झारखंड की पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को सुनवाई हुई. केंद्र सरकार की ओर से नियुक्ति और झारखंड की 2025 की डीजीपी नियुक्ति नियमावली को चुनौती देने वाली अर्जी पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने उस प्रावधान पर सवाल उठाया, जिसके तहत छह महीने से कम की शेष सेवा वाले अधिकारी को भी डीजीपी पद के लिए पात्र बनाया गया.
कोर्ट ने झारखंड सरकार को निर्देश दिया है कि तदाशा मिश्रा को नोटिस जारी किया जाए, क्योंकि अगर विवादित नियम को रद्द किया जाता है तो उसके आधार पर हुई उनकी नियुक्ति पर भी असर पड़ सकता है. कोर्ट ने राज्य सरकार को इस बीच विवादित नियम पर दोबारा विचार करने की स्वतंत्रता भी दी है.
2025 में बनी थी डीजीपी नियुक्ति की नई नियमावली
झारखंड सरकार ने 8 जनवरी 2025 को पुलिस महानिदेशक और पुलिस महानिरीक्षक की नियुक्ति से संबंधित नई नियमावली अधिसूचित की थी. इसमें डीजीपी यानी राज्य पुलिस बल के प्रमुख की नियुक्ति की प्रक्रिया तय की गई थी. इसे राज्य सरकार ने पुलिस अधिनियम, 1861 की धारा 46 को धारा 2 के साथ पढ़ते हुए अपने अधिकारों के तहत अधिसूचित किया था.
इस नियमावली में डीजीपी पद के लिए विचार किए जाने वाले अधिकारी के पास सेवानिवृत्ति से कम से कम छह महीने की शेष सेवा होने की शर्त थी. डीजीपी के चयन के लिए अधिकारियों का पैनल तैयार करने और राज्य स्तर पर नामांकन समिति की व्यवस्था भी की गई थी.
केंद्र सरकार का कहना है कि डीजीपी की नियुक्ति में सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह मामले में तय प्रक्रिया का पालन किया जाना जरूरी है. केंद्र ने इसी आधार पर झारखंड में डीजीपी नियुक्ति से जुड़े नियमों और नियुक्तियों को चुनौती दी है.
इसी विवाद में पूर्व डीजीपी अनुराग गुप्ता की नियुक्ति भी केंद्र की आपत्ति के दायरे में रही है. उन्हें फरवरी 2025 में डीजीपी बनाया गया था, जबकि उनकी सेवानिवृत्ति में करीब तीन महीने ही बचे थे. केंद्र ने उस समय भी राज्य सरकार से नियुक्ति के संबंध में आपत्ति जताई थी.
29 दिसंबर को बदला नियम, अगले दिन तदाशा बनीं डीजीपी
तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को लेकर विवाद की मुख्य वजह दिसंबर 2025 में नियम में किया गया बदलाव है. राज्य सरकार ने 29 दिसंबर 2025 को 2025 की नियमावली में संशोधन करते हुए डीजीपी पद के लिए अनिवार्य छह महीने की शेष सेवा की शर्त हटा दी. इसके ठीक अगले दिन यानी 30 दिसंबर 2025 को तदाशा मिश्रा को झारखंड का डीजीपी नियुक्त किया गया. उस समय उनकी सेवानिवृत्ति में केवल एक दिन बचा था और उन्हें 31 दिसंबर 2025 को सेवानिवृत्त होना था.
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इसी क्रम को चुनौती दी है. उसका कहना है कि राज्य ने सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह फैसले में तय व्यवस्था का केवल अपने हित के अनुसार इस्तेमाल किया. केंद्र के मुताबिक, दो साल के कार्यकाल से जुड़े प्रावधान का लाभ लेते हुए तदाशा मिश्रा को डीजीपी बनाया गया, जबकि चयन और पैनल से जुड़ी मूल प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया.
गुरुवार की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय नियमों के विपरीत हुई है और मौजूदा डीजीपी को उनकी सेवानिवृत्ति से ठीक एक दिन पहले नियुक्त किया गया.
झारखंड सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने केंद्र की आपत्ति का विरोध किया. उन्होंने कहा कि न्याय मित्र ने अपनी सलाह दी है और केंद्र केवल झारखंड के मामले को लेकर आपत्ति कर रहा है. इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि न्याय मित्र अलग-अलग राज्यों के नियमों की भी जांच कर रहे हैं.
तदाशा मिश्रा को सुनवाई का मौका
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि झारखंड की नियमावली में छह महीने से कम की शेष सेवा वाले अधिकारी को डीजीपी नियुक्ति के लिए पात्र बनाने वाला प्रावधान प्रथम दृष्टया सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह फैसले में तय कानून के सीधे विपरीत दिखाई देता है.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यदि इस नियम को रद्द किया जाता है तो उसके परिणामस्वरूप तदाशा मिश्रा की नियुक्ति भी रद्द करनी पड़ सकती है. चूंकि उनकी नियुक्ति से उनके पक्ष में एक अधिकार पैदा हो चुका है, इसलिए उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना जरूरी है.
इसी वजह से कोर्ट ने झारखंड सरकार को तदाशा मिश्रा को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है, ताकि वह अगली सुनवाई में अपना पक्ष रख सकें. कोर्ट ने साथ ही राज्य सरकार को इस दौरान विवादित नियम पर दोबारा विचार करने की स्वतंत्रता दी है.
दूसरे राज्यों के डीजीपी नियुक्ति नियम भी जांचे जाएंगे
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह गुरुवार की सुनवाई को फिलहाल झारखंड के इसी विशेष नियम तक सीमित रख रहा है. दूसरे राज्यों में डीजीपी नियुक्ति से जुड़े नियमों और वहां की गई नियुक्तियों की स्थिति की भी न्याय मित्र जांच करेंगे.
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने पश्चिम बंगाल में डीजीपी नियुक्ति का उदाहरण भी दिया और कहा कि वहां भी सेवानिवृत्ति के करीब पहुंचे अधिकारी को डीजीपी बनाया गया था तथा केंद्र सरकार ने बाद में उनका कार्यकाल बढ़ाया था. उन्होंने कहा कि यदि इस तरह की नियुक्तियां नियमों के विपरीत हैं तो दूसरे राज्यों के मामलों पर भी समान रूप से विचार होना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने न्याय मित्र को निर्देश दिया है कि वह अन्य राज्यों द्वारा डीजीपी की नियुक्ति से संबंधित बनाए गए कानूनों, नियमों और विनियमों तथा उन नियमों के आधार पर की गई नियुक्तियों के परिणामों की भी जांच करें.
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