New Delhi : बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है, जिसने यह साफ कर दिया कि सिर्फ व्हाट्सएप या एसएमएस चैट्स दिखाकर किसी को क्रूरता का हवाला देकर तलाक नहीं दिया जा सकता। यह मामला नासिक फैमिली कोर्ट के मई 2025 के आदेश से जुड़ा था, जिसमें पति को उसकी पत्नी से तलाक दे दिया गया था।
मामला क्या था?
मामला हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता के आधार पर तलाक का था। पति ने दावा किया कि उसकी पत्नी ने उसे और उसके परिवार को मानसिक रूप से परेशान किया।
फैमिली कोर्ट ने पति की बात मानते हुए तलाक दे दिया। कोर्ट ने कहा कि पति की गवाही व्हाट्सएप और एसएमएस चैट्स से समर्थित थी। पति ने कहा कि पत्नी बार-बार नासिक छोड़कर पुणे शिफ्ट होना चाहती थी, और सास-ससुर व ननद के खिलाफ अपमानजनक बातें करती थी।
पत्नी का पक्ष सुने बिना एकतरफा फैसला
फैमिली कोर्ट ने पति की गवाही को ‘अनचैलेंज्ड’ यानी बिना किसी विरोध के माना। पत्नी को अपनी बात रखने का मौका ही नहीं मिला। कोर्ट ने कहा कि पत्नी ऐसी हरकतें नहीं कर सकती, इसलिए पति को उसके साथ रहना जरूरी नहीं है। इसी आधार पर तलाक दे दिया गया।
हाई कोर्ट का रुख
जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजुषा देशपांडे की बेंच ने यह फैसला पलट दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि महज चैट्स पर भरोसा करके तलाक देना सही नहीं है। “महज व्हाट्सएप चैट्स पर निर्भर रहकर तलाक का फैसला नहीं हो सकता, क्योंकि इसे ठीक से सबूत के तौर पर पेश नहीं किया गया।” कोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी को इन चैट्स का जवाब देने या उन्हें चुनौती देने का कोई मौका नहीं दिया गया।
आगे की प्रक्रिया
हाई कोर्ट ने नासिक फैमिली कोर्ट के आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया और मामला वापस फैमिली कोर्ट भेज दिया। अब दोनों पक्षों को अपने सबूत पेश करने और बहस करने का पूरा मौका मिलेगा। जजों ने साफ कहा कि क्रूरता साबित करने के लिए सही तरीके से सबूत पेश करना जरूरी है। बिना दूसरी पार्टी को सुने और बिना क्रॉस-एग्जामिनेशन के ऐसे संवेदनशील फैसले नहीं हो सकते।
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