जोहार लाइव ब्यूरो
झारखंड हाईकोर्ट ने सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली और मुकदमों में देरी को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार की ओर से दायर अपील में 445 दिनों की देरी को माफ करने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि केवल फाइल के एक टेबल से दूसरे टेबल तक जाने और अलग-अलग स्तरों पर स्वीकृति लेने में समय लगने की दलील को हर मामले में देरी का उचित स्पष्टीकरण नहीं माना जा सकता. अदालत ने इसे महज बहाना करार देते हुए विलंब माफी की अर्जी खारिज कर दी.
यह आदेश झारखंड हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक और न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने 6 अक्टूबर 2026 को सुनाया. मामला एलपीए (फाइलिंग) संख्या 716/2025 से संबंधित था. राज्य सरकार ने 4 अक्टूबर 2023 को एकल पीठ द्वारा पारित आदेश के खिलाफ अपील दायर की थी, लेकिन अपील दाखिल करने में 445 दिनों की देरी हो गई थी. इस देरी को माफ कराने के लिए आईए संख्या 10828/2025 दाखिल की गई थी.
सरकारी प्रक्रिया में देरी को नहीं माना पर्याप्त कारण
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने दलील दी कि अपील दायर करने की अनुमति और अंतिम स्वीकृति लेने में काफी समय लगा. फाइल एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी के पास भेजी गई और विभिन्न स्तरों पर अनुमोदन की प्रक्रिया पूरी होने के कारण अपील समय पर दाखिल नहीं हो सकी.
खंडपीठ ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया. न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद ने आदेश में कहा कि सीमा कानून एक प्रक्रियात्मक आवश्यकता जरूर है, लेकिन इसे न्याय की दासी की तरह देखा जाना चाहिए, स्वामिनी की तरह नहीं. हालांकि, यदि देरी का उचित स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है तो अदालत को कानून के अनुसार उस पर सख्ती से विचार करना होगा. अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी देरी के लिए वास्तविक ‘स्पष्टीकरण’ और महज ‘बहाने’ के बीच अंतर करना जरूरी है.
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया. अदालत ने State of Odisha and Others बनाम Managing Committee of Namatara Girls High School मामले में 2026 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अत्यधिक सुस्ती, लापरवाही और निष्क्रियता वाले मामलों में लंबी देरी को माफ नहीं किया जा सकता. इसके अलावा Postmaster General बनाम Living Media India Limited मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि सरकारी विभाग केवल अपनी ‘व्यक्तिरहित मशीनरी’ और पुरानी नौकरशाही प्रक्रिया का हवाला देकर देरी की माफी नहीं मांग सकते.

आधुनिक तकनीक के दौर में सरकारी विभागों से मुकदमों के प्रति अपेक्षित सतर्कता और तत्परता की उम्मीद की जाती है. खंडपीठ ने Union of India बनाम Jahangir Byramji Jeejeebhoy मामले का भी उल्लेख या और कहा कि देरी की अवधि स्वयं एक महत्वपूर्ण कारक है. लंबे समय तक निष्क्रियता को सामान्य रूप से गैर-जानबूझकर हुई देरी नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब दूसरे पक्ष के अधिकार प्रभावित हो रहे हों.
जमीन विवाद से जुड़ा है मामला
मामले की मूल पृष्ठभूमि धनबाद जिले के झरिया क्षेत्र की जमीन से जुड़ी है. प्रथम प्रतिवादी शिव रतन प्रसाद गुप्ता ने डब्ल्यूपी(सी) संख्या 3581/2021 के माध्यम से सर्किल ऑफिसर, झरिया द्वारा जमीन पर यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश को चुनौती दी थी. विवाद खाता संख्या 27 और प्लॉट संख्या 737 एवं 739 से संबंधित था. राज्य की ओर से जमीन को ‘अनाबाद बिहार सरकार’ के रूप में दर्ज होने का दावा किया गया था, जबकि याचिकाकर्ता ने अपने कब्जे को वैध बताते हुए रिविजनल सर्वे रिकॉर्ड ऑफ राइट्स का हवाला दिया था.
एकल पीठ ने पाया था कि इसी जमीन के अधिकार, स्वामित्व और हित को लेकर राज्य के खिलाफ सिविल मुकदमा पहले से लंबित था. ऐसे में मुकदमे के लंबित रहने के दौरान सर्किल अधिकारी द्वारा यथास्थिति बनाए रखने का आदेश पारित करना उचित नहीं था. एकल पीठ ने उक्त आदेश को रद्द कर दिया था.खंडपीठ ने यह भी गौर किया कि संबंधित सिविल मुकदमे में राज्य के अधिकारी, जो हाईकोर्ट की कार्यवाही में भी पक्षकार थे, अदालत के समक्ष उपस्थित होकर मामले का प्रभावी बचाव नहीं कर पाए थे.
मेरिट पर भी राज्य को नहीं मिली राहत
राज्य की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि मामले के मेरिट में सरकार का पक्ष मजबूत है और इसलिए न्याय के हित में 445 दिनों की देरी माफ की जानी चाहिए. खंडपीठ ने कहा कि सामान्य तौर पर विलंब माफी के चरण में अपील के मेरिट की जांच नहीं की जाती, लेकिन राज्य की दलील के सम्मान में अदालत ने मामले के मेरिट पर भी विचार किया.
अदालत ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर वह राज्य के इस तर्क से सहमत नहीं है कि उसका मामला मजबूत है या देरी माफ करना ‘सार्वजनिक हित में पर्याप्त न्याय’ के लिए जरूरी है. अंततः खंडपीठ ने 445 दिनों की देरी को माफ करने से इनकार करते हुए आईए संख्या 10828/2025 खारिज कर दी. इसके साथ ही देरी के कारण अपील भी आगे नहीं चल सकी और संबंधित अन्य अंतरिम आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया गया.
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