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    Home»झारखंड»डायन प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, पीड़ितों के पुनर्वास पर जोर
    झारखंड

    डायन प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, पीड़ितों के पुनर्वास पर जोर

    Team JoharBy Team JoharApril 25, 2026No Comments3 Mins Read5
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    Ranchi: झारखंड में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों और विशेष रूप से ‘डायन प्रथा’ (विच हंटिंग) जैसी गंभीर सामाजिक कुरीति को जड़ से खत्म करने के लिए न्यायपालिका ने कड़ा रुख अपनाया है। शनिवार को रांची स्थित झारखंड न्यायिक अकादमी के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ऑडिटोरियम में आयोजित एक महत्वपूर्ण कोलोकीयम में देश और राज्य के शीर्ष न्यायाधीशों ने इस सामाजिक बुराई पर चिंता जताते हुए पीड़ितों के पुनर्वास और कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया।

    संविधान के अधिकारों और हकीकत में बड़ा अंतर: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ

    कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के कार्यकारी अध्यक्ष न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 14, 15 और 21 महिलाओं को समानता और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है। हालांकि, धरातल पर इन अधिकारों और उनके क्रियान्वयन के बीच एक गहरी खाई है।

    उन्होंने डायन प्रथा को केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता, सत्ता और पितृसत्ता से जुड़ा एक अमानवीय कृत्य करार दिया। न्यायमूर्ति नाथ ने जोर देकर कहा कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा समाज की एक गहरी संरचनात्मक समस्या है। इसे रोकने के लिए शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक संवेदनशीलता की नितांत आवश्यकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल अपराधियों को सजा देना ही नहीं, बल्कि पीड़ितों के पुनर्वास और उन्हें मुख्यधारा में वापस लाने पर केंद्रित होना चाहिए।

    ‘कानून की कमी नहीं, क्रियान्वयन में सुधार की जरूरत’

    कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कानून के प्रभावी कार्यान्वयन को प्राथमिकता देने की बात कही। उन्होंने कहा, “महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने के लिए चुनौती कानून की नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन की है।”

    न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने सुझाव दिया कि जिला स्तर पर विधिक निकायों (Legal Bodies) को और अधिक प्रो-एक्टिव (सक्रिय) होकर काम करना होगा। उन्होंने कहा कि ‘फायर फाइटिंग’ (घटना के बाद सक्रियता) की धारणा को बदलकर समयबद्ध तरीके से लंबित मामलों का निष्पादन करना होगा। सही पद पर सही व्यक्ति की नियुक्ति और निष्पक्ष कार्यप्रणाली ही इस दिशा में सकारात्मक बदलाव ला सकती है।

    पीड़ितों को न्याय और सहायता का संकल्प

    इस कोलोकीयम में झारखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति महेश शरदचंद्र सोनक, न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद समेत कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान यह भी सुनिश्चित किया गया कि कानूनी सहायता संस्थाएं गांव-गांव तक पहुंचें ताकि पीड़ितों को समय पर मुआवजा और कानूनी सुरक्षा मिल सके।

    कार्यक्रम के दौरान स्वयंसेवी संस्थाओं की महिलाओं के साथ-साथ दुर्घटना और बीमारी (ब्रेस्ट कैंसर) से पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता भी प्रदान की गई। अंत में, महिला एवं बाल विकास विभाग के सचिव उमाशंकर सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए सरकारी स्तर पर इन निर्देशों को अमलीजामा पहनाने का संकल्प दोहराया।

     

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