मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है. चुनाव आयोग के भीतर एसआईआर और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों पर दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्ष ने उनके खिलाफ संसद में हटाने का प्रस्ताव लाने की तैयारी शुरू कर दी है.
24 सितंबर 2026 को सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक, विपक्ष दोनों सदनों में नया नोटिस देने की तैयारी में है. यह इस साल ऐसी कार्रवाई की तीसरी कोशिश होगी.
लेकिन सवाल है कि आखिर किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना इतना मुश्किल क्यों है?
CEC की नियुक्ति कैसे होती है?
मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत राष्ट्रपति करते हैं. मौजूदा व्यवस्था 2023 के कानून से तय होती है. इसके तहत एक सर्च कमेटी पांच नामों का पैनल तैयार करती है. इसके बाद प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री वाली चयन समिति नियुक्ति की सिफारिश करती है. इसके आधार पर राष्ट्रपति नियुक्ति करते हैं. कार्यकाल छह साल या 65 वर्ष की उम्र तक, जो पहले हो, होता है.
CEC को बीच कार्यकाल में हटाना इतना कठिन क्यों?
संविधान के अनुच्छेद 324(5) में मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के जज जैसी सुरक्षा दी गई है. यानी उन्हें केवल उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन पर सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है.
इसके लिए सिद्ध कदाचार या अक्षमता का आधार होना जरूरी है. केवल किसी फैसले से असहमति, सरकार या विपक्ष की नाराजगी या किसी राजनीतिक विवाद को अपने आप हटाने का आधार नहीं माना जा सकता.
हटाने की प्रक्रिया क्या है?
प्रक्रिया संसद से शुरू होती है. लोकसभा में प्रस्ताव के लिए कम से कम 100 सांसद और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं. नोटिस स्वीकार होने के बाद आरोपों की जांच के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत जांच होती है.
अगर जांच के बाद आरोप साबित होते हैं, तो प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित करना होता है. यानी सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई समर्थन जरूरी है. दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी करते हैं.
क्या किसी CEC को कभी हटाया गया है?
अब तक भारत में किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को इस संवैधानिक प्रक्रिया के जरिए पद से नहीं हटाया गया है. साल 1993 में टी.एन. शेषन और सरकार के बीच चुनाव आयोग की संरचना और शक्तियों को लेकर बड़ा विवाद हुआ था. आयोग को बहु-सदस्यीय बनाने के फैसले को शेषन ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.
सुप्रीम कोर्ट ने बाद में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और बहु-सदस्यीय व्यवस्था से जुड़े सवालों पर फैसला दिया. यह शेषन को पद से हटाने की प्रक्रिया नहीं थी. इसी तरह 2019 के चुनाव के दौरान चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने कुछ फैसलों पर असहमति दर्ज की थी. उन्होंने 2020 में इस्तीफा दे दिया. यह भी संसदीय निष्कासन नहीं था.
ज्ञानेश कुमार का मामला क्या है?
ज्ञानेश कुमार के मामले में फिलहाल हटाने की तैयारी और राजनीतिक मांग चल रही है. इससे पहले मार्च में लोकसभा में 130 सांसदों के हस्ताक्षर वाला नोटिस दिया गया था, जिसे लोकसभा अध्यक्ष ने स्वीकार नहीं किया. अप्रैल में भी राज्यसभा में नोटिस दिया गया था. अब विपक्ष ताजा घटनाक्रम के बीच दोनों सदनों में नया नोटिस देने की तैयारी कर रहा है.
इसलिए किसी प्रस्ताव का नोटिस देना और CEC को वास्तव में पद से हट जाना, दोनों बिल्कुल अलग चरण हैं. संवैधानिक प्रक्रिया में संसद के दोनों सदनों से विशेष बहुमत और आरोपों के साबित होने जैसी कई कड़ी शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं.
दूसरे चुनाव आयुक्तों से क्या फर्क है?
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की सुरक्षा सबसे ज्यादा है. संविधान के मुताबिक अन्य चुनाव आयुक्तों और क्षेत्रीय आयुक्तों को राष्ट्रपति केवल मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर हटा सकते हैं. यही व्यवस्था CEC के पद को कार्यपालिका के सीधे हस्तक्षेप से बचाने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है.

