साल 1934 की बात है. अटल बिहारी वाजपेयी तब करीब 10 साल के रहे होंगे, जब गोरखी स्कूल (अब अटल मेमोरियल स्कूल) में पहली बार भाषण देने मंच पर पहुंचे. लेकिन घबराहट के कारण वे अपना भाषण पूरा नहीं कर पाए. वहां मौजूद लोगों ने उनका मजाक उड़ाया और उन्हें हूटिंग का सामना करना पड़ा. बाद में वाजपेयी ने बताया कि यह घटना उनके जीवन का ऐसा मोड़ बनी, जिसने उन्हें भाषण रटने के बजाय अपनी बात अपने अंदाज में रखने की सीख दी.
यही बच्चा आगे चलकर संसद का ऐसा वक्ता बना, जिसे सुनने के लिए विरोधी भी चुप हो जाते थे, और जिसने संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण देकर इतिहास रचा. उन्होंने 1977 में विदेश मंत्री रहते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा को हिंदी में संबोधित किया था.
पोखरण परमाणु परीक्षण, कारगिल युद्ध के दौरान नेतृत्व, देश के चार बड़े महानगरों को जोड़ने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज योजना, गांवों तक सड़क पहुंचाने की पहल और सर्व शिक्षा अभियान उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल की प्रमुख उपलब्धियों में शामिल हैं. लेकिन वाजपेयी की कहानी सिर्फ उपलब्धियों तक सीमित नहीं है. कंधार विमान अपहरण, 2002 के गुजरात दंगे, तहलका प्रकरण और आर्थिक नीतियों को लेकर उठे सवाल उनकी विरासत का दूसरा पक्ष भी सामने रखते हैं.
पत्रकारिता से संसद तक
अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को वर्तमान मध्यप्रदेश के ग्वालियर में हुआ. ग्वालियर से उन्होंने पत्रकारिता शुरू की. ‘राष्ट्रधर्म’, ‘पाञ्चजन्य’, ‘स्वदेश’ और ‘वीर अर्जुन’ जैसे प्रकाशनों के जरिए उन्होंने अपनी लेखनी को धार दी. राष्ट्रवाद और साहित्यिक संवेदना से भरी यही भाषा आगे चलकर उनके राजनीतिक भाषणों की पहचान बनी.
साल 1951 में भारतीय जनसंघ से जुड़ने के बाद उनका राजनीतिक सफर आगे बढ़ा और 1957 में वे पहली बार लोकसभा पहुंचे. लंबे समय तक विपक्ष में रहने के बावजूद उनके भाषणों को सत्ता पक्ष भी गंभीरता से सुनता था. धीरे-धीरे वे सिर्फ एक पार्टी के नेता नहीं, बल्कि प्रभावशाली संसदीय वक्ता के रूप में स्थापित हुए.
विदेश मंत्री से प्रधानमंत्री तक का सफर
साल 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी तो वाजपेयी विदेश मंत्री बनाये गए. जब 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई और वे इसके प्रमुख नेताओं में शामिल रहे. उन्होंने 1980 से 1986 तक पार्टी अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली.

साल 1996 में वे पहली बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन सरकार सिर्फ 13 दिन चल सकी. साल 1998 में उन्होंने फिर प्रधानमंत्री पद संभाला और 1999 में दोबारा सत्ता में लौटे. इसके बाद 1999 से 2004 तक उन्होंने गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया.
मई 1998 में वाजपेयी सरकार ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किए. यह भारत की सुरक्षा और रणनीतिक नीति के लिहाज से बड़ा फैसला था. परीक्षणों के बाद अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और दबाव का सामना करना पड़ा, लेकिन सरकार अपने फैसले पर कायम रही. समर्थकों ने इसे भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और सुरक्षा क्षमता के प्रदर्शन के तौर पर देखा.
इसके साथ ही वाजपेयी संवाद और शांति के पक्षधर भी रहे. 1999 में दिल्ली से लाहौर तक बस यात्रा इसी नीति का हिस्सा थी. लेकिन कुछ ही समय बाद कारगिल में पाकिस्तानी घुसपैठ सामने आई और दोनों देश युद्ध की स्थिति में पहुंच गए.
कारगिल युद्ध में भारतीय सेना ने सैन्य मोर्चे पर जवाब दिया, वहीं सरकार ने कूटनीतिक स्तर पर भी पाकिस्तान पर दबाव बनाया. अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत का पक्ष मजबूत हुआ. इस घटनाक्रम ने वाजपेयी के नेतृत्व की एक खास तस्वीर बनाई—शांति की कोशिश भी और जरूरत पड़ने पर कठोर जवाब भी.

उपलब्धि सड़क, शिक्षा और दूरसंचार
वाजपेयी सरकार की बड़ी उपलब्धियों में बुनियादी ढांचे का विस्तार शामिल रहा. स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के जरिए दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता को बेहतर सड़क नेटवर्क से जोड़ने का काम शुरू हुआ. राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना को भी गति मिली. ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क संपर्क बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना शुरू की गई, जिसका उद्देश्य गांवों को हर मौसम में चलने वाली सड़कों से जोड़ना था.
शिक्षा के क्षेत्र में सर्व शिक्षा अभियान महत्वपूर्ण पहल रही. इसका लक्ष्य प्राथमिक शिक्षा को सार्वभौमिक बनाना, बच्चों को स्कूल से जोड़ना और शिक्षा तक पहुंच में सुधार करना था. आगे चलकर इस प्रयास ने सार्वभौमिक स्कूली शिक्षा की दिशा में नीतिगत आधार मजबूत करने में योगदान दिया.
दूरसंचार क्षेत्र में भी बड़े सुधार हुए. निजी क्षेत्र की भागीदारी और नई नीतियों ने मोबाइल और संचार सेवाओं के विस्तार की जमीन तैयार की. आर्थिक मोर्चे पर सरकार ने उदारीकरण और विनिवेश को आगे बढ़ाया. समर्थकों ने इसे प्रतिस्पर्धा बढ़ाने वाला कदम बताया, जबकि आलोचकों ने सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण की दिशा पर सवाल उठाए.
साल 1990 के दशक के अंत तक केंद्र की राजनीति गठबंधन के दौर में पहुंच चुकी थी. अलग-अलग विचारधाराओं और क्षेत्रीय हितों वाली पार्टियों को साथ लेकर चलना आसान नहीं था. इसके बावजूद वाजपेयी ने कई दलों के साथ गठबंधन बनाकर 1999 से 2004 तक स्थिर सरकार चलाई. उनकी राजनीतिक शैली में संवाद और समझौते की अहम भूमिका रही. यही कारण है कि उन्हें गठबंधन राजनीति के सफल नेताओं में गिना जाता है.
कंधार कांड और गुजरात दंगे तक के कलंक
साल 1999 में इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC-814 का अपहरण वाजपेयी सरकार के सामने सबसे कठिन परिस्थितियों में से एक था. यात्रियों की रिहाई के बदले सरकार ने मसूद अजहर समेत तीन आतंकियों को रिहा किया. सरकार ने इसे यात्रियों की जान बचाने के लिए मजबूरी में लिया फैसला बताया, लेकिन आलोचकों ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बड़ी चूक माना. बाद में मसूद अजहर भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियों में प्रमुख नाम बना.
साल 2002 के गुजरात दंगे भी वाजपेयी की विरासत का सबसे संवेदनशील अध्याय रहे. उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. हिंसा और जनहानि के बीच केंद्र सरकार की भूमिका पर सवाल उठे. वाजपेयी ने सार्वजनिक रूप से राजधर्म निभाने की बात कही और सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार का संदेश दिया. इसके बावजूद केंद्र की भूमिका को लेकर आलोचना जारी रही.
साल 2001 के तहलका स्टिंग ऑपरेशन ने रक्षा सौदों और राजनीतिक भ्रष्टाचार के सवाल को भी राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया. भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को रिश्वत लेते दिखाए जाने के बाद सरकार की राजनीतिक और नैतिक छवि पर सवाल उठे.
हालांकि, संसद पर 13 दिसंबर 2001 को आतंकी हमले के बाद वाजपेयी सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाया. भारत-पाकिस्तान संबंधों में फिर तनाव बढ़ा और दोनों देशों की सेनाएं लंबे समय तक सीमा पर आमने-सामने रहीं.
सम्मान और विरासत
वाजपेयी को 1992 में पद्म विभूषण और 1994 में सर्वश्रेष्ठ सांसद सम्मान मिला. साल 2014 में उन्हें भारत रत्न देने की घोषणा हुई और 2015 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया गया. अटल हमेशा के लिए 16 अगस्त 2018 को इस दूनियां से विदा हो गए.
अटल की विरासत को सिर्फ उपलब्धियों की सूची या विवादों की फाइल से नहीं समझा जा सकता. उनकी राजनीति में दृढ़ फैसले भी थे और राजनीतिक समझौते भी, शांति की पहल भी थी और युद्ध का जवाब भी, आर्थिक सुधार भी थे और उन पर सवाल भी. शायद यही विरोधाभास उन्हें भारतीय राजनीति के सबसे जटिल और प्रभावशाली नेताओं में शामिल करता है.
Also Read: अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर पीएम मोदी और अन्य नेताओं ने अर्पित की श्रद्धांजलि


