Ranchi : दो दशक पहले हुए सिकिदिरी हाइडल पावर प्लांट के घोटाले की खबर अब फिर सामने आ रही है। चालू बजट सत्र में विधायक सरयू राय ने इसे सदन में उठाया। मामला इस बात का है कि प्लांट की मरम्मत में जो खर्चा हुआ, वह अनुमान से कई गुना ज्यादा था और इसमें कई अधिकारी सीधे संदिग्ध हैं। मरम्मत की मंजूरी तत्कालीन बिजली बोर्ड के निदेशक मंडल की बैठक में दी गई थी, जिसमें पूर्व ऊर्जा सचिव विमल कृति सिंह और बिजली बोर्ड के चेयरमैन भी मौजूद थे। इस पूरे मामले में चेयरमैन एस.एन. वर्मा को भी संदिग्ध माना गया है।
मरम्मत के खर्च में बड़ा अंतर
परियोजना के प्रोजेक्ट मैनेजर ने दोनों यूनिटों की मरम्मत के लिए 4.88 करोड़ रुपये का प्राक्कलन तैयार किया था। लेकिन 2 मार्च 2012 को मुख्य अभियंता (उत्पादन) ने 20.87 करोड़ रुपये खर्च करने का आदेश दे दिया। इसके बाद अधिकारियों की लापरवाही के चलते न्यायालय ने सरकार को Bharat Heavy Electricals Limited को ब्याज सहित 134 करोड़ रुपये भुगतान करने का आदेश दिया।
सिकिदिरी हाइडल की दोनों यूनिटों की कुल उत्पादन क्षमता 130 मेगावाट है।
विभागीय कार्रवाई और दंड
इस मामले में कई अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई हुई। तत्कालीन मुख्य इंजीनियर डी.एन. राम के खिलाफ कार्रवाई हुई, जबकि प्रोजेक्ट मैनेजर बी.के. चौधरी को 40 प्रतिशत पेंशन कटौती का दंड दिया गया। इंजीनियर प्रमुख गोपी नाथ सिंह मुण्डा को दो वर्ष के लिए 2 प्रतिशत अस्थायी पेंशन कटौती झेलनी पड़ी। वहीं, विद्युत कार्यपालक इंजीनियर प्रवीण कुमार को जांच के बाद आरोपमुक्त कर दिया गया। तत्कालीन वित्त नियंत्रक-II प्रमोद कुमार के खिलाफ वार्षिक वेतन वृद्धि पर असंचयी प्रभाव रोक का आदेश जारी किया गया। घोटाले के दोषी पदाधिकारियों को चिन्हित करने के लिए गठित जांच समिति की रिपोर्ट को लंबित रखा गया और उस पर कार्रवाई को दबा दिया गया, ताकि कई जिम्मेदार अधिकारी सेवानिवृत्त होकर कार्रवाई से बच सकें।
अब तक क्या-क्या हुआ
अब तक इस मामले में कई घटनाक्रम सामने आए हैं। सिकिदिरी हाइडल प्लांट की मरम्मत का काम Bharat Heavy Electricals Limited को दिया गया, जिसने इसे आगे निजी कंपनी नार्दन पावर को सौंप दिया। मरम्मत कार्य की कुल लागत लगभग 20.87 करोड़ रुपये आंकी गई थी, लेकिन अधिकारियों ने समय पर ठोस पैरवी नहीं की और जरूरी दस्तावेज़ न्यायालय के सामने पेश नहीं किए। इस लापरवाही के चलते 20 करोड़ रुपये की राशि बढ़कर 134 करोड़ रुपये तक पहुँच गई। शॉर्ट टर्म कार्य के बिल का सत्यापन कर दिया गया, जबकि लांग टर्म काम पूरा नहीं हुआ था, जिससे निजी कंपनी को एकतरफा फायदा मिला।
दोषी अधिकारी
इस घोटाले में कई अधिकारी सीधे दोषी पाए गए हैं। इसमें जीएम (एचआर-उत्पादन) अमर नायक, जीएम (तकनीकी) कुमुद रंजन सिन्हा, तत्कालीन प्रोजेक्ट मैनेजर प्रदीप शर्मा, कार्यपालक अभियंता संजय सिंह और दो विधि अधिकारी शामिल हैं।
जांच कमेटी के सदस्य
इस मामले की जांच के लिए गठित कमेटी में जीएम (एचआर) सुनील दत्त खाखा, ऊर्जा विभाग के संयुक्त सचिव सौरभ सिन्हा और जीएम (वित्त) डी.के. महापात्रा शामिल थे।
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