भगत सिंह का नाम आते ही जेहन में एक ऐसे युवा क्रांतिकारी की तस्वीर उभरती है—हाथ में पिस्तौल, सिर पर टोपी और चेहरे पर बेखौफ तेवर. लेकिन, भगत सिंह की कहानी सिर्फ बम, बंदूक और फांसी के फंदे तक सीमित नहीं थी. जेल की सलाखों के पीछे उनका एक ऐसा रूप भी था, जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं. वह एक ऐसे युवा थे, जो अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों में भी लगातार पढ़ रहे थे, नोट्स बना रहे थे और समाज, राजनीति, आजादी, मजदूरों और इंसाफ जैसे गंभीर सवालों पर विचार कर रहे थे.
इस वैचारिक गहराई की सबसे बड़ी मिसाल उनकी ‘जेल नोटबुक’ है. यह 404 पन्नों की वह नोटबुक थी, जिसमें भगत सिंह ने अलग-अलग किताबों से पढ़ी गई बातें, खास उद्धरण (Quotes) और अपने नोट्स दर्ज किए थे. संस्कृति मंत्रालय के रिकॉर्ड के मुताबिक, इस नोटबुक के करीब 75 पन्नों पर उन्होंने खुद अपने हाथ से सामग्री लिखी थी.
ये कोई आम ‘जेल डायरी’ नहीं थी
नाम भले ही इसे ‘जेल नोटबुक’ या ‘जेल डायरी’ कहा जाता हो, लेकिन इसमें जेल के रोजमर्रा के जीवन का कोई ब्यौरा नहीं है. इसमें यह नहीं लिखा है कि उन्होंने किस दिन क्या खाया, कौन मिलने आया या उनका दिन कैसा बीता. इसके बजाय, यह एक रीडिंग नोटबुक थी. भगत सिंह जो भी किताबें पढ़ते, उनमें से जो बातें उन्हें महत्वपूर्ण लगतीं, उन्हें वे अपनी लिखावट में उतार लेते थे. कहीं लंबा उद्धरण होता, कहीं छोटा नोट और कहीं किसी विचार या शब्द का अर्थ. इससे साफ है कि जेल की कोठरी उनके लिए सिर्फ सजा काटने की जगह नहीं, बल्कि पढ़ने और सोचने का एक विशाल मंच बन गई थी.
मार्क्स से लेकर रूसो और वोल्तेयर तक
इस नोटबुक को पलटने से पता चलता है कि भगत सिंह की पढ़ाई का दायरा कितना व्यापक था. इसमें दुनिया के महान विचारकों और दार्शनिकों के विचार दर्ज हैं. राजनीतिक दार्शनिकों में कार्ल मार्क्स, फ्रेडरिक एंगेल्स, लेनिन, ट्रॉट्स्की, रूसो, वोल्तेयर, हॉब्स और मैकियावेली शामिल हैं, तो वहीं साहित्यकारों और लेखकों में विक्टर ह्यूगो, मैक्सिम गोर्की, फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की, अल्फ्रेड टेनिसन, बर्ट्रेंड रसेल, यूजीन डेब्स और अप्टन सिंक्लेयर के उद्धरण मिलते हैं.
इसके अलावा, भारतीय चिंतकों में लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल और रवींद्रनाथ टैगोर के विचार भी इस नोटबुक में बखूबी दर्ज हैं. इससे यह साफ हो जाता है कि भगत सिंह केवल क्रांतिकारी साहित्य तक सीमित नहीं थे, बल्कि वे दुनिया भर के राजनीतिक और दार्शनिक विचारों को गहराई से पढ़कर समझने की कोशिश कर रहे थे.
किन सवालों के जवाब तलाश रहे थे भगत सिंह?
नोटबुक के विषयों पर नजर डालें तो इसमें कई ऐसे सवाल शामिल हैं, जो किसी भी सभ्य समाज की बुनियाद से जुड़े हैं—जैसे गरीबी क्यों है, मजदूरों की असल स्थिति कैसी होनी चाहिए, राज्य की वास्तविक भूमिका क्या हो, लोकतंत्र और तानाशाही में क्या अंतर है, क्रांति का वास्तविक अर्थ क्या है, कानून और सजा का मकसद क्या होना चाहिए और समाज में शोषण कैसे पैदा होता है. इस नोटबुक के प्रकाशित संस्करणों की विषय-सूची में ‘Freedom from Poverty’, ‘Poor Labourers’, ‘Capitalism and Commercialism’, ‘Revolution and Classes’ और ‘Democracy’ जैसे हिस्से आज भी मौजूद हैं.
इस जेल नोटबुक की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसमें ‘आजादी’ का दायरा सिर्फ अंग्रेजी हुकूमत को भगाने तक सीमित नहीं है. उनकी पढ़ाई में गरीबी, आर्थिक असमानता, मजदूरों की बदहाली और सामाजिक शोषण जैसे सवाल लगातार सामने आते हैं. इससे साबित होता है कि भगत सिंह के लिए राजनीतिक आजादी के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक आजादी भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी. उन्हें सिर्फ एक हथियार उठाने वाले क्रांतिकारी के रूप में देखना उनकी पूरी वैचारिक यात्रा को अधूरा समझना होगा.
नोट : भगत सिंह जयंती 27/28 सितंबर 1907 को बताई जाती है.
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