सितंबर 1857 के आते-आते देश के विस्तृत भूगोल में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सुलग रही बगावत की आंच छोटानागपुर के छोर तक आ पहुंची थी. मेरठ से उठी चिंगारी दिल्ली, कानपुर, लखनऊ और बिहार को चीरती हुई जब पलामू के जंगलों और पहाड़ियों तक पहुंची, तो यहाँ का जनजीवन भी थर्रा उठा. जंगल-पहाड़ों के बीच अंग्रेजी राज के खिलाफ पहले से ही असंतोष का लावा सुलग रहा था, जिसे आसपास के इलाकों से आ रही विद्रोह की खबरों ने और भड़का दिया. स्थानीय जमींदारों के सामने अपने वजूद को बचाने की चुनौती थी, तो चेरो और भोगता समुदायों के भीतर अपनी पुश्तैनी जमीन और जागीरें छिन जाने की गहरी बेचैनी थी. इसी उथल-पुथल भरे माहौल के बीच 26 सितंबर 1857 को शाहपुर में एक ऐसा अहम जमावड़ा हुआ, जिसने पलामू में अंग्रेजों के खिलाफ संगठित प्रतिरोध की ठोस नींव रख दी. इसके कुछ ही हफ्तों बाद नीलांबर और पीतांबर के नेतृत्व में यह सुलगता असंतोष खुले और भीषण सशस्त्र विद्रोह में तब्दील हो गया.
चेरो जागीरदारों और भोगता नेताओं के इस ऐतिहासिक गठजोड़ के पीछे अंग्रेजों की दमनकारी राजस्व व्यवस्था और स्थानीय सत्ता पर बढ़ता दखल मुख्य वजह था. ईस्ट इंडिया कंपनी ने अठारहवीं सदी के मध्य में चेरो सत्ता के आपसी विवादों में टांग अड़ाकर पलामू में अपना शिकंजा कसना शुरू किया था, जो 1771 के बाद लगातार बढ़ता गया. नतीजा यह हुआ कि पारंपरिक सामंतों और जागीरदारों के अधिकार कुचले जाने लगे.
इसी पृष्ठभूमि में नीलांबर और पीतांबर (जो भोगता समुदाय के खरवार समूह से ताल्लुक रखते थे और जिनके पिता चेमू सिंह एक प्रतिष्ठित जागीरदार थे) ने अंग्रेजों को चुनौती देने का मन बनाया. जब रांची और हजारीबाग में सैनिक विद्रोह की खबर पलामू पहुँची, तो इन दोनों भाइयों ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया.
शाहपुर की वह गुप्त बैठक, जिसने रची थी बगावत की पृष्ठभूमि
दिन 26 सितंबर 1857 को शाहपुर में हुई वह निर्णायक बैठक आखिरी चेरो राजा चुरामन राय की विधवा के निवास पर हुई थी. इस बैठक का जिक्र इतिहासकार बिस्वमोय पति की किताब The 1857 Rebellion में मिलती है. इस गुप्त और रणनीतिक बैठक में चेरो परिवार की अलग-अलग शाखाओं के नुमाइंदे शामिल हुए, जिनमें बिसरामपुर के भवानी बख्श राय, चुकला के राम बख्श राय और लुकना के देवी बख्श राय जैसे प्रमुख नाम शामिल थे.
नीलांबर और पीतांबर भी इसी राजनीतिक लामबंदी का मुख्य चेहरा बने. इस बैठक का मकसद सिर्फ अंग्रेजों को ललकारना नहीं, बल्कि चेरो सत्ता को उसके पुराने वैभव के साथ पुनर्जीवित करना था. हालांकि इस दिन कोई बड़ा सैन्य हमला नहीं हुआ, लेकिन इसने आने वाले संघर्ष की पटकथा लिख दी.
सशस्त्र विद्रोह और अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध के बीच
इसके ठीक बाद 21 अक्टूबर 1857 को करीब पांच सौ विद्रोहियों का सशस्त्र दल मैदान में उतर गया. चैनपुर के रघुबर दयाल को निशाना बनाने के साथ शुरू हुआ यह अभियान शाहपुर और लेस्लीगंज तक फैल गया. शाहपुर में पुलिस थाने पर हमला बोलकर अंग्रेजों के सरकारी रिकॉर्ड खाक कर दिए गए और लेस्लीगंज में लेफ्टिनेंट ग्राहम के सीमित प्रशासन को खुली चुनौती दी गई. पलामू का जटिल और पहाड़ी भूगोल विद्रोहियों के लिए सबसे बड़ा संबल बना, जिससे वे अंग्रेजी सेना की गिरफ्त से बचते हुए लगातार वार करते रहे.
विद्रोह की आग बुझाने के लिए अंग्रेजों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी. दिसंबर 1857 में मेजर कॉटर के नेतृत्व में सेना पलामू भेजी गई और देवी बख्श राय को गिरफ्तार कर लिया गया. जनवरी 1858 में छोटानागपुर के कमिश्नर एडवर्ड टुइट डाल्टन भारी सैन्य बल के साथ पलामू किले पर काबिज हो गए. इसके बावजूद नीलांबर-पीतांबर ने घुटने नहीं टेके. वे घने जंगलों और पहाड़ों के भीतर चले गए और गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाकर अंग्रेजों की नींद हराम कर दी.
उन्होंने विद्रोही ताकतों को एकजुट करने के लिए बाबू कुंवर सिंह के भाई अमर सिंह से भी संपर्क साधने की कोशिश की. फरवरी 1858 में कैप्टन डाल्टन ने दो हजार सैनिकों के साथ उनके मूल गांव चेमो पर धावा बोला, लेकिन दोनों भाई फिर भी अंग्रेजों के हाथ नहीं आए. अंग्रेजी हुकूमत ने उनके समर्थकों के गांवों को उजाड़ना, मवेशी और संपत्तियां जब्त करना शुरू कर दिया, ताकि विद्रोहियों की आर्थिक और सामाजिक जमीन खींच ली जाए.
आखिरकार अथक सैन्य अभियानों और घेराबंदी के बीच वे दिन आ ही गया जिसका अंदेशा था. तमाम वीरता और संघर्ष के बाद दोनों वीर भाइयों को गिरफ्तार कर लिया गया. इतिहास के पन्नों में 28 मार्च 1859 का दिन एक बड़े बलिदान के रूप में दर्ज हो गया, जब लेस्लीगंज में नीलांबर और पीतांबर को सरेआम फांसी पर लटका दिया गया. पलामू का यह संघर्ष महज कुछ लोगों की बगावत नहीं था, बल्कि यह जल, जंगल, जमीन और अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए लड़ी गई एक ऐसी ऐतिहासिक लड़ाई थी, जो आज भी झारखंड की माटी और यहाँ के जनमानस में अमर है.
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