FIR का आदेश नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच समिति आरोपों की जांच कर सकती है, संबंधित लोगों की शिकायतें सुन सकती है और अपनी रिपोर्ट व सिफारिशें अदालत के सामने रख सकती है. लेकिन FIR दर्ज करने या आपराधिक जांच शुरू करने का आदेश देना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं होगा.
CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि कमेटी सीधे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में काम करेगी. केंद्र और दिल्ली पुलिस की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि कमेटी की पहली बैठक 15 सितंबर को होगी. अदालत ने कमेटी की कार्यवाही में तेजी लाने पर भी जोर दिया.
1 सितंबर को FIR पर SC ने दिया था बड़ा आदेश
CJP प्रदर्शनों के मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही बड़ा आदेश दे चुका है. 1 सितंबर को अदालत ने Article 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए 20 से 25 जुलाई के बीच हुए प्रदर्शनों से संबंधित FIR को आगे बढ़ाने पर रोक लगा दी थी. अदालत ने इन घटनाओं को लेकर नई FIR दर्ज नहीं करने का भी निर्देश दिया था. हालांकि, गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले कुछ लोगों से जुड़े मामलों को इस आदेश से अलग रखा गया था.
जांच कमेटी को प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कथित कार्रवाई, जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग के आरोपों के साथ-साथ सुरक्षा बलों पर हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे आरोपों की जांच करनी है. कमेटी की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं.
नाबालिग से जुड़े मामले में कोर्ट सख्त
सुनवाई के दौरान 14 साल की एक लड़की से कथित धमकी और प्रताड़ना से जुड़े मामले पर भी सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया. अदालत ने दिल्ली पुलिस को संसद मार्ग थाने में दर्ज FIR पर तुरंत कार्रवाई करने और रिपोर्ट पेश करने को कहा. उत्तर प्रदेश पुलिस को लड़की और उसके परिवार को सुरक्षा देने का भी निर्देश दिया गया.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर किसी बच्चे को धमकी दी जा रही है और आरोपी खुले घूम रहे हैं तो ऐसे मामले में जांच कमेटी की रिपोर्ट का इंतजार नहीं किया जा सकता. कमेटी दस्तावेजी सबूत, शिकायतें और गुमनाम शिकायतें भी ले सकती है और जरूरत पड़ने पर अपनी सिफारिशें सुप्रीम कोर्ट के सामने रखेगी.


