विजय उराँव, जोहार लाइव सवांददाता
झारखंड की माटी में संस्कृति की गंध है, तो यहाँ के लोकगीतों और वाद्ययंत्रों में यहाँ की आत्मा बसती है. लेकिन इस संस्कृति को जीवित रखने के लिए कुछ ऐसे जीवट लोग भी होते हैं जो अपनी हर साँस में उस परंपरा को पिरोते हैं. रांची जिले के सिल्ली प्रखंड के गडेडीर गाँव की रहने वाली हेमली कुमारी ऐसी ही एक बेबाक और अडिग शख्सियत हैं, जिन्होंने समाज के ताने-बाने, रूढ़ियों और आर्थिक तंगी की हर दीवार को ढोल की एक-एक थाप से गिरा दिया.
रांची जिले के सिल्ली प्रखंड के गडेडीर गांव में 12 मार्च 2002 को जन्मीं हेमली कुमारी की कहानी सिर्फ एक महिला कलाकार के संघर्ष की कहानी नहीं है. यह उस सोच से टकराने की कहानी भी है, जिसमें कुछ काम लड़कों के लिए और कुछ लड़कियों के लिए तय कर दिए जाते हैं. हेमली ने इस सोच को चुनौती दी. जिस ढोल को बजाने के लिए उन्हें कभी रोका गया, आज उसी ढोल की थाप के साथ वह दूसरी लड़कियों को आगे बढ़ने की राह दिखा रही हैं.

हेमली कुमारी वर्तमान में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, सिल्ली में बच्चों को निजी शिक्षिका के तौर पर पारंपरिक संगीत सिखा रही है, वह राष्ट्रीय स्तर झारखंड का प्रतिनिधित्व भी कर चुकी हैं. इसके अलावा वह वीमेंस कॉलेज राँची में संगीत की पढ़ाई भी कर रही हैं.
बताती हैं कि स्कूल के माध्यम से जब भी जिला, राज्य या दूसरे स्तर पर किसी कार्यक्रम में भाग लेने का अवसर मिलता, हेमली उसमें शामिल होती थीं. कला उत्सव के अलावा विद्यालय के अन्य आयोजनों में भी वह लगातार हिस्सा लेती रहीं. इस तरह अभ्यास और प्रस्तुतियों के बीच उनका हुनर निखरता गया. करीब 2012 से शुरू हुआ यह सफर अब लगभग 14 साल का हो चुका है.
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लड़कियों का ढोल बजाना अच्छी बात नहीं है, कौन शादी करेगा?
हेमली अपने ढोलक वादन पर परिवार की प्रतिक्रिया को याद करते हुए कहती हैं, “ मेरे पापा को पता चल गया, तो हमको रोक दिए थे. पढ़ाई-लिखाई करो और कुछ दूसरा नौकरी देखो. पुलिस देखो, डॉक्टर ही देखो, नर्स देखो. ये क्या लड़का जैसा ये सब बजा-ओजा के अपना टाइम वेस्ट करती है.”
एक सुदूर ग्रामीण और बेहद साधारण परिवार में जन्मी हेमली के लिए राह कभी आसान नहीं थी. जब उन्होंने बचपन में ढोल थामने की जिद की, तो सबसे पहले विरोध उनके घर से ही हुआ.
हेमली कुमारी कहती है “मेरे पापा तो माने नहीं थे इस चीज़ के लिए… लड़कियाँ ढोल बजाएंगी तो अच्छा थोड़ी होता है, समाज क्या बोलेगा, कौन शादी करेगा? समाज थूकेगा.”
घर में कमाने वाला कोई भाई नहीं, माता-पिता की खराब सेहत, और ऊपर से दो वक्त की रोटी के लाले—ऐसी टूटी-फूटी आर्थिक स्थिति में जहाँ लोग दो जून की रोटी के लिए जूझते हैं, वहाँ एक लड़की का ढोल लेकर निकलना लोगों की आँखों में खटकता था.
जब वह हॉस्टल में थीं, तब उनके घर की माली हालत इतनी खराब थी कि बाकी बच्चों की तरह उनके गार्जियन भी समय पर मिलने नहीं आ पाते थे. लेकिन दोस्तों के सहारे और खुद के चट्टानी हौसले पर उन्होंने पढ़ाई और संगीत दोनों को थामा.
अपने अंदाज में बताती है, “जब मैं स्टूडेंट थी, हर एक चीज का गार्जियन आ जाते थे, लेकिन मेरा गार्जियन नहीं आते थे. क्योंकि उस समय मेरे घर का स्थिति बहुत खराब रहता था सर. एक टूटा-फूटा हुआ सा घर था, जिसमें एक ही रूम को दो रूम बनाया गया था. और उसी में हम लोग सब फैमिली रहते थे.”
“मेरे दोस्त लोग ही मेरा हेल्प किए सर, सबसे ज्यादा.”
हेमली बताती है कि उन्होंने करीब सात-आठ साल की उम्र में ढोल बजाना शुरू किया था. बचपन में खेलते-खेलते थोड़ा-बहुत सीखती थीं. उस समय उन्हें यह भी नहीं पता था कि ढोल वादन में आगे क्या संभावनाएं हैं. उन्हें बस इसे बजाने में खुशी मिलती थी. यही शौक धीरे-धीरे उनकी पहचान बन गया.
जब समाज ने ताने कसे और फेसबुक पर उंगलियाँ उठीं
हेमली के मुताबिक, जब वह कस्तूरबा विद्यालय में ढोल वादन सीख रही थीं, तब इस काम में लड़कियों की संख्या बहुत कम थी. उस समय एक-दो लड़कियां ही ढोल बजाती थीं. वह बताती हैं कि कई बार अगर वह नहीं जाती थीं, तो ढोल की कक्षा ही नहीं होती थी. इस बात से उन्हें गर्व महसूस होता था कि वह एक ऐसी कला सीख रही हैं, जिसे आम तौर पर लड़कों से जोड़कर देखा जाता है.
लेकिन यही बात कई लोगों को खटकती भी थी. उन्हें सुनना पड़ता था कि पढ़-लिखकर ढोल लेकर यहां-वहां घूमने से क्या फायदा. लोगों का कहना था कि पढ़ाई के बाद लड़की को घर बसाना चाहिए, न कि कभी यहां तो कभी वहां जाकर ढोल बजाना चाहिए. हेमली के अनुभव में लड़का वही काम करे, तो उसे सामान्य माना जाता है, लेकिन लड़की के करने पर सवाल उठने लगते हैं.
हेमली ने वर्ष 2023 में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, सिल्ली से पढ़ाई पूरी की. इसके बाद विद्यालय की शिक्षिकाओं ने उन्हें निजी तौर पर संगीत शिक्षिका के रूप में काम करने का अवसर दिया. जिस विद्यालय में वह कभी खुद ढोल वादन सीखती थीं, वहीं अब दूसरी छात्राओं को प्रशिक्षण देने लगीं.
रास्ता काँटों भरा था. जब वह मंच पर उतरतीं या बच्चों को सिखातीं, तो लोगों की फब्तियाँ उनका पीछा करती थीं.
हेमली बताती है, “लोग कहते थे—लड़का जैसा इधर-उधर बजाती चलती है, कोई काम-धंधा है नहीं, पढ़-लिख के ये सब कर रही है, बेकार फालतू का… फेसबुक पर कमेंट आते थे कि सिखाना है तो पढ़ाई-लिखाई सिखाओ, ये नाचीनीगिरी नहीं सिखाओ.”
लेकिन हेमली ने इन तानों को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया. उन्होंने दो टूक शब्दों में साबित कर दिया कि—
“दुनिया कुछ भी बोले, कुछ भी करे, लेकिन जो मेरा टैलेंट है, अगर मुझे इस चीज़ में खुशी मिलती है, और इस चीज़ में कोई चीज़ हमको आगे जाने का एक मार्ग मिलता है, तो हम क्यों ना करें?”
उन्होंने साफ कर दिया कि दुनिया कुछ भी कहे, उन्हें अपनी कला पर पूरा भरोसा है. वीमेंस कॉलेज, रांची से संगीत की पढ़ाई करते हुए उन्होंने साबित कर दिया कि ढोल बजाने वाली लड़की पढ़ाई में भी अव्वल हो सकती है.
कस्तूरबा हॉस्टल के संघर्ष से राष्ट्रीय मंच तक
कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, सिल्ली में दाखिला उनके जीवन का टर्निंग Point बना. वहाँ दिलीप कुमार महतो और राज्य मानभूम छौनी कला केंद्र के अनुशासन ने उनके हुनर को माँजा.
अपनी मेहनत के दम पर उन्होंने कला उत्सव (NCERT) जैसी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सफलता का परचम लहराया. हेमली ने 2023 में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय से पढ़ाई पूरी की. इसके बाद उसी विद्यालय की संगीत शिक्षिका ( निजी तौर पर ) रुप में काम कर रही है. आज वह खुद एक गुरु की भूमिका में हैं—उनकी शिष्या लक्ष्मी कुमारी का राष्ट्रीय पुरस्कार जीतना और इस साल उनकी पाँच छात्राओं का महाराष्ट्र में कला उत्सव के लिए चयनित होना इस बात का प्रमाण है कि हेमली ने जो आग जलाई थी, वह अब मशाल बन चुकी है.
हेमली केवल ढोल बजाकर रुकने वाली नहीं हैं. वह जानती हैं कि आज का आधुनिकता का दौर हमारे शुद्ध कुड़माली और पंचपरगनिया लोकगीतों, ढोल, नगारा, मांदर और झूमर की पुरानी धुनें ख़त्म होती जा रहा है.
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अपने संस्कृति को लेकर हेमली चिंतित दिखाई पड़ती है बातों ही बातों में कहती है, “हमारा जो मेन झूमर है, मेन जो लोक गीत है, वो लुप्त होते जा रहा है… कल्चरल (संस्कृति) के बिना और कल्चरल की पहचान के बिना हम लोगों का कोई अस्तित्व नहीं है. कि हम कहाँ के हैं, कैसे हैं, कौन हैं.”
हेमली होने वाले कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अपना हुनर दिखाती है, और अपनी संस्कृति को इस तरह बचाने का प्रयास कर रही है. वह कहती है कि ये मंच कोई ऑर्केस्ट्रा प्रोग्राम नहीं है, बल्कि पूरी तरह से सांस्कृतिक मंच होते हैं.
सिर्फ मंचों पर प्रोग्राम करने तक ही नहीं, बल्कि ‘पंचपरगनिया ऑल आर्टिस्ट एसोसिएशन’ के बैनर तले उन्होंने झारखंड के बुजुर्ग और उपेक्षित कलाकारों के लिए 4,000 रुपये मासिक पेंशन की मांग को सरकार से मनवाने में बड़ी भूमिका निभाई है.
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चट्टान जैसी मजबूत इच्छाशक्ति
जून महीने में विकास नायक (रामगढ़) के साथ वैवाहिक जीवन में बंधने के बाद भी हेमली का सुर और ताल नहीं थमा है. आज भी जब वह ढोल की थाप देती हैं, तो वह सिर्फ एक संगीत नहीं होता, बल्कि उन तमाम रूढ़ियों को करारा जवाब होता है जो महिलाओं को चार दीवारों में कैद करना चाहती हैं.
हेमली ने अपने करियर के बारे में स्पष्ट कहा.
“इसी को बढ़ाना है सर, इसी को बढ़ाना है. अगर इसके पीछे हटने का रहता, तो आज हम म्यूजिक लेकर पढ़ते नहीं, और अभी तक समय देते नहीं.”
हेमली कुमारी इस बात की जिंदा मिसाल हैं कि अगर इरादे फौलादी हों, तो ना तो गरीबी रोक सकती है और ना ही समाज की संकीर्ण सोच. वह झारखंड की युवा पीढ़ी और खासकर बेटियों के लिए एक ऐसा नाम बन चुकी हैं, जो यह सिखाता है कि अपनी पहचान किसी से भीख में नहीं ली जाती, उसे अपने हुनर और पसीने से छीना जाता है.


