पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामले में उन्हें नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. यह मामला बिजली की बढ़ी हुई दरों के खिलाफ हुए प्रदर्शन का है. उस दौरान चंडीगढ़ पुलिस ने भगवंत मान और आम आदमी पार्टी (AAP) के कई नेताओं पर दंगा करने और गैर-कानूनी तरीके से इकट्ठा होने का केस दर्ज किया था.
हालांकि, नवंबर 2025 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने इस केस को रद्द कर दिया था. अब चंडीगढ़ प्रशासन ने हाई कोर्ट के इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.
मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने की. सुनवाई के दौरान चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने कहा कि हाई कोर्ट ने कानून की सही व्याख्या नहीं की है और उसका फैसला गलत है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह मामले की जांच करेगा और भगवंत मान समेत अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया जाए. अब सभी पक्षों को अदालत में अपना जवाब दाखिल करना होगा.
क्या है पूरा मामला?
यह मामला साल 2020 का है. उस समय आम आदमी पार्टी ने पंजाब में बिजली की बढ़ी हुई दरों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था. प्रदर्शन के दौरान AAP नेताओं और कार्यकर्ताओं ने तत्कालीन पंजाब मुख्यमंत्री के सरकारी आवास का घेराव करने की योजना बनाई थी. पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया.
पुलिस का आरोप है कि इसके बाद कुछ प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया और कानून-व्यवस्था बिगाड़ने की कोशिश की. इसी आधार पर भगवंत मान समेत कई नेताओं के खिलाफ दंगा, गैर-कानूनी जमावड़ा और दूसरी धाराओं में केस दर्ज किया गया.
हाई कोर्ट ने केस क्यों रद्द किया?
29 नवंबर 2025 को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के जस्टिस त्रिभुवन दहिया ने यह केस रद्द कर दिया था. कोर्ट ने कहा कि जिस जगह प्रदर्शन हुआ था, वहां CrPC की धारा 144 लागू नहीं थी. यानी लोगों के इकट्ठा होने पर कोई रोक नहीं थी. हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस यह साबित नहीं कर पाई कि पथराव किसने किया था. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि,
- किसी भी आरोपी का नाम पत्थर फेंकने वालों में शामिल नहीं है.
- ऐसा कोई सबूत नहीं है कि भगवंत मान या दूसरे नेताओं ने लोगों को हिंसा के लिए उकसाया हो.
- पुलिस यह भी नहीं बता सकी कि नेताओं ने ऐसा कौन-सा बयान या इशारा किया, जिससे हिंसा भड़की.
इन्हीं कारणों से हाई कोर्ट ने कहा कि सिर्फ भीड़ में मौजूद होने के आधार पर किसी नेता पर दंगे का मामला नहीं चलाया जा सकता.
चंडीगढ़ प्रशासन सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंचा?
हाई कोर्ट के फैसले से असहमत चंडीगढ़ प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की है. प्रशासन का कहना है कि हाई कोर्ट ने मामले के तथ्यों और कानून की सही तरीके से जांच नहीं की. इसलिए उसने फैसले को चुनौती दी है. अब सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि हाई कोर्ट का फैसला सही था या नहीं.
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ नोटिस जारी किया है. इसका मतलब यह नहीं है कि भगवंत मान दोषी साबित हो गए हैं. अब भगवंत मान और दूसरे पक्ष अदालत में अपना जवाब देंगे. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला करेगा कि हाई कोर्ट का आदेश बरकरार रहेगा या इस मामले में दोबारा सुनवाई होगी. यह मामला सिर्फ भगवंत मान तक सीमित नहीं है. सुप्रीम कोर्ट का फैसला भविष्य में विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों की कानूनी व्याख्या पर भी असर डाल सकता है.
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