Islamabad: पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद इन दिनों एक भयावह सन्नाटे और अनिश्चितता की गिरफ्त में है। पिछले 11 दिनों से शहर की धड़कनें पूरी तरह थम सी गई हैं। जहां एक ओर देश का नेतृत्व वैश्विक राजनीति में खुद को शांतिदूत के तौर पर पेश करने की नाकाम कोशिशों में उलझा है, वहीं दूसरी ओर आम जनता आर्थिक और प्रशासनिक संकट की दोहरी मार झेलने को मजबूर है। शहर में अघोषित कर्फ्यू जैसे हालात हैं, जहां स्कूल-कॉलेज से लेकर बाजार तक सब कुछ बंद पड़ा है।
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव और युद्ध जैसी स्थितियों के बीच पाकिस्तान ने कूटनीतिक ‘बिचौलिये’ की भूमिका निभाने का जो दांव खेला था, वह अब पूरी तरह विफल साबित होता दिख रहा है। अमेरिका के साथ खड़े होकर ईरान को मनाने का यह ‘ड्रामा’ न केवल नाकाम रहा, बल्कि अब ईरान भी पाकिस्तान के इस दोहरे खेल को पूरी तरह समझ चुका है। इस्लामाबाद में शांतिवार्ता के नाम पर दो बार जो मंच सजाया गया था, उसका नतीजा सिफर रहा है।
वार्ता की विफलता का आलम यह है कि राजधानी को बंद रखने के अलावा प्रशासन के पास फिलहाल कोई रास्ता नहीं बचा है। अल जजीरा की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, इस्लामाबाद की स्थिति सामान्य दिनों की तुलना में बेहद चिंताजनक है। जो बाजार कुछ हद तक खुले भी हैं, वहां ग्राहकों का पहुंचना लगभग नामुमकिन है। परिवहन व्यवस्था सीमित होने से शहर की रफ्तार थम गई है और इसका सीधा असर रोज कमाने-खाने वाले मध्यम और गरीब वर्ग पर पड़ रहा है।
इस संकट की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय मीडिया पर कड़ा नियंत्रण लागू है और पत्रकारों को जमीनी हकीकत दिखाने की अनुमति नहीं है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सेना प्रमुख आसिम मुनीर और सरकार द्वारा इस्लामाबाद को खोलने का फैसला लेना महज एक प्रशासनिक कदम नहीं होगा। यह इस बात का स्पष्ट संकेत होगा कि पर्दे के पीछे चल रही कूटनीतिक बातचीत पूरी तरह विफल हो चुकी है।
शहर का बंद रहना ही अपने आप में एक बड़ा संदेश है, और उसका खुलना आने वाले समय की किसी बड़ी राजनीतिक हलचल का संकेत बन सकता है। यह संकट केवल सुरक्षा या राजनीति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह भरोसे के एक गहरे संकट का प्रतीक बन गया है। सरकार, सेना और जनता के बीच बढ़ती दूरियां पूरे देश की स्थिरता के लिए खतरा पैदा कर रही हैं।
होर्मुज का संकट गहराता जा रहा है और ईरान का अमेरिका पर अविश्वास चरम पर है। इन सबके बीच सवाल यह उठता है कि क्या यह खामोशी किसी बड़े टकराव की भूमिका तैयार कर रही है, या इस्लामाबाद का यह बंद पाकिस्तान के लिए एक और विनाशकारी आर्थिक अध्याय की शुरुआत है?
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