मुस्कान चौधरी
वो अपने घर के आंगन में खड़ी स्कूटी को बाहर निकालती है. सीट के पिछले हिस्से पर एक प्रोजेक्टर और पर्दा रखती है. डिक्की में पेन ड्राइव रखती है, जिसमें कुछ संताली सिनेमा होता है. संताली भाषी किसी गांव में पहुंचती है. वहां कुर्सी टेबल का इंतजाम करती है. टिकट काउंटर बनता है. कभी 20 रुपया तो कभी 100 रुपया तक टिकट का दाम रखती है. लोग टिकट लेते हैं. प्रोजेक्टर लगाती है और सिनेमा शुरू.
एक अभिनेत्री, निर्देशक, डिस्ट्रीब्यूटर सबके रोल में एक अकेली महिला. नाम है गंगा रानी थापा. नेपाल मूल की रहनेवाली, लेकिन काम संताली में.

कभी संथाली गायक सिमल टुडू के गाने सुनकर गायिका बनने का सपना देखने वाली गंगा रानी थापा ने शायद ही सोचा होगा कि एक दिन वह संथाली सिनेमा की पहचान बनेंगी. जतरा में मजाक-मजाक में भरा गया एक फॉर्म उन्हें अभिनय की दुनिया में ले आया.
ओपेरा से शुरू हुआ उनका सफर फिल्मों तक पहुंचा और फिर उन्होंने अपना प्रोडक्शन हाउस ‘गंगा फिल्म्स’ शुरू किया. लेकिन गंगा रानी की कहानी सिर्फ एक अभिनेत्री या फिल्म निर्माता की कहानी नहीं है. यह उस महिला की कहानी है, जो अपनी फिल्मों को दर्शकों तक पहुंचाने के लिए खुद स्कूटी पर प्रोजेक्टर, पर्दा और दूसरे जरूरी सामान लेकर गांव-गांव निकल पड़ती हैं.
संथाली सिनेमा में वर्ष 1993 से सक्रिय गंगा रानी थापा अब तक 50 से अधिक फिल्मों में काम कर चुकी हैं. अभिनय के साथ उन्होंने फिल्म निर्माण की जिम्मेदारी भी संभाली है. आज जब क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों को सिनेमाघरों में जगह मिलने और सीमित बजट में फिल्में बनाने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, तब गंगा रानी ने अपनी फिल्मों के प्रदर्शन के लिए एक अलग रास्ता चुना है. तलाक की समस्या पर आधारित उनकी फिल्म ‘सकम आलोम ओरेजा’ को दर्शकों तक पहुंचाने के लिए वह खुद गांवों में शो कर रही हैं.
गायिका बनने का सपना देखा, संयोग से अभिनय की दुनिया में पहुंचीं
गंगा रानी थापा का जन्म वर्ष 1970 में जमशेदपुर के आदित्यपुर स्थित एशियाना क्षेत्र में हुआ. उनके पिता सुखबहादुर थापा टिस्को (TISCO) में मजदूर के रूप में काम करते थे, जबकि उनकी मां का नाम शांति देवी है. उनके भाई रवि थापा और जुड़वां बहन जमुना थापा हैं. उन्होंने आदित्यपुर मिडिल स्कूल से आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की.
उनके परिवार में फिल्म या अभिनय की कोई तालुक नहीं था. इसके बावजूद बचपन से ही उनकी रुचि कला की दुनिया में थी. शुरुआत में वह गायिका बनना चाहती थीं. एक जत्रा के दौरान संथाली गायक सिमल टुडू के गाने सुनकर संगीत के प्रति उनका आकर्षण और बढ़ा. हालांकि, किस्मत उन्हें गायन के बजाय अभिनय की ओर ले गई.
गंगा रानी के अभिनय सफर की शुरुआत किसी बड़ी योजना के तहत नहीं हुई थी. जत्रा के दौरान उन्होंने मजाक-मजाक में एक फॉर्म भर दिया. और किस्किमत से उनका चयन भी हो गया. इस दौरान उन्होंने चार-पांच ओपेरा में काम किया. ये प्रस्तुतियां भले ही बहुत अधिक चर्चित नहीं हुईं, लेकिन इनके जरिए लोग उन्हें पहचानने लगे. यही पहचान आगे चलकर उनके फिल्मी सफर की राह बनी.
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ओपेरा में काम करने के बाद उन्होंने फिल्मों की दुनिया में कदम रखा. अपनी तीसरी फिल्म में वह अभिनेत्री बनीं. निर्देशक दशरथ हांसदा के साथ उनका जुड़ाव भी उनके शुरुआती फिल्मी सफर का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा. धीरे-धीरे अभिनय के साथ फिल्म निर्माण में उनकी दिलचस्पी बढ़ी और उन्होंने ‘गंगा फिल्म्स’ नाम से अपना प्रोडक्शन हाउस शुरू किया.
गंगा रानी का सफर इस बात की मिसाल है कि फिल्मी ताल्लुक नहीं होने के बावजूद लगन और सीखने की इच्छा के दम पर अपनी जगह बनाई जा सकती है. उन्होंने केवल फिल्मों में अभिनय ही नहीं किया, बल्कि अपनी कहानियों और फिल्मों को दर्शकों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी उठाई.
सिनेमाघर बंद हुए तो स्कूटी पर प्रोजेक्टर लेकर गांव-गांव निकल पड़ीं
फिल्म बनाना जितना मुश्किल है, उसे दर्शकों तक पहुंचाना भी उतनी ही बड़ी चुनौती है. खासकर संथाली जैसी क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों के लिए, जहां सिनेमाघरों में नियमित प्रदर्शन के अवसर सीमित हैं. गंगा रानी थापा ने इस समस्या को करीब से महसूस किया. फिल्म निर्माण में पैसा लगाने के बाद उसकी लागत निकालना भी जरूरी था. ऐसे में उन्होंने अपनी फिल्मों के प्रदर्शन के लिए गांवों का रुख किया.
वह बताती हैं कि पहले फिल्में सिनेमाघरों में दिखाई जाती थीं. लेकिन जब हॉल बंद होने लगे, तो फिल्मों को दर्शकों तक पहुंचाने के विकल्प कम होते गए. इसके बाद उन्होंने गांवों में टेंट लगाकर फिल्म दिखाने का तरीका अपनाया. शुरुआत में वह किराये पर प्रोजेक्टर लेती थीं. उस समय उनके पास अपना प्रोजेक्टर और लैपटॉप भी नहीं था. बाद में उन्होंने अपने संसाधन जुटाए और स्कूटी पर प्रोजेक्टर, पर्दा तथा दूसरे जरूरी सामान लेकर गांव-गांव जाना शुरू किया.
उनके लिए यह सिर्फ फिल्म दिखाने का तरीका नहीं, बल्कि अपनी बनाई फिल्म से कमाई करने और उसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने का जरिया भी है. मेले, गांव और खुले मैदान उनके लिए प्रदर्शन के नए ठिकाने बन गए. जरूरत के मुताबिक अलग-अलग प्रोजेक्टर के जरिए 100 रुपये प्रति टिकट के हिसाब से एक ही दिन में दो जगह शो करने की व्यवस्था भी की जा सकती है.
गंगा रानी की यह पहल संथाली सिनेमा की उस जमीनी हकीकत को सामने लाती है, जहां कलाकारों को फिल्म बनाने के बाद उसके प्रदर्शन के लिए भी खुद मेहनत करनी पड़ती है. जब बड़े पर्दे तक पहुंच आसान नहीं होती, तब वह खुद पर्दा लगाकर दर्शकों को अपनी फिल्म दिखाती हैं.
इस तरीके से उन्होंने सबसे पहली फिल्म ‘सकम आलोम ओरेजा’ को प्रमोट किया. यह फिल्म तलाक की समस्या पर आधारित है. फिल्म को दर्शकों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने खुद प्रदर्शन की व्यवस्था की. उनके अनुसार, टेंट लगाकर फिल्म दिखाने पर टिकट की कीमत 100 रुपये रखी जाती है. वहीं, कम्युनिटी हॉल या मैदान में शो होने पर टिकट 50 से 80 रुपये तक का होता है. उनके मुताबिक, हर शो में औसतन करीब 250 दर्शक पहुंचते हैं.
इस तरह फिल्म का प्रदर्शन उनके लिए केवल मनोरंजन का आयोजन नहीं, बल्कि अपनी बनाई फिल्म की लागत निकालने का एक प्रयास भी है. गंगा रानी का यह तरीका बताता है कि छोटे बजट (10-12लाख) की क्षेत्रीय फिल्मों के लिए दर्शकों तक पहुंचने के रास्ते अक्सर फिल्म निर्माताओं को खुद तलाशने पड़ते हैं.
उनकी कोशिश अपनी फिल्म को केवल डिजिटल मंच या सिनेमाघर तक सीमित रखने के बजाय सीधे उन लोगों तक ले जाने की है, जिनकी भाषा और जीवन से संथाली सिनेमा जुड़ा हुआ है.
गंगा रानी थापा कहती है- मैं एक्टिंग करती हूँ ये सबको पता है लेकिन मैं लिखती भी हूँ ये किसको भी नहीं पता है
कम बजट और सीमित संसाधनों में बन रही हैं संथाली फिल्में
संथाली सिनेमा की चुनौतियां केवल फिल्म प्रदर्शन तक सीमित नहीं हैं. फिल्म बनाने के लिए बजट जुटाना, सेंसर की प्रक्रिया पूरी करना, प्रचार करना और सिनेमाघरों में जगह हासिल करना भी बड़ी समस्याएं हैं.उनका कहना है कि सरकार आर्थिक सहायता दे और ऐसे नियम बनाए, जिनसे राज्य के सिनेमा हॉल में कम से कम एक दिन स्थानीय भाषा की फिल्मों को दिखाने की व्यवस्था हो सके.
सीमित बजट के बावजूद हर साल संथाली भाषा में पांच से सात फिल्में बन रही हैं. यूट्यूब पर रिलीज हुई फिल्मों को भी दर्शकों का अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, चार महीने पहले रिलीज हुई संथाली फिल्म ‘भेगार आजार’ को 22 लाख से अधिक व्यूज मिले, जबकि ‘जनम आयोवा रिन’ को आठ लाख से ज्यादा बार देखा गया.
ये आंकड़े बताते हैं कि संथाली फिल्मों के दर्शक मौजूद हैं. जरूरत ऐसे अवसरों और व्यवस्थाओं की है, जिनसे इन फिल्मों को नियमित रूप से दर्शकों तक पहुंचाया जा सके और फिल्म निर्माताओं को अपनी मेहनत का उचित प्रतिफल मिल सके.
राज्य में पहले भी फिल्म पॉलिसी बनाई गई थी, लेकिन क्षेत्रीय भाषा के फिल्म निर्माताओं की शिकायत रही है कि उन्हें अपेक्षित आर्थिक सहायता और अवसर नहीं मिल पाए. संथाली सिनेमा से जुड़े लोगों की मांग है कि स्थानीय भाषाओं की फिल्मों के लिए ठोस व्यवस्था बने, ताकि उन्हें केवल फिल्म बनाने तक सीमित न रहना पड़े और प्रदर्शन के लिए भी पर्याप्त मंच मिल सके.
गंगा रानी थापा का गांव-गांव जाकर फिल्म दिखाना इसी जुझारू प्रयास का एक उदाहरण है. जहां संसाधनों की कमी रास्ता रोकती है, वहां वह खुद नया रास्ता बनाती हैं.
‘गलवान वीर’ में मां का किरदार निभाते हुए भावुक हो गई थीं गंगा रानी
गंगा रानी थापा ने अपने लंबे फिल्मी सफर में कई भूमिकाएं निभाई हैं, लेकिन ‘गलवान वीर’ में गणेश हांसदा की मां का किरदार उनके लिए खास रहा. इस भूमिका को बेहतर ढंग से निभाने के लिए उन्होंने गणेश हांसदा के परिवार से जुड़ी खबरें और इंटरव्यू देखे, ताकि किरदार की भावनाओं को समझ सकें.
फिल्म की शूटिंग के दौरान ताबूत वाले दृश्य ने उन्हें भीतर तक भावुक कर दिया. उन्होंने बताया कि उस दृश्य में गणेश हांसदा(मृत) के बड़े भाई दिनेश हांसदा ताबूत में लेटे हुए थे. उस पल उनके मन में कई भाव उमड़ आए और फिल्म का दृश्य उनके लिए केवल अभिनय तक सीमित नहीं रहा.
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फिल्म से जुड़े लोगों के साथ उनका रिश्ता भी धीरे-धीरे परिवार जैसा हो गया. गंगा रानी बताती हैं कि गणेश हांसदा के जन्मदिन पर उनके परिवार ने उन्हें शॉल ओढ़ाकर मां के रूप में सम्मान दिया. इसके बाद उनके बीच आत्मीयता और गहरी होती गई. सुख-दुख और पारिवारिक अवसरों पर एक-दूसरे के साथ खड़े रहने का रिश्ता बन गया.
यह अनुभव उनके लिए इस बात का उदाहरण है कि सिनेमा केवल पर्दे पर कहानी कहने का माध्यम नहीं है. कई बार फिल्म से जुड़े लोग वास्तविक जीवन में भी एक-दूसरे के परिवार का हिस्सा बन जाते हैं.
जब उनसे पूछा गया की संथाली सिनेमा में क्या बदलना चाहेंगी, इस सवाल पर उन्होंने बेहतर कहानियों की जरूरत पर जोर दिया. वह चाहती है की अच्छी स्टोरीज पर संथाली फिल्रामें बने. राजनीति और सामाजिक घटनाओं में रूचि रखने वाली गंगा थापा चुनाव से जुड़ी खबरें देखती हैं और सोचती हैं कि यदि उन्हें फैसले लेने का अवसर मिले, तो वह कई बदलाव करना चाहेंगी.


