संसद से पास हुआ MMDR संशोधन बिल 2026 खनिज संपदा वाले राज्यों और केंद्र के बीच नई वित्तीय खींचतान की वजह बन गया है. बिल का सबसे अहम प्रावधान राज्यों के mineral rights और mineral-bearing land पर टैक्स, सेस और दूसरी लेवी लगाने की शक्ति से जुड़ा है. लोकसभा ने 12 अगस्त और राज्यसभा ने 13 अगस्त को बिल पास किया. अब यह राष्ट्रपति की मंजूरी के इंतजार में है.
आखिर विवाद क्या है?
बिल के मुताबिक राज्य सरकारें mineral rights या mineral-bearing land पर नई टैक्स, cess या levy मनमाने तरीके से नहीं लगा सकेंगी. ऐसी लेवी केंद्र सरकार की ओर से तय शर्तों और सीमाओं के अधीन ही लगाई जा सकेगी.
बिल में एक और अहम प्रावधान है. कानून लागू होने से पहले लगाई गई ऐसी लेवी के जो बकाये अभी तक वसूले या recover नहीं हुए हैं, उन्हें भी खत्म किया जा सकता है. हालांकि जो रकम पहले ही वसूल या जमा हो चुकी है, उसे वापस करने का प्रावधान नहीं है. यही प्रावधान राज्यों की चिंता की सबसे बड़ी वजह है.
क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला
इस विवाद को समझने के लिए 2024 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला महत्वपूर्ण है. सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने 25 जुलाई 2024 को 8:1 के बहुमत से कहा था कि royalty टैक्स नहीं है और राज्यों के पास mineral rights पर टैक्स लगाने की शक्ति है. यानी राज्यों को खनिज से जुड़े अपने टैक्स और सेस के जरिए अतिरिक्त राजस्व जुटाने की संवैधानिक गुंजाइश मिली थी.
अब 2026 का MMDR संशोधन उसी व्यवस्था पर नई केंद्रीय सीमाएं लगाने की कोशिश करता है. हालांकि 2024 के फैसले में यह भी कहा गया था कि संसद mineral rights पर राज्यों की taxing power पर limitations लगा सकती है. यही बिंदु केंद्र के मौजूदा कानून का संवैधानिक आधार बन रहा है.
राज्यों की स्थिति
झारखंड: 14,656 करोड़ का दांव
झारखंड इस विवाद के केंद्र में है क्योंकि राज्य ने 2024 में Mineral Bearing Land Cess लागू किया था. राज्य के 2026-27 बजट में इस cess से 14,656 करोड़ राजस्व मिलने का अनुमान है. 2025-26 के revised estimate में यह करीब 13,442 करोड़ था.
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर बिल पर पुनर्विचार की मांग की है. सोरेन का कहना है कि Mineral Bearing Land Cess से राज्य को करीब 7,110 करोड़ सालाना मिलने की उम्मीद है और खनन से जुड़ा राजस्व झारखंड की वित्तीय स्थिति में अहम भूमिका निभाता है. उन्होंने बिल के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन का भी ऐलान किया है.

ओडिशा की चिंता क्यों बड़ी है?
ओडिशा की अर्थव्यवस्था में mining revenue का महत्व बहुत ज्यादा है. राज्य ने 2026-27 में करीब 56,000 करोड़ mining revenue का अनुमान रखा है. BJD प्रमुख नवीन पटनायक ने MMDR संशोधन का विरोध करते हुए मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी से सर्वदलीय बैठक और विशेष विधानसभा सत्र बुलाने की मांग की है.
ओडिशा की चिंता सिर्फ भविष्य में नया cess लगाने की शक्ति को लेकर नहीं है. 2024 के सुप्रीम कोर्ट फैसले के बाद राज्य में mineral-bearing land पर टैक्स लगाने की पुरानी व्यवस्था को लेकर भी उम्मीद जगी थी. अब नए संशोधन से उस रास्ते पर भी असर पड़ सकता है.
कर्नाटक और तमिलनाडु ने भी 2024 के सुप्रीम कोर्ट फैसले के बाद mineral-bearing land और mineral rights पर राज्य स्तर पर टैक्स लगाने की व्यवस्था आगे बढ़ाई थी. तमिलनाडु को खनिजों पर नए टैक्स से करीब 2,400 करोड़ सालाना अतिरिक्त राजस्व मिलने का अनुमान है, जबकि कर्नाटक को माइनिंग रॉयल्टी और नए टैक्स को मिलाकर करीब 12,000 करोड़ का राजस्व मिलने की संभावना है.
इसके अलावा केरल ने बिल के खिलाफ राजनीतिक और कानूनी लड़ाई लड़ने की बात कही है. केरल का सवाल सिर्फ राजस्व का नहीं, बल्कि land और राज्यों की संवैधानिक शक्तियों का भी है.

वहीं मध्य प्रदेश, राजस्थान और आंध्र प्रदेश जैसे खनिज उत्पादक राज्यों को भी इस बहस में देखना जरूरी है. लेकिन इन्हें फिलहाल झारखंड या केरल की तरह सीधे विरोध करने वाले राज्य कहना सही नहीं होगा.
केंद्र का तर्क क्या है?
केंद्र सरकार का कहना है कि यह कानून राज्यों का मौजूदा mineral revenue खत्म करने के लिए नहीं है. केंद्रीय खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने कहा है कि राज्यों को mineral revenue में नुकसान नहीं होगा. केंद्र का तर्क है कि अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग टैक्स और cess व्यवस्था से mining companies पर अतिरिक्त और अनिश्चित बोझ पड़ रहा था.
सरकार के मुताबिक अलग-अलग राज्यों में अलग दरें, mining शुरू होने के बाद नई लेवी और retrospective tax demands से निवेश का माहौल प्रभावित होता है. इसलिए केंद्र एक uniform और predictable taxation framework बनाना चाहता है.
साल 2024 के सुप्रीम कोर्ट फैसले में भी साफ किया गया था कि royalty tax नहीं है. इसलिए सवाल यह नहीं है कि राज्यों को खनन से मिलने वाला हर पैसा बंद हो जाएगा. सवाल यह है कि राज्य अपनी तरफ से mineral rights या mineral-bearing land पर अतिरिक्त टैक्स और cess लगाने की कितनी स्वतंत्रता रखेंगे.
MMDR संशोधन का सबसे संवेदनशील हिस्सा पुराने बकायों से जुड़ा है.
अगर किसी राज्य ने पहले mineral rights या mineral-bearing land पर tax या cess लगाया था, लेकिन उसकी रकम अभी तक recover नहीं हुई है, तो नए कानून के तहत ऐसे बकायों की वसूली पर रोक लग सकती है.
यही वजह है कि राज्यों की चिंता सिर्फ भविष्य की कमाई तक सीमित नहीं है. सवाल यह भी है कि 2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जिन पुराने दावों को लेकर राज्यों ने राजस्व की उम्मीद बनाई थी, उनका क्या होगा?
Also Read: खान व खनिज बिल पर भड़के हेमंत सोरेन, बोले- खनिज हमारा तो फैसला दिल्ली क्यों करेगी?


