PMO का नाम सुनते ही सरकारी सिस्टम में फाइलें तेज हो जाती हैं, दरवाजे खुल जाते हैं और अफसर सतर्क हो जाते हैं. लेकिन इसी रुतबे को अगर कोई ठग अपनी पहचान बना ले तो? कभी PMO का अधिकारी बनकर, कभी प्रधानमंत्री का संयुक्त सचिव, तो कभी बड़े IAS अफसर का नाम लेकर. किसी ने बुलेटप्रूफ गाड़ी हथिया ली, किसी ने VIP सुरक्षा, किसी ने फाइव स्टार होटल में ठिकाना बनाया और किसी ने सरकारी काम कराने के नाम पर लाखों-करोड़ों का खेल कर दिया. सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि ये लोग कितने बड़े ठग थे. असली सवाल ये है कि फर्जी PMO बनकर घूमने वालों पर सरकारी सिस्टम इतनी आसानी से भरोसा करता कैसे रहा?
2014 से 2026 तक ऐसे तीन दर्जन से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं. कहानी हर बार बदली, किरदार बदले, शहर बदले, लेकिन हथियार एक ही रहा. PMO का नाम.
और अब मुंबई का ताजा मामला इस पूरे खेल की एक और परत खोल रहा है. परसों यानि 7 सितंबर को जियो वर्ल्ड कंवेंशन सेंटर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम की तैयारियों के बीच एक युवक ने खुद को PMO का अधिकारी बताया. मुंबई पुलिस के मुताबिक इस लड़के का नाम रोहन पारेख है. उसके साथ आए बॉडीगार्ड का नाम दिलीप कुंडे है. दिलीप कुंडे के पास से एक पिस्तौल भी बरामद हुआ है. घटना 7 सितंबर की है, जब मुंबई के जियो वर्ल्ड कंवेंशन सेंटर में एक बड़े इवेंट की तैयारियां चल रही थीं. उस इवेंट में मोदीजी को आना था. पूरा मॉल हाई सिक्योर्ड एरिया बन चुका था. तभी रोहन पारेख ने इंट्री ली. पुलिस को इस लौंडे पर शक हुआ. पारेख अपने साथी सहित पकड़ा गया. अब उसके वकील ने कहानी यह बनाई कि रोहन पारेख के पास बाकायदा पीएमओ से नियुक्ति पत्र मिला हुआ था.

वकील का दावा है कि उसे ई-मेल के जरिए PMO में नौकरी का ऑफर लेटर भेजा गया. और उसे ई-मेल पर ही एक आईडी की कॉपी भेजी गई. साथ ही, ये भी दावा किया गया कि उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हस्ताक्षर वाला एक पत्र भी भेजा गया, जिसमें उसे PMO से जुड़ा अधिकारी बताया गया था. कुछ ई-मेल भी कोर्ट में सबूत के तौर पर पेश किए गए. रोहन पारेख के मुताबिक, ” 2024 में उसे PMO में नौकरी का ऑफर लेटर मिला.”
लेकिन सवाल है कि जब उसे तनख्वाह ही नहीं मिल रही थी, तो ये खुद को PMO का असली अफसर कैसे समझता रहा? दूसरा- अगर ये खुद को PMO का अधिकारी बता रहा है तो इसने अपना निजी बॉडीगार्ड कैसे रख लिया?
इस कड़ी में सबसे चर्चित नाम गुजरात के किरण पटेल का रहा है, जिसने 2023 में जम्मू-कश्मीर प्रशासन को इस कदर झांसा दिया कि उसे बुलेटप्रूफ गाड़ी, फाइव स्टार होटल और सुरक्षा तक मिल गई.

आखिर क्या हुआ किरण पटेल का? सरकार भी नहीं चाहती, कि आप उसे याद करें. याद दिला देते हैं. किरण पटेल ने ख़ुद को प्रधानमंत्री कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के रूप में पेश कर कश्मीर में वीवीआईपी सुविधा और ज़ेड प्लस सुरक्षा प्राप्त की थी. मार्च 2023 में जब वह गिरफ्तार हुआ, उसके कई कारनामे उजागर हुए थे. छापेमारी के दौरान किरण पटेल के पास से 10 फर्ज़ी विजिटिंग कार्ड और दो मोबाइल फोन बरामद किए गए. किरण पटेल का बाद में क्या हुआ? किसी को कुछ नहीं मालूम. सवालों के बहुत सारे झोल-झाल हैं? एक समय में पीएमओ जैसे किरण पटेल के मामले में चुप था, अब पारेख वाले मामले में भी खामौशी बरत रहा है.
एक टटका कहानी बिहार से भी है. वहां खगड़िया में एक 420 पकड़ा गया जिसने ख़ुद को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का एजेंट घोषित कर रखा था. मनीष कुमार गुप्ता (उर्फ चिकू) एक फर्जी आईएएस अधिकारी और ठग है, जिसे बिहार पुलिस ने अगस्त 2026 में बिहार के खगड़िया जिले के गोगरी और जमालपुर बाजार इलाके में पुलिस ने छापेमारी कर इसे पकड़ा.वह खुद को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोवाल का गुप्त (अंडरकवर) एजेंट और केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) का अधिकारी बताता था. पुलिस जांच में चिकू के पास 100 करोड़ रुपये से अधिक की अवैध संपत्ति का खुलासा हुआ. इसके पास एक टेस्ला कार (जिस पर ‘भारत सरकार’ का बोर्ड लगा था), लग्जरी गाड़ियां, 5 आईफोन, विदेशी शराब और फर्जी पहचान पत्र मिले.
इस फर्जीवाड़े का तरीका हर मामले में थोड़ा अलग था, लेकिन एक चीज समान रही. सरकारी ताकत की उस पहचान का इस्तेमाल, जो असल में उनके पास थी ही नहीं.
2026 में पी रामा राव के खिलाफ CBI ने मामला दर्ज किया. आरोप है कि वह खुद को PMO का अधिकारी बताकर अपनी पहचान का इस्तेमाल करता था. मामला सिर्फ सरकारी अधिकारियों के सामने खुद को प्रभावशाली दिखाने तक सीमित नहीं रहा. आरोपों के मुताबिक, शादी के कार्ड तक पर PMO से जुड़े पद का रुतबा दिखाया गया. तमिलनाडु के प्रमुख मंदिरों में VIP दर्शन कराने के लिए अधिकारियों पर दबाव बनाने की बात भी जांच में सामने आई. यानी PMO की पहचान यहां एक सरकारी पद से ज्यादा एक ऐसे प्रभावशाली पास की तरह इस्तेमाल होने लगी, जिसके जरिए सामान्य व्यवस्था को अपने लिए बदलवाने की कोशिश की जा सके.
लेकिन PMO के नाम के इस कथित दुरुपयोग की कहानी यहीं खत्म नहीं होती. 2025 में सी श्रीधर का मामला सामने आया, जहां सरकारी दस्तावेज और जमीन के रिकॉर्ड से जुड़ा मामला PMO के फर्जी लेटरहेड तक पहुंच गया. आरोप है कि श्रीधर ने खुद को प्रधानमंत्री का संयुक्त सचिव बताते हुए मैसूर के एक तहसीलदार को पत्र भेजा. पत्र में 1500 करोड़ रुपये से ज्यादा कीमत वाली जमीन के रिकॉर्ड को लेकर निर्देश देने की कोशिश की गई. किसी आम व्यक्ति की ओर से भेजी गई शिकायत और PMO के नाम से भेजे गए कथित आधिकारिक पत्र के बीच सरकारी अधिकारी की प्रतिक्रिया में कितना फर्क हो सकता है, यह मामला उसी सवाल को सामने रखता है. यानी तरीका बदल चुका था. कभी पहचान और पद का इस्तेमाल हो रहा था, तो कभी उस पहचान को सरकारी लेटरहेड और पत्राचार का रूप दिया जा रहा था.
2023 में उत्तर प्रदेश STF की कार्रवाई ने इसी पैटर्न का एक और बड़ा उदाहरण सामने रखा. संजय प्रकाश राय उर्फ संजय शेरपुरिया को गिरफ्तार किया गया. आरोप था कि वह खुद को PMO से जुड़ा हुआ बताकर बड़े कारोबारी और राजनीतिक लोगों के बीच अपनी पहुंच का दावा करता था. उसकी कथित पहचान का इस्तेमाल आर्थिक फायदा उठाने और प्रभावशाली लोगों को प्रभावित करने के लिए किया जाता था. यहां PMO का नाम किसी सरकारी आदेश की तरह नहीं, बल्कि कथित तौर पर प्रभाव और संपर्क की मुद्रा की तरह इस्तेमाल किए जाने का आरोप सामने आया.
इसी साल यानि 2023 में मुंबई की अनामिका उबाले की गिरफ्तारी ने यह भी दिखाया कि इस कथित खेल में महिलाएं भी आरोपी के तौर पर सामने आईं. पुलिस के आरोपों के मुताबिक, वह खुद को PMO की सलाहकार और वरिष्ठ IAS अधिकारी बताकर लोगों को सरकारी टेंडर और ट्रांसफर-पोस्टिंग कराने का भरोसा देती थी. यानी जिस PMO का नाम सुनकर सरकारी मशीनरी में गंभीरता पैदा होती है, उसी नाम को कथित तौर पर लोगों को यह भरोसा दिलाने के लिए इस्तेमाल किया गया कि सरकारी काम आसानी से कराया जा सकता है.
फर्जी पहचान का यह तरीका नया नहीं है. 2020 में दिल्ली में नितिन दिनकर पर खुद को PMO का डायरेक्टर बताने का आरोप लगा था. आरोप था कि वह सरकारी विभागों में ट्रांसफर और पोस्टिंग के नाम पर अधिकारियों पर दबाव बनाता था. इस तरह के मामलों में असली हथियार कोई सरकारी आदेश या कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि उस पद का मनोवैज्ञानिक असर बन जाता है, जिसका नाम लिया जा रहा है. और जब यही तरीका एक व्यक्ति से आगे बढ़कर गिरोह तक पहुंचता है तो मामला और गंभीर हो जाता है.
2024 में अहमदाबाद क्राइम ब्रांच ने हरियाणा के पलवल से संचालित एक गिरोह के छह लोगों को गिरफ्तार किया था.

आरोप था कि गिरोह के सदस्य BJP कार्यकर्ताओं को फोन कर खुद को PMO अधिकारी बताते थे. सरकारी प्रोजेक्ट दिलाने का भरोसा देकर लाखों रुपये की ठगी की कोशिश किए जाने की बात सामने आई. इस मामले ने संकेत दिया कि PMO के नाम का कथित दुरुपयोग सिर्फ व्यक्तिगत पहचान बनाने तक सीमित नहीं था, बल्कि संगठित तरीके से भी इसका इस्तेमाल किया जा रहा था.
ये आठ नौ खुदरा केस हैं. वास्तविकता यह है कि ठगों का देशव्यापी जाल फैला हुआ है. राजधानी दिल्ली से लेकर गाँव की गली तक, ठग ही ठग. बस, एकबार मिल तो लें. कोई पीएम का भाई घोषित कर लोगों को घौसियाता लठ चलाता है, और उसके समर्थन में लुहेड़े आ खड़े होते हैं. तो कोई अजित डोभाल, अमित शाह का अंडकोष बन जाता है.
इन ठगों को बाकायदा सुरक्षा मिलती है, और यही सब दिखाकर पूरे देश में लूटने-खसोटने का धंधा चल रहा है. किसी व्यापारी, उद्योगपति की हिम्मत नहीं, कि इनकी शिकायत करे. कल तो जो फटहे हवाई चप्पल पहनते थे, आज मर्सडीज़ में घूम रहे हैं, करोड़ों की नामी-बेनामी संपत्ति जुटा चुके हैं. अमृतकाल है भाई, जितना ‘अमृत’ लूट सकते हो, लूट लो !
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