वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने सुप्रीम कोर्ट और देश की न्याय व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि करीब 48 साल की वकालत के दौरान उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में कई ऐसे जज देखे हैं, जिन्हें वह भ्रष्ट मानते हैं. दवे के मुताबिक, ऐसे जजों के आचरण से न्याय व्यवस्था को नुकसान पहुंचा है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट में कई बेहद अच्छे और ईमानदार जज भी रहे हैं.
दवे ने ये बातें 17वें केएम बशीर मेमोरियल लेक्चर के दौरान कहीं. अपने संबोधन में उन्होंने न्यायपालिका की स्वतंत्रता, मौलिक अधिकार, अमीर और गरीब के लिए न्याय तक पहुंच, न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व और मीडिया की भूमिका जैसे मुद्दे उठाए.
अमीर और ताकतवर लोगों के पक्ष में झुकाव का आरोप
दवे ने आरोप लगाया कि मौजूदा न्याय व्यवस्था में अमीर और ताकतवर लोगों का प्रभाव बढ़ गया है. उन्होंने कहा कि आम आदमी के लिए न्याय हासिल करना मुश्किल होता जा रहा है, जबकि प्रभावशाली लोगों के मामलों में अदालतों में तेजी दिखाई देती है.
उन्होंने बड़े कारोबारी समूहों का जिक्र करते हुए कहा कि अखबारों में अक्सर ऐसी खबरें आती हैं, जिनमें बड़े उद्योग समूहों को अदालतों से अपने पक्ष में फैसले मिलते हैं. दवे ने सवाल उठाया कि आखिर ऐसा बार-बार कैसे हो रहा है. उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 32 का भी जिक्र किया और कहा कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में सुप्रीम कोर्ट को अपनी संवैधानिक भूमिका मजबूती से निभानी चाहिए.
दवे ने आपातकाल के दौर से लेकर पिछले करीब 12 वर्षों के घटनाक्रम का जिक्र करते हुए भी मौलिक अधिकारों की सुरक्षा पर सवाल उठाए. उन्होंने एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को लेकर सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की भूमिका पर भी चिंता जताई और कहा कि इससे वयस्क मताधिकार को लेकर सवाल पैदा होते हैं.
महिला जजों की नियुक्ति से लेकर मीडिया तक पर सवाल
दवे ने न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ के कार्यकाल का जिक्र करते हुए कहा कि उस दौरान सुप्रीम कोर्ट में 17 जज नियुक्त किए गए, लेकिन इनमें एक भी महिला नहीं थी. उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में समाज के अलग-अलग वर्गों और महिलाओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व होना जरूरी है.
मीडिया की भूमिका पर भी दवे ने सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि बेरोजगारी, किसानों की समस्याओं और निवेश जैसे अहम मुद्दों पर पर्याप्त गंभीर चर्चा नहीं हो रही. उन्होंने मीडिया में गलत सूचना के बढ़ते प्रभाव और बड़े कारोबारी हितों के असर का आरोप लगाया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मीडिया से संवाद को लेकर भी उन्होंने टिप्पणी की.
दवे के ये आरोप और टिप्पणियां उनके भाषण में व्यक्त विचार हैं. खासकर जजों के भ्रष्टाचार और बड़े कारोबारी समूहों को कथित लाभ से जुड़े आरोपों को किसी अदालत के स्थापित निष्कर्ष के तौर पर नहीं देखा जा सकता.
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