आरक्षित पदों के डी-रिजर्वेशन (अनावरण) के प्रस्तावों को लेकर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) आमने-सामने आ गए हैं. ताजा विवाद यह है कि जहां एक तरफ राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने पिछले तीन वर्षों के डी-रिजर्वेशन प्रस्तावों की व्यापक समीक्षा और गहन जांच शुरू कर दी है, वहीं दूसरी तरफ कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के पास पिछले छह वर्षों से मिले ऐसे प्रस्तावों का कोई केंद्रीय (समेकित) डेटा उपलब्ध नहीं है, जिससे प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं.
डी-रिजर्वेशन क्या है?
डी-रिजर्वेशन के ऐसे प्रस्तावों की प्रक्रिया में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) की अहम भूमिका होती है, जबकि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) यह देखता है कि आरक्षित पद को सामान्य उम्मीदवार से भरने की जरूरत वास्तव में है या नहीं और क्या संबंधित विभाग ने आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को तलाशने के लिए पर्याप्त प्रयास किए हैं. इसी प्रक्रिया को लेकर पिछले कुछ समय से राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और केंद्र सरकार के बीच मतभेद सामने आ रहे हैं.
केंद्र सरकार के नियमों के अनुसार, आरक्षित पदों को डी-रिजर्व करना यानी SC या ST वर्ग के लिए आरक्षित पद पर सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार को नियुक्त करना कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं है. सीधी भर्ती में आरक्षित पदों के डी-रिजर्वेशन पर सामान्य तौर पर रोक है और केवल कुछ असाधारण परिस्थितियों में ही ऐसा किया जा सकता है. वहीं, प्रमोशन (प्रोन्नति) के मामलों में भी इसके लिए सख्त नियम और शर्तें हैं.
समस्या तब सामने आती है जब कोई मंत्रालय या विभाग यह कहते हुए डी-रिजर्वेशन का प्रस्ताव भेजता है कि आरक्षित वर्ग का उपयुक्त उम्मीदवार उपलब्ध नहीं है. राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ऐसे प्रस्तावों की जांच करते हुए यह सवाल उठा रहा है कि क्या विभाग ने उम्मीदवार तलाशने के सभी जरूरी प्रयास किए थे और क्या आरक्षित पद को भरने के दूसरे विकल्प आजमाए गए थे.
विवाद अभी क्यों महत्वपूर्ण है?
यह मुद्दा हाल के महीनों में इसलिए चर्चा में आया है क्योंकि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने डी-रिजर्वेशन के प्रस्तावों को लेकर अपनी जांच तेज कर दी है. The Wire की रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग ने केंद्र सरकार से पिछले तीन वर्षों में मिले डी-रिजर्वेशन प्रस्तावों की व्यापक समीक्षा करने का फैसला किया है. आयोग की कई बैठकों में यह मुद्दा प्रमुखता से उठा है और कुछ प्रस्तावों में जरूरी जानकारी न होने पर सवाल भी किए गए हैं.
इसी बीच, The Hindu की RTI आधारित रिपोर्ट में सामने आया कि DoPT के पास पिछले छह वर्षों में मिले डी-रिजर्वेशन प्रस्तावों की संख्या का तैयार आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. विभाग का कहना है कि यह जानकारी अलग-अलग मंत्रालयों और विभागों में हो सकती है और इसे एक जगह इकट्ठा करने से संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.
यहीं से इस मामले में एक नया सवाल खड़ा होता है: एक तरफ राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग पिछले तीन वर्षों के डी-रिजर्वेशन प्रस्तावों की व्यापक समीक्षा करना चाहता है, तो दूसरी तरफ DoPT के पास पिछले छह वर्षों के प्रस्तावों का समेकित आंकड़ा आसानी से उपलब्ध नहीं है.
NCSC को आखिर आपत्ति किस बात पर है?
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का मूल सवाल यह है कि आरक्षित पद को सामान्य उम्मीदवार के लिए खोलने से पहले क्या संबंधित विभाग ने आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को खोजने की पूरी कोशिश की थी.
आयोग यह भी देखना चाहता है कि क्या विभाग ने भर्ती के दूसरे विकल्पों पर विचार किया. यानी सिर्फ यह कह देना कि “आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार नहीं मिला” डी-रिजर्वेशन के लिए पर्याप्त आधार है या नहीं. यही वजह है कि आयोग प्रस्तावों में उम्मीदवारों की उपलब्धता, भर्ती के लिए किए गए प्रयास और डी-रिजर्वेशन की जरूरत से जुड़ी जानकारी पर विशेष जोर दे रहा है.
Also Read : CMPFO में 3.64 करोड़ के पेंशन घोटाले का आरोप, CBI ने चार अधिकारियों समेत अज्ञात लोगों पर दर्ज की केस

