मुस्कान चौधरी
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान बड़ी संख्या में महिलाओं और ट्रांसजेंडर लोगों के मतदाता सूची से बाहर होने की आशंका जताते हुए देशभर के 50 महिला अधिकार कार्यकर्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों और शोधकर्ताओं ने भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है. ऑल इंडिया फेमिनिस्ट अलायंस (ALIFA-NAPM) की ओर से आयोग को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि एसआईआर प्रक्रिया में दस्तावेजों और पहचान से जुड़ी मौजूदा व्यवस्था कई महिलाओं, ट्रांसजेंडर लोगों और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लिए बड़ी बाधा बन रही है. संगठनों ने आयोग से अपील की है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान कोई भी पात्र नागरिक अपने वोट के अधिकार से वंचित न हो.
पत्र में कहा गया है कि एसआईआर के पहले दो चरणों में 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के आंकड़े चिंताजनक हैं. इनके मुताबिक करीब 8.9 फीसदी जीवित मतदाताओं के नाम नई सूची में शामिल नहीं हो सके. सबसे ज्यादा असर महिलाओं, ट्रांसजेंडर लोगों और अल्पसंख्यक समुदायों, खासकर मुस्लिम समाज पर पड़ा है. बिहार, राजस्थान और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में नई मतदाता सूची में महिला मतदाताओं का अनुपात भी घट गया है. संगठनों का कहना है कि अगर तीसरे चरण में सुधार नहीं किया गया तो बड़ी संख्या में पात्र नागरिक अपने मतदान के अधिकार से वंचित हो सकते हैं.
सिर्फ पिता या पति के दस्तावेजों पर निर्भर नहीं हो सकती पहचान
पत्र में कहा गया है कि मौजूदा व्यवस्था महिलाओं और ट्रांसजेंडर लोगों की सामाजिक परिस्थितियों को नहीं समझती. आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं शादी के बाद दूसरे घर चली जाती हैं. कई ट्रांसजेंडर लोग परिवार से अलग रह रहे हैं. वहीं बेघर, विस्थापित और घुमंतू समुदायों के लोगों के पास पारिवारिक दस्तावेज ही नहीं होते. ऐसे में केवल पिता, पति या परिवार से जुड़े दस्तावेजों के आधार पर मतदाता बनने की शर्त रखना कई लोगों को बाहर कर सकता है.
संगठनों ने सुझाव दिया है कि आधार कार्ड, राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र के अलावा शादी का कार्ड, बच्चों के जन्म प्रमाणपत्र या स्कूल रिकॉर्ड जैसे दस्तावेजों को भी स्वीकार किया जाए. इससे उन महिलाओं को राहत मिलेगी, जिनके पास पारंपरिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं.
ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए अलग व्यवस्था बनाने की अपील
ट्रांसजेंडर समुदाय को लेकर पत्र में कहा गया है कि कई लोगों के नाम, फोटो और जेंडर संबंधी दस्तावेज एक-दूसरे से मेल नहीं खाते. ऐसे में उनका नाम मतदाता सूची से छूट सकता है. इसलिए ट्रांसजेंडर पहचान पत्र और गजट अधिसूचना को मान्य दस्तावेज माना जाए और परिवार से अलग रह रहे लोगों के लिए पहचान सत्यापित करने की अलग व्यवस्था बनाई जाए.
संगठनों ने एसआईआर की समय-सीमा बढ़ाने की भी मांग की है. उनका कहना है कि मौजूदा समय बहुत कम है, जिससे लोगों को दस्तावेज जुटाने और बीएलओ को काम पूरा करने में दिक्कत हो रही है. साथ ही बीएलओ को बेहतर प्रशिक्षण और जरूरी संसाधन भी उपलब्ध कराए जाएं.
पत्र में यह भी कहा गया है कि शादी के बाद महिलाओं का नाम बदलना सामान्य बात है. ऐसे मामलों को संदेह का आधार बनाना उचित नहीं है. इसी तरह मां और बच्चे की उम्र के अंतर को भी बिना सामाजिक परिस्थितियों को समझे संदिग्ध नहीं माना जाना चाहिए. संगठनों ने सुझाव दिया है कि नामांकन, आपत्ति और अपील की पूरी प्रक्रिया में महिलाओं और ट्रांसजेंडर लोगों के लिए अलग सहायता केंद्र बनाए जाएं. पंचायत, ईआरओ और एईआरओ कार्यालयों में जेंडर संवेदनशील हेल्प डेस्क शुरू किए जाएं, ताकि जरूरतमंद लोगों को दस्तावेज और प्रक्रिया समझने में मदद मिल सके.
पत्र में कहा गया है कि अगर किसी पात्र मतदाता का नाम एसआईआर के दौरान हट जाता है तो उसे दोबारा शामिल करने की आसान व्यवस्था होनी चाहिए. इसके लिए कम से कम एक साल का अतिरिक्त समय दिया जाए. केवल फॉर्म-6 भरने को समाधान नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि इससे सभी प्रभावित लोगों की समस्या हल नहीं होती. पत्र में मांग की गई है कि चुनाव आयोग साफ करे कि मतदाता सूची से नाम हटने का मतलब किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता खत्म होना नहीं है. इसे लेकर लोगों के बीच जागरूकता भी फैलाई जाए.
इस पत्र पर देश के अलग-अलग राज्यों के 50 महिला अधिकार कार्यकर्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों, शोधकर्ताओं और पत्रकारों ने हस्ताक्षर किए हैं. उन्होंने चुनाव आयोग से अपील की है कि एसआईआर के तीसरे चरण में जरूरी बदलाव किए जाएं, ताकि कोई भी पात्र महिला या ट्रांसजेंडर नागरिक सिर्फ दस्तावेजी या प्रशासनिक कमियों की वजह से अपने वोट के अधिकार से वंचित न रह जाए.

