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    Home»झारखंड»बाबाधाम : जहां शिव-शक्ति का मिलन होता है धागे से, वैवाहिक जीवन में सुख-शांति के लिए लोग बांधते हैं यहां डोर
    झारखंड

    बाबाधाम : जहां शिव-शक्ति का मिलन होता है धागे से, वैवाहिक जीवन में सुख-शांति के लिए लोग बांधते हैं यहां डोर

    Team JoharBy Team JoharJuly 14, 2025Updated:July 14, 2025No Comments3 Mins Read0
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    बैद्यनाथ धाम
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    Johar Live Desk : सावन का पवित्र महीना शुरू होते ही देशभर के शिवभक्तों की निगाहें झारखंड के देवघर स्थित बैद्यनाथ धाम पर टिक जाती हैं। यह मंदिर भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और यहां हर साल सावन में श्रावणी मेला लगता है, जिसमें लाखों कांवरिए ‘बोल बम’ का जयकारा लगाते हुए भगवान शिव पर गंगाजल चढ़ाते हैं।

    रावण की भक्ति और शिवलिंग की स्थापना की पौराणिक कथा

    बैद्यनाथ धाम की सबसे प्रसिद्ध कथा लंकापति रावण से जुड़ी है। मान्यता है कि रावण ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और उनसे ज्योतिर्लिंग को लंका ले जाने का वरदान पाया। लेकिन भगवान शिव ने शर्त रखी कि शिवलिंग को यदि रास्ते में कहीं रखा गया, तो वह वहीं स्थायी रूप से स्थापित हो जाएगा।

    रावण जब देवघर के पास रुका, तो भगवान विष्णु ने चरवाहे का रूप धारण कर शिवलिंग को वहीं स्थापित कर दिया। रावण लाख कोशिशों के बाद भी शिवलिंग को उठा न सका। तब से यह पवित्र स्थल बैद्यनाथ धाम के रूप में जाना जाता है।

     शिव और शक्ति का अद्भुत संगम

    बैद्यनाथ धाम देश का एकमात्र ज्योतिर्लिंग है, जहां भगवान शिव के साथ माता पार्वती का भी वास है। यहां की खास गठबंधन पूजा में श्रद्धालु शिव और शक्ति के मंदिरों के गुंबदों को धागे से जोड़ते हैं, जिससे वैवाहिक जीवन में सुख-शांति की कामना की जाती है।

     पंचशूल: पाँच तत्वों का रक्षक

    इस मंदिर के शिखर पर विराजमान है पंचशूल, जो अन्य ज्योतिर्लिंगों में नहीं देखा जाता। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश – इन पाँच तत्वों का प्रतीक है। माना जाता है कि यह पंचशूल मंदिर की सुरक्षा करता है और बुरी शक्तियों को दूर रखता है।

    जलाभिषेक की पौराणिक परंपरा

    सावन में भगवान शिव पर जल चढ़ाने की परंपरा समुद्र मंथन से जुड़ी है। जब भगवान शिव ने विष पीकर संसार की रक्षा की थी, तब देवताओं ने उन्हें ठंडक देने के लिए उन पर जल चढ़ाया था। तभी से जलाभिषेक की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी श्रद्धा और भक्ति से निभाई जाती है।

     कांवर यात्रा और ‘बोल बम’ की गूंज

    सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर कांवरिए 108 किलोमीटर पैदल चलकर देवघर पहुंचते हैं। कांवर को जमीन पर नहीं रखा जाता क्योंकि इसमें त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) का वास माना जाता है। ‘बोल बम’ का नारा शिवभक्तों में जोश और ऊर्जा भर देता है, जिससे वे कठिन यात्रा भी मुस्कुराकर पूरी करते हैं।

    भगवान राम की भी थी कांवर यात्रा

    मान्यता है कि भगवान राम ने भी लंका विजय से पूर्व बैद्यनाथ धाम आकर शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाया था। इसी परंपरा को निभाते हुए आज भी भक्त कांवर यात्रा करते हैं।

     21 मंदिरों का भव्य परिसर

    बैद्यनाथ धाम परिसर में कुल 22 मंदिर हैं। मुख्य शिव मंदिर के अलावा माता पार्वती, बजरंगबली, भैरवनाथ और अन्नपूर्णा देवी के मंदिर शामिल हैं। इनमें से कुछ का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने किया था, जबकि अन्य ऐतिहासिक मंदिर राजाओं और पंडों के पूर्वजों द्वारा बनवाए गए हैं।

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