जोहार लाइव ब्यूरो: रांची
रांची: झारखंड पुलिस की जांच और अभियोजन की बड़ी विफलता एक बार फिर अदालत के फैसले में सामने आई है. करीब 10 साल पुराने चर्चित माओवादी मुठभेड़ मामले में नामजद आरोपी बिरसा मुंडा उर्फ नैना उर्फ बिरसा बिरहोर उर्फ चियाता मुंडा को अदालत ने सभी आरोपों से बरी कर दिया. अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ कोई ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर सका. पुलिस जिन तथ्यों के आधार पर आरोपी को दोषी बता रही थी, उन्हें अदालत में साबित नहीं किया जा सका.
क्या है पूरा मामला
यह मामला वर्ष 2016 का है. पुलिस के अनुसार, 31 मार्च 2016 को गुप्त सूचना मिली थी कि सिल्ली थाना क्षेत्र के बुंडियारी गांव में माओवादी बड़ी हिंसक वारदात की योजना बना रहे हैं. सूचना के आधार पर पुलिस और सीआरपीएफ की संयुक्त टीम ने गांव में छापेमारी की. पुलिस का दावा था कि घेराबंदी के दौरान माओवादियों ने फायरिंग शुरू कर दी, जिसके जवाब में पुलिस ने भी गोली चलाई. इस दौरान तीन माओवादी गिरफ्तार किए गए, जबकि कई अन्य फरार हो गए थे. फरार आरोपियों में “नैना” का नाम भी शामिल बताया गया था.
पुलिस ने बाद में बिरसा मुंडा को ही “नैना” बताते हुए उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल की. उस पर हत्या के प्रयास, पुलिस पर हमला, अवैध हथियार रखने, विस्फोटक पदार्थ रखने और गैरकानूनी गतिविधियों से जुड़े गंभीर आरोप लगाए गए. मामला सत्र न्यायालय पहुंचा और वर्ष 2022 में आरोप तय किए गए.
हालांकि, सुनवाई के दौरान पुलिस का पूरा मामला अदालत में कमजोर पड़ गया. अभियोजन पक्ष ने केवल तीन पुलिस अधिकारियों को गवाह बनाया. सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि तीनों गवाह अदालत में आरोपी बिरसा मुंडा की पहचान ही नहीं कर सके. सभी ने स्वीकार किया कि घटना के समय आरोपी गिरफ्तार नहीं हुआ था और उससे कोई हथियार, विस्फोटक या अन्य आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई थी.
किसी भी जांच अधिकारी ने नहीं दिया गवाही
अदालत ने यह भी पाया कि जिस आरोपी को पुलिस “नैना” बता रही थी, उसे घटना से जोड़ने वाला कोई स्वतंत्र साक्ष्य रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं था. न तो कोई स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शी पेश किया गया और न ही जब्ती सूची के गवाहों को अदालत में बुलाया गया. सबसे अहम बात यह रही कि मामले के अनुसंधानकर्ता (Investigating Officer) की भी गवाही नहीं कराई गई. इससे पुलिस की पूरी जांच प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ गई.
फैसले में अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि गवाहों को पेश कराने के लिए कई बार समन जारी किए गए. संबंधित थाना, एसएसपी और डीआइजी तक को पत्र भेजे गए. यहां तक कि जमानती वारंट भी जारी हुआ, लेकिन इसके बावजूद अभियोजन पक्ष आवश्यक गवाहों को अदालत में पेश नहीं कर सका. अदालत ने अभियोजन को कई अवसर दिए, फिर भी जांच अधिकारी और अन्य महत्वपूर्ण गवाह उपस्थित नहीं हुए.
संदेह कितना भी मजबूत क्यों न हो, सबूत का स्थान नहीं ले सकता
अदालत ने कहा कि केवल एफआईआर में किसी का नाम आने या अन्य आरोपियों के कथित स्वीकारोक्ति बयान के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. जब तक उसके खिलाफ स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध न हों, तब तक कानून उसे दोषी मानने की अनुमति नहीं देता. अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि “संदेह कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह सबूत का स्थान नहीं ले सकता.” अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ संदेह से परे आरोप साबित करने में पूरी तरह असफल रहा.
इसी आधार पर अदालत ने बिरसा मुंडा उर्फ नैना को भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं, आर्म्स एक्ट, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम तथा सीएलए एक्ट के तहत लगाए गए सभी आरोपों से बरी कर दिया. साथ ही, जेल में बंद आरोपी की तत्काल रिहाई का आदेश भी जारी कर दिया.
पुलिस ने बताया था माओवादियों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई
यह फैसला केवल एक आरोपी की रिहाई तक सीमित नहीं है, बल्कि झारखंड पुलिस की जांच और अभियोजन प्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है. जिस मामले को पुलिस ने माओवादी संगठन के खिलाफ बड़ी कार्रवाई बताया था, वही मामला अदालत में साक्ष्यों के अभाव में टिक नहीं पाया. यदि समय पर जांच पूरी होती, गवाहों को पेश किया जाता और वैज्ञानिक तरीके से सबूत जुटाए जाते, तो अदालत के सामने तस्वीर अलग हो सकती थी. लेकिन जांच में लापरवाही और अभियोजन की कमजोर पैरवी के कारण एक गंभीर मामला कानूनी कसौटी पर टिक नहीं सका.
अदालत का यह फैसला एक बार फिर यह याद दिलाता है कि किसी भी आपराधिक मामले में केवल आरोप पर्याप्त नहीं होते, बल्कि उन्हें ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित करना पुलिस और अभियोजन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है.
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