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    Home»जोहार ब्रेकिंग»गार्ड ऑफ ऑनर के बीच हमला, एक झुकाव और बच गई राजीव गांधी की जान
    जोहार ब्रेकिंग

    गार्ड ऑफ ऑनर के बीच हमला, एक झुकाव और बच गई राजीव गांधी की जान

    Muskan ChoudharyBy Muskan ChoudharyJuly 30, 2026No Comments6 Mins Read4
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    Rajiv Gandhi
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    इतिहास में कुछ पल ऐसे होते हैं जो सिर्फ कुछ सेकंड के होते हैं, लेकिन उनका असर दशकों तक महसूस किया जाता है.30 जुलाई 1987 भी ऐसा ही एक दिन था. भारत और श्रीलंका के रिश्तों के लिए यह एक ऐतिहासिक अवसर था. दोनों देशों के बीच शांति समझौता हो चुका था. दुनिया की निगाहें कोलंबो पर थीं और हर कोई उम्मीद कर रहा था कि यह समझौता श्रीलंका में वर्षों से चल रहे संघर्ष का अंत करेगा. लेकिन उसी समारोह के बीच कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरे माहौल को बदल दिया.

    गार्ड ऑफ ऑनर का निरीक्षण कर रहे भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर अचानक एक सैनिक ने राइफल के बट से हमला कर दिया. यह सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि किसी को संभलने का मौका तक नहीं मिला. हालांकि राजीव गांधी की सूझबूझ और फुर्ती ने उनकी जान बचा ली, लेकिन इस घटना ने भारत-श्रीलंका संबंधों, सुरक्षा व्यवस्था और दक्षिण एशिया की राजनीति पर गहरे सवाल खड़े कर दिए.

    आखिर वह सैनिक कौन था? उसने ऐसा क्यों किया? और कैसे कुछ सेकंड की यह घटना इतिहास का अहम अध्याय बन गई? आइए जानते हैं.

    श्रीलंका क्यों पहुंचे थे राजीव गांधी?

    1980 के दशक में श्रीलंका भीषण जातीय संघर्ष से गुजर रहा था. एक ओर सिंहली बहुल सरकार थी और दूसरी ओर तमिल विद्रोही संगठन, जिनमें सबसे प्रमुख था लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE). भारत, विशेषकर तमिलनाडु में, श्रीलंकाई तमिलों के प्रति गहरी सहानुभूति थी. लगातार बढ़ती हिंसा और क्षेत्रीय अस्थिरता को देखते हुए भारत ने मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश की.

    29 जुलाई 1987 को भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी और श्रीलंका के राष्ट्रपति जे. आर. जयवर्धने ने भारत-श्रीलंका शांति समझौते (Indo-Sri Lanka Accord) पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते का उद्देश्य था श्रीलंका में शांति बहाल करना, तमिल बहुल क्षेत्रों को अधिक अधिकार देना और हिंसा को समाप्त करना. समझौते के तहत भारत ने बाद में भारतीय शांति सेना (Indian Peace Keeping Force या IPKF) भी श्रीलंका भेजी.

    समझौते पर हस्ताक्षर के अगले दिन, 30 जुलाई 1987 को कोलंबो में राजीव गांधी को औपचारिक गार्ड ऑफ ऑनर दिया जा रहा था. प्रधानमंत्री सैनिकों की पंक्ति का निरीक्षण कर रहे थे. सब कुछ सामान्य दिखाई दे रहा था. कैमरे चल रहे थे, अधिकारी मौजूद थे और कार्यक्रम पूरी गरिमा के साथ आगे बढ़ रहा था.

    लेकिन तभी अचानक श्रीलंकाई नौसेना का एक जवान, विजिता रोहाना डी सिल्वा, आगे बढ़ा और अपनी सेल्फ-लोडिंग राइफल के बट से राजीव गांधी के सिर पर वार करने की कोशिश की. यह सब इतनी तेजी से हुआ कि कुछ पल के लिए वहां मौजूद लोग समझ ही नहीं पाए कि आखिर हुआ क्या है.

    कैसे बची राजीव गांधी की जान?

    हमलावर का निशाना प्रधानमंत्री के सिर पर था. लेकिन राजीव गांधी ने बेहद फुर्ती दिखाते हुए अंतिम क्षण में अपना सिर झुका लिया. राइफल का बट उनके सिर पर पूरी ताकत से नहीं लग सका और वार उनके कंधे और गर्दन के पास लगा. इसके बावजूद उन्होंने अपना संतुलन नहीं खोया.

    सुरक्षा अधिकारियों ने तुरंत हमलावर को काबू में कर लिया. कुछ ही सेकंड में स्थिति सामान्य कर दी गई और समारोह भी पूरा कराया गया. राजीव गांधी ने घबराहट या गुस्सा दिखाने के बजाय संयम बनाए रखा. उनकी यही प्रतिक्रिया उस समय दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी.

    आखिर हमला क्यों किया गया?

    बाद में सामने आया कि हमलावर श्रीलंकाई नौसेना का जवान था और वह भारत-श्रीलंका शांति समझौते से नाराज था. श्रीलंका के कई कट्टर सिंहली राष्ट्रवादी इस समझौते का विरोध कर रहे थे. उनका मानना था कि भारत ने श्रीलंका के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप किया है और यह समझौता देश की संप्रभुता के खिलाफ है.

    हमलावर ने बाद में कहा कि उसका कदम इसी विरोध से प्रेरित था. हालांकि जांच एजेंसियों को इस हमले के पीछे किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र के ठोस प्रमाण नहीं मिले. इसे एक व्यक्तिगत लेकिन राजनीतिक रूप से प्रेरित हमला माना गया.

    घटना के तुरंत बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया की नजरें कोलंबो पर टिक गईं. किसी विदेशी प्रधानमंत्री पर आधिकारिक सैन्य समारोह के दौरान हमला होना बेहद असामान्य घटना थी. इसे श्रीलंका की सुरक्षा व्यवस्था के लिए बड़ा झटका माना गया. भारत ने घटना पर चिंता जताई, जबकि श्रीलंका सरकार ने तुरंत खेद व्यक्त किया और आश्वासन दिया कि दोषी के खिलाफ कार्रवाई होगी. राष्ट्रपति जयवर्धने के लिए भी यह बेहद शर्मनाक स्थिति थी क्योंकि हमला उसी समारोह के दौरान हुआ था जो दोनों देशों की दोस्ती का प्रतीक माना जा रहा था.

    हमले के बावजूद भारत-श्रीलंका समझौता लागू रहा. लेकिन जल्द ही हालात बदलने लगे. भारतीय शांति सेना और LTTE के बीच संघर्ष शुरू हो गया. जिस मिशन को शांति स्थापित करने के लिए भेजा गया था, वह धीरे-धीरे सैन्य अभियान में बदल गया. 1987 से 1990 के बीच IPKF और LTTE के बीच कई भीषण लड़ाइयां हुईं. हजारों लोग मारे गए और भारतीय सेना को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा. आखिरकार 1990 में भारतीय सेना को श्रीलंका से वापस बुला लिया गया.

    चार साल बाद हुई दुखद हत्या

    श्रीलंका संकट का प्रभाव यहीं समाप्त नहीं हुआ. 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में चुनाव प्रचार के दौरान राजीव गांधी की आत्मघाती बम हमले में हत्या कर दी गई. जांच में इस हमले के लिए LTTE को जिम्मेदार ठहराया गया. इस तरह 1987 का शांति समझौता और उसके बाद की घटनाएं भारत के राजनीतिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण और दुखद श्रृंखलाओं में शामिल हो गईं.

    30 जुलाई 1987 की यह घटना कई कारणों से महत्वपूर्ण मानी जाती है-

    • यह किसी विदेशी प्रधानमंत्री पर औपचारिक सैन्य सम्मान समारोह के दौरान हुए दुर्लभ हमलों में से एक थी.
    • इसने भारत-श्रीलंका संबंधों की जटिलता को दुनिया के सामने उजागर किया.
    • इसने सुरक्षा प्रोटोकॉल और वीवीआईपी सुरक्षा व्यवस्था पर नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर किया.
    • यह घटना बाद में श्रीलंका में भारतीय शांति सेना की भूमिका और दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को समझने का एक महत्वपूर्ण संदर्भ बनी.

    इतिहास के पन्नों में यह घटना केवल एक असफल हमला नहीं है. यह उस दौर की कहानी है जब दक्षिण एशिया शांति, संघर्ष और कूटनीति के बीच एक कठिन संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा था. और उस संतुलन के केंद्र में खड़े थे भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी, जो एक अप्रत्याशित हमले से तो बच गए, लेकिन जिनकी श्रीलंका नीति आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति और क्षेत्रीय इतिहास का निर्णायक अध्याय बन गई.

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