जोहार लाइव ब्यूरो
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 69 के तहत दर्ज एक एफआईआर को रद्द कर दिया. यह धारा धोखे के जरिए सहमति हासिल कर यौन संबंध बनाने को अपराध मानती है, जिसमें शादी का झूठा वादा भी शामिल है. कोर्ट ने पाया कि शिकायत में ही दोनों के बीच सहमति से बने संबंधों का जिक्र था और धोखे से संबंध बनाने के लिए उकसाने की बात सामने नहीं आती थी. कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी की मां की सहमति नहीं मिलने के कारण शादी से इनकार करना अपने आप में धोखा नहीं माना जा सकता.
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ गुजरात हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य मामले के फैसले का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया था.
याचिकाकर्ता पर बीएनएस की धारा 69 के तहत आरोप था कि उसने शादी का वादा कर शिकायतकर्ता के साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में अपनी मां की असहमति का हवाला देते हुए शादी के वादे से पीछे हट गया. याचिकाकर्ता की ओर से मामले को रद्द करने की मांग की गई थी, जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था.
हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने दीपक गुलाटी मामले पर भरोसा किया था. उस फैसले में कहा गया था कि यह साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत होने चाहिए कि शुरुआत से ही आरोपी का शादी का वादा निभाने का कोई इरादा नहीं था. कई परिस्थितियों में कोई व्यक्ति शादी करने की पूरी मंशा रखने के बावजूद ऐसी परिस्थितियों के कारण शादी नहीं कर पाता, जिनसे बचना उसके लिए संभव नहीं होता.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में किसी अनिश्चित तारीख पर किए गए वादे को किसी कारण से पूरा नहीं कर पाना हमेशा तथ्यों की गलत धारणा के बराबर नहीं होता. ऐसे मामले में आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी का शुरुआत से ही शादी करने का इरादा नहीं था.
गौरतलब है कि भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 90, जिसे अब बीएनएस की धारा 28 में शामिल किया गया है, डर या गलत धारणा के तहत दी गई सहमति से संबंधित थी. जब दीपक गुलाटी मामले में फैसला आया था, तब आईपीसी में बीएनएस की धारा 69 जैसी कोई अलग धारा नहीं थी.
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सुप्रीम कोर्ट ने बीएनएस की धारा 69 की कानूनी स्थिति समझाते हुए कहा कि आपीसी के तहत शादी के झूठे वादे पर यौन संबंध बनाने के मामलों में आईपीसी की धारा 375 और धारा 90 का सहारा लिया जाता था. इसमें यह साबित करना जरूरी था कि पीड़िता की सहमति इसलिए प्रभावित हुई क्योंकि उसे ऐसे वादे पर विश्वास कराया गया, जिसे आरोपी वादा करते समय ही पूरा करने का इरादा नहीं रखता था.
कोर्ट ने कहा कि बीएनएस में धारा 69 को शामिल करके धोखाधड़ी और छलपूर्ण व्यवहार को बलात्कार के गंभीर अपराध से अलग एक स्वतंत्र अपराध बनाया गया है. साथ ही ऐसे छलपूर्ण व्यवहार के लिए सजा का भी प्रावधान किया गया है. कोर्ट के मुताबिक, “धोखे के तरीके या किसी महिला से शादी का वादा बिना उसे पूरा करने के इरादे के करना” तभी इस धारा के दायरे में आएगा, जब शादी का वादा शुरू से ही पूरा करने के इरादे के बिना किया गया हो.
शिकायत में सहमति से संबंधों का जिक्र
एफआईआर की जांच करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता और शिकायतकर्ता की मुलाकात एक डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए हुई थी. इसके बाद दोनों के बीच दोस्ती हुई, जो आगे चलकर प्रेम संबंध में बदल गई. कोर्ट ने पाया कि पहली बार शारीरिक मुलाकात के दौरान ही याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता से शादी करने की इच्छा जताई थी.
शिकायत के मुताबिक, शिकायतकर्ता ने उसके आग्रह को स्वीकार किया और फरवरी 2024 में दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने. इसके बाद अप्रैल 2024 में दोनों दो दिनों तक एक होटल में भी साथ रहे. इन तथ्यों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले में धोखे का कोई संकेत नहीं मिलता. कोर्ट ने माना कि शिकायत में दोनों के बीच सहमति से बने संबंधों की बात स्पष्ट रूप से सामने आती है. ऐसा कोई तथ्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि शिकायतकर्ता ने केवल शादी के वादे के कारण शारीरिक संबंध बनाए और आरोपी ने उसे धोखे से इसके लिए तैयार किया.
कोर्ट ने यह भी अहम टिप्पणी की कि शिकायत में यह आरोप तक नहीं था कि पहली बार शारीरिक संबंध शादी के वादे की शर्त पर बनाए गए थे. पीठ ने कहा कि पहली मुलाकात के दौरान शिकायतकर्ता ने आरोपी के आग्रह को स्वीकार किया था और शिकायत में कहीं यह नहीं कहा गया कि शारीरिक संबंध शादी के वादे के आधार पर बनाए गए थे.
मां की असहमति के कारण शादी से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की ओर से बाद में शिकायतकर्ता से शादी करने की इच्छा जताने वाली बातचीत को भी धोखे के तौर पर नहीं माना. कोर्ट ने शिकायतकर्ता के बयान का भी संज्ञान लिया, जिसमें कहा गया था कि आरोपी ने अपनी मां की अनुमति नहीं मिलने के कारण उससे शादी करने से इनकार कर दिया.
पीठ ने कहा कि यह तथ्य उलटे इस बात की ओर संकेत करता है कि यदि शादी का वादा किया भी गया था, तो वह अच्छी नीयत से किया गया था.
इन सभी तथ्यों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले की आपराधिक कार्यवाही आगे जारी रखने का कोई आधार नहीं है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के वडोदरा शहर के सयाजिगंज पुलिस स्टेशन में 20 मई 2025 को दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया.
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