नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा शक्ति, साहस और बुराई पर जीत के प्रतीक के रूप में की जाती है. लेकिन कुछ महिलाएं ऐसी भी होती हैं, जो दूसरों को मुश्किलों से निकालने के लिए खुद खतरे का सामना करती हैं. झारखंड की महिमा सिंह की कहानी भी ऐसी ही है. लड़कियों की तस्करी और शोषण से जुड़े नेटवर्क का सच सामने लाने के लिए महिमा पांच दिनों तक अपनी पहचान छिपाकर उसके भीतर रहीं. इस दौरान उन्होंने जिन हालात का सामना किया, वे किसी के भी रोंगटे खड़े कर सकते हैं. महिमा के मुताबिक, उन्हें तीन बार अलग-अलग जगहों पर बेचे जाने जैसी स्थिति का सामना करना पड़ा. उन्होंने नाबालिग लड़कियों, उन्हें कथित तौर पर दिए जाने वाले हार्मोनल इंजेक्शन, ग्राहकों तक पहुंचाई जाने वाली तस्वीरों और प्रभावशाली लोगों के नाम सामने आने जैसे सच भी बताए.
महिमा का दावा है कि उनकी रिपोर्ट के बाद हुई कार्रवाई में करीब 400 से 500 लड़कियों को बचाया गया, जिनमें 300 से ज्यादा नाबालिग थीं. उनके मुताबिक, कुछ लड़कियों को गैर-सरकारी संगठनों की मदद से आश्रय और पढ़ाई का मौका भी मिला. महिमा के लिए यह सिर्फ एक खबर नहीं थी, बल्कि उन लड़कियों की जिंदगी से जुड़ा मामला था, जिनकी आवाज अक्सर समाज तक नहीं पहुंच पाती. अपनी सुरक्षा की चिंता के बावजूद उन्होंने उन तक पहुंचने और उनकी परिस्थितियों को सामने लाने का फैसला किया. इस नवरात्र में उनकी कहानी मां दुर्गा की शक्ति और साहस की याद दिलाती है. ‘जोहार शक्ति’ की चौथी कड़ी में पढ़िए उस पत्रकार की कहानी, जिसने दूसरों की जिंदगी में बदलाव लाने के लिए खुद को जोखिम में डाला.
रामगढ़ के गांव से पत्रकारिता तक का सफर
महिमा सिंह झारखंड के रामगढ़ जिले के डुमरी प्रखंड के कोरचे गांव की रहने वाली हैं. उनका जन्म 24 नवंबर 2002 को हुआ. उनकी दसवीं तक की पढ़ाई सरस्वती विद्या मंदिर में हुई. इसके बाद उन्होंने रामगढ़ में हॉस्टल में रहकर 11वीं और 12वीं की पढ़ाई पूरी की. आगे की पढ़ाई के लिए वह रांची आईं. यहां डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय से 2020 से 2023 के बीच बैचलर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (BJMC) किया. इसके बाद 2023 से 2025 तक रांची विश्वविद्यालय से मास्टर की पढ़ाई पूरी की.
महिमा ने बताया कि पत्रकारिता में आने का फैसला अचानक लिया गया था. शुरू से उनके मन में कुछ अलग करने और अपनी पहचान बनाने की इच्छा थी. गांव में रहते हुए वह मेकअप आर्टिस्ट, मॉडलिंग और फैशन डिजाइनिंग जैसे क्षेत्रों के बारे में भी सोचती थीं. लेकिन परिवार को लगता था कि इन क्षेत्रों में जाने पर समाज क्या कहेगा. परिवार में पहले किसी लड़की ने इस तरह का रास्ता नहीं चुना था. मॉडलिंग और फिल्मी दुनिया में महिलाओं के संघर्ष को लेकर एक फिल्म देखने के बाद महिमा ने उस दिशा में जाने का विचार भी छोड़ दिया.
कोविड के दौरान वह गांव में थीं. उस समय टीवी पर समाचार और एंकरिंग देखकर उन्हें पत्रकारिता में दिलचस्पी हुई. उन्हें लगा कि जब लोग घरों में बैठे हैं, तब भी पत्रकार अपना काम कर रहे हैं और लोगों तक जरूरी जानकारी पहुंचा रहे हैं. दसवीं में कुछ शिक्षकों ने भी उनसे कहा था कि वह एंकर या रिपोर्टर बन सकती हैं. लेकिन महिमा को खुद पर भरोसा नहीं था. स्कूल में वह मंच पर दो मिनट बोलने से भी घबराती थीं.
परिवार चाहता था कि वह अंग्रेजी या गणित में ऑनर्स करें और सरकारी नौकरी की तैयारी करें. महिमा का मन इसमें नहीं था. उन्होंने पत्रकारिता को चुना, हालांकि उनके पिता को इस फैसले पर चिंता थी. महिमा के मुताबिक, उनके पिता बेटी और बेटे में फर्क नहीं करते थे, लेकिन उन्हें समाज की बातों का डर रहता था. वह नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी को कोई गलत नजर से देखे या उसके बारे में कोई टिप्पणी करे.
महिमा ने बताया कि गांव और संयुक्त परिवार के माहौल में उन्हें कई बार ताने सुनने पड़ते थे. सोशल मीडिया पर सामान्य तस्वीर डालने पर भी पिता डांट देते थे और कई बार पोस्ट हटवा देते थे. वह लोगों के व्यवहार से भावुक हो जाती थीं, लेकिन अपनी तकलीफ खुलकर बता नहीं पाती थीं. उनके भीतर यह इच्छा थी कि वह ऐसा कुछ करें, जिससे किसी दूसरे को वैसी परेशानी न झेलनी पड़े, जैसी उन्होंने खुद महसूस की थी.
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इंटर्नशिप में पीरियड्स पर वीडियो बनाया, आलोचना से रो पड़ी थीं
महिमा की पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर काम करने की इच्छा साफ दिखाई देने लगी थी. रांची में तीन महीने की इंटर्नशिप के दौरान उन्होंने मासिक धर्म और उससे जुड़ी स्वच्छता पर अपना पहला वीडियो बनाया. उन्होंने इस विषय पर स्क्रिप्ट तैयार की और आंकड़ों के साथ यह बताने की कोशिश की कि कई लड़कियां पैड के बजाय कपड़े इस्तेमाल करती हैं और स्वच्छता से जुड़ी समस्याओं का सामना करती हैं.
महिमा ने बताया कि वीडियो की प्रस्तुति को लेकर उन्हें आलोचना सुननी पड़ी. उनसे कहा गया कि उन्हें अभी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है और बोलने के तरीके में सुधार करना होगा. इस प्रतिक्रिया से वह इतनी आहत हुईं कि घर जाकर रोईं. उन्हें लगा था कि अगर उनके काम में कमी है, तो उसे समझाया जाएगा, ताकि वह बेहतर कर सकें. उन्होंने यह भी बताया कि वीडियो प्रकाशित होने के बाद जब उन्होंने प्रतिक्रिया पूछी, तो उन्हें कहा गया कि अगर वीडियो पहले देखा गया होता, तो शायद उसे प्रकाशित नहीं किया जाता.
इस अनुभव के पीछे उनकी अपनी जिंदगी का एक दर्दनाक पल भी था. महिमा ने बताया कि स्कूल में पहली बार मासिक धर्म के दौरान उनकी स्कर्ट पर दाग लग गया था. स्कूल से निकलते समय पीछे से दूसरे बच्चे उन्हें देखकर हंसने लगे, लेकिन किसी ने उनकी मदद नहीं की. वह घर जाकर रोईं, मगर अपनी तकलीफ खुलकर बता नहीं पाईं. स्कूल में पढ़ाई और दूसरी बातों को लेकर भी उनका मजाक उड़ाया जाता था.
महिमा के मुताबिक, ऐसे अनुभव उनके मन में जमा होते गए. उन्हें लगता था कि लड़कियों के साथ अक्सर ऐसा व्यवहार होता है, जिससे वे मानसिक रूप से टूट जाती हैं. कई लड़कियां डिप्रेशन में चली जाती हैं और कुछ आत्महत्या तक कर लेती हैं. महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर काम करने की इच्छा इन्हीं अनुभवों से मजबूत हुई. हालांकि, वीडियो पर मिली आलोचना के बाद कुछ समय तक उन्हें लगा कि वह पत्रकारिता में खुलकर बोल भी पाएंगी या नहीं.
प्रभात खबर के बाद पटना पहुंचीं, फिर मिला बड़ा मौका
महिमा की पहली आधिकारिक नौकरी प्रभात खबर में लगी. उन्होंने वहां करीब दो साल तक डिजिटल वीडियो एंकर और रिपोर्टर के तौर पर काम किया. लेकिन कुछ समय बाद उन्हें लगने लगा कि वह सिर्फ एंकरिंग तक सीमित नहीं रहना चाहतीं. लोगों की नजर में उनकी लंबाई और सुंदरता के कारण उन्हें एंकर बनने की सलाह दी जाती थी, लेकिन महिमा का मानना था कि पत्रकारिता का मतलब सिर्फ कैमरे के सामने अच्छा दिखना नहीं है. वह ग्राउंड पर जाकर काम करना और लोगों की मदद करना चाहती थीं.
प्रभात खबर छोड़ने के बाद उन्होंने दूरदर्शन के लिए फ्रीलांस काम किया. फिर चुनाव के दौरान पटना में लाइव सिटीज से जुड़ीं. महिमा ने बताया कि वहां काम करते हुए उन्हें खबरों पर पैसे और विज्ञापन के प्रभाव का अनुभव हुआ. उन्हें लगता था कि खबर की अहमियत से ज्यादा यह देखा जा रहा है कि कौन पैसे दे रहा है और किसकी खबर को ज्यादा जगह मिलनी चाहिए. इस माहौल से असहज होकर उन्होंने कुछ महीनों में वहां से भी काम छोड़ दिया.
इसके बाद उनकी बातचीत दैनिक भास्कर के मनीष मिश्रा से हुई. महिमा के मुताबिक, मनीष मिश्रा बिहार और झारखंड में खोजी पत्रकारिता से जुड़े काम का नेतृत्व कर रहे थे. उन्होंने महिमा को ‘ऑपरेशन रेड लाइट’ के बारे में बताया. इस ऑपरेशन के लिए ऐसी महिला की जरूरत थी, जो अपनी
पहचान छिपाकर कथित तस्करी और शोषण के नेटवर्क के भीतर जा सके.
महिमा ने बताया कि उन्होंने बिना ज्यादा सोचे इस काम के लिए हामी भर दी. भास्कर में इंटरव्यू के दौरान भी उन्होंने कहा था कि उन्हें एसआईटी और खोजी पत्रकारिता में काम करना है. उन्हें बताया गया कि पूरे देश में एसआईटी की टीमों में किसी महिला का इस तरह काम करना असामान्य था और बिहार में वह इस टीम से जुड़ने वाली पहली महिला थीं. टीम ने कई बार उनसे बातचीत की, ऑपरेशन की योजना समझाई और उन जगहों के बारे में जानकारी जुटाई, जहां उन्हें जाना था.
महिमा के मुताबिक, ऑर्केस्ट्रा का सीजन शुरू होने पर बाहर से लड़कियां लाई जाती थीं. टीम ने इसी समय के हिसाब से योजना बनाई. उनके साथ टीम के दो सदस्य थे. उनमें से एक ने कथित ब्रोकर की भूमिका निभाई और महिमा को वहां तक पहुंचाया. उन्होंने अपनी पहचान बदलकर खुद को फरीदाबाद की डांसर बताया. यह भी बताया कि वह पहले बंगाल और झारखंड में काम कर चुकी हैं.
पांच दिन तक नेटवर्क के भीतर रहीं, तीन बार बेचा गया
ऑपरेशन के तहत महिमा पांच दिनों तक ऑर्केस्ट्रा और रेड लाइट नेटवर्क से जुड़े माहौल में रहीं. उनके मुताबिक, इस दौरान उन्हें तीन बार अलग-अलग जगहों पर बेचे जाने जैसी स्थिति का सामना करना पड़ा. उनके लिए यह बेहद डरावना अनुभव था. उन्हें हर समय अपनी असली पहचान छिपानी थी और यह ध्यान रखना था कि उनके व्यवहार से किसी को शक न हो.
महिमा ने बताया कि वहां रहने की परिस्थितियां बेहद खराब थीं. टिन के शेड में रहना पड़ता था, बिस्तर पर फटी चादरें थीं और शौचालय की हालत इतनी खराब थी कि उसका इस्तेमाल करना भी मुश्किल लगता था. न ठीक से नहाने की सुविधा थी और न साफ-सफाई का उचित इंतजाम. गर्मी और बदबू के बीच रहना पड़ता था. उन्होंने बताया कि कई बार शौचालय जाने से बचने के लिए वह पानी और खाना तक कम कर देती थीं.
महिमा के मुताबिक, उन्हें झाड़ू-पोछा करने और वाशरूम तक साफ करने के लिए कहा गया. उन्होंने बताया कि अपने घर में उन्होंने कभी वाशरूम साफ नहीं किया था, लेकिन वहां उन्हें यह काम भी करना पड़ा. खाने की जगह पर गंदगी रहती थी. उनके मुताबिक, लोग जहां खाना खाते थे, वहीं थूक देते थे और भोजन से बहुत तेज बदबू आती थी. बाहर निकलने के बाद भी कुछ समय तक उनका खाने का मन नहीं हुआ.
वहां की दिनचर्या भी अलग थी. महिमा ने बताया कि कई लड़कियां दोपहर तीन-चार बजे सोकर उठती थीं और रात दो-तीन बजे तक लड़कों के साथ बातचीत चलती रहती थी. पुरुषों की आवाजाही बनी रहती थी. महिमा को लगातार इस बात का ध्यान रखना पड़ता था कि वह बाकी लड़कियों जैसी दिखें और किसी को उन पर शक न हो.

लड़कियों की तस्वीरें ग्राहकों तक पहुंचाई जाती थी
महिमा ने आरोप लगाया कि नेटवर्क में नई लड़कियों की तस्वीरें ग्राहकों तक भेजी जाती थीं. उनके मुताबिक, वहां मौजूद लड़कियों को दूसरों के सामने पेश किया जाता था और कई बार वीडियो कॉल पर भी दिखाया जाता था. एक लड़की उन्हें अपनी दोस्त बताकर वीडियो कॉल पर दिखाती थी. महिमा को ऐसे समय डर लगता था कि कहीं उनकी पहचान या भूमिका को लेकर किसी को शक न हो जाए.
उन्होंने दावा किया कि इस पूरे नेटवर्क में प्रभावशाली लोगों के शामिल होने की बातें भी सामने आईं. महिमा के मुताबिक, पुलिसकर्मियों, नेताओं और डॉक्टरों जैसे लोगों के नामों का जिक्र हुआ था. उन्होंने सलीम नाम के एक व्यक्ति का भी जिक्र किया. महिमा के अनुसार, उस व्यक्ति ने उनके पास पिस्तौल रखकर डराने की कोशिश की और बिरयानी खाने के लिए 500 रुपये देने की बात कही.
महिमा ने बताया कि वहां कई बार पुरुष उनकी सुंदरता पर टिप्पणी करते और उन्हें अपने साथ कहीं चलने के लिए कहते थे. सामान्य परिस्थितियों में वह ऐसे व्यवहार का विरोध करतीं, लेकिन वहां ऐसा करना उनके लिए जोखिम भरा था. अगर वह गुस्सा दिखातीं या किसी को डांट देतीं, तो लोगों को शक हो सकता था. इसलिए उन्हें धैर्य रखना पड़ता था और अपनी भूमिका निभानी पड़ती थी.
उन्होंने बताया कि कई लड़कियां उनसे पूछती थीं कि वह इतनी सुंदर हैं, फिर इस काम में कैसे आ गईं. महिमा ने अपनी कहानी बनाकर उन्हें बताया कि घर से निकाले जाने के बाद मजबूरी में उन्हें यह काम करना पड़ रहा है और वह अभी इसे सीख रही हैं. इस तरह वह अपने बारे में सवालों के जवाब देती थीं, ताकि किसी को उनकी असली पहचान पर शक न हो.
पीरियड्स और पेट दर्द का बहाना बनाकर टालती रहीं
महिमा के मुताबिक, कई बार उनसे डांस करने या किसी व्यक्ति के सामने जाने की अपेक्षा की जाती थी. ऐसी स्थितियों से बचने के लिए वह मासिक धर्म के दर्द या पेट दर्द का बहाना बनाती थीं. कभी कहतीं कि अभी तबीयत ठीक नहीं है, कभी हंसकर बात टाल देतीं. उन्हें सीधे विरोध करने के बजाय ऐसी वजह बतानी पड़ती थी, जिससे सामने वाले को शक न हो.
वह दूसरी लड़कियों के साथ बैठतीं, उनसे बातचीत करतीं, खाना बनाने में शामिल होतीं और मोबाइल पर रील देखतीं. कुछ लड़कियां रजनीगंधा खाती थीं या दूसरे नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करती थीं. महिमा ने बताया कि जब उनसे भी खाने या पीने के लिए कहा जाता, तो वह मना करने के बजाय चीज हाथ में ले लेतीं और बाद में उसे फेंक देतीं या कहीं रख देतीं. उन्हें डर था कि अगर वह बाकी लड़कियों से अलग व्यवहार करेंगी, तो उनकी पहचान खुल सकती है.
महिमा ने बताया कि वहां की कुछ लड़कियां कहती थीं कि नशा किए बिना उनके लिए डांस करना या दूसरे हालात का सामना करना मुश्किल होता है. उनके मुताबिक, कुछ लड़कियों को रोज शराब पीकर डांस करना पड़ता था और ग्राहकों के साथ सोने जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था. महिमा को यह सोचकर तकलीफ होती थी कि वे किस मजबूरी में ऐसा जीवन जी रही हैं.
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15 से 17 साल की लड़कियों और हार्मोनल इंजेक्शन देकर बनाई जाती है बड़ी
महिमा ने बताया कि उन्होंने वहां 15 से 17 साल की उम्र की लड़कियों को भी देखा. उनके मुताबिक, कुछ लड़कियों को उम्र से बड़ा दिखाने या उनके शरीर में बदलाव लाने के लिए हार्मोनल इंजेक्शन दिए जाने की बात सामने आई. उन्होंने इस मामले को बेहद गंभीर बताया.
महिमा ने एक लड़की की कहानी भी साझा की. उनके मुताबिक, उस लड़की को बचपन में श्मशान घाट में छोड़ दिया गया था. बाद में एक मुस्लिम परिवार ने उसे पाला. आगे चलकर एक लड़का शादी का वादा करके उसे बिहार ले आया और फिर कथित तौर पर बेच दिया. महिमा ने बताया कि उस लड़की की कहानी सुनकर उन्हें बहुत तकलीफ हुई. उन्हें लगा कि अपनी जिंदगी की मुश्किलों के बारे में वह जितना सोचती थीं, उन लड़कियों ने उससे कहीं ज्यादा दर्द झेला था.
उनके मुताबिक, वहां मौजूद कुछ लड़कियां मजबूरी में उस माहौल में रह रही थीं. उन्हें डर था कि अगर वे विरोध करेंगी या वहां से निकलने की कोशिश करेंगी, तो उनके सामने और मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं. महिमा ने कहा कि कई लड़कियों की जिंदगी में परिवार, शादी और बेहतर भविष्य के वादों का इस्तेमाल करके उन्हें ऐसी जगहों तक पहुंचाया गया, जहां से निकलना आसान नहीं था.
मोबाइल में वीडियो बनाते पकड़ी गईं, बढ़ गई निगरानी
ऑपरेशन के दौरान महिमा मोबाइल से वीडियो रिकॉर्ड कर रही थीं. उनके मुताबिक, कुछ लोगों को इस पर शक हो गया. उन्होंने बताया कि उनके कुछ वीडियो डिलीट कर दिए गए और उन पर निगरानी बढ़ा दी गई. अब उनके लिए वहां रुकना और ज्यादा जोखिम भरा हो गया था.
महिमा ने बताया कि उन्होंने व्हाट्सऐप के जरिए अपनी टीम को जानकारी दी. टीम का एक सदस्य बाइक लेकर पास में इंतजार कर रहा था. जब आसपास के लोग दूसरी गतिविधियों में व्यस्त हुए, तो महिमा वहां से निकलकर दौड़ती हुई बाइक तक पहुंचीं. इस तरह वह उस जगह से बाहर निकल सकीं.
महिमा के मुताबिक, उन्हें डर था कि अगर उनकी पहचान पूरी तरह उजागर हो गई, तो उन्हें गंभीर नुकसान पहुंचाया जा सकता है. उन्होंने बताया कि बाद में उन्हें धमकियां भी मिलीं. उनके मुताबिक, उन्हें ‘दूसरी निर्भया बना देंगे’ जैसी धमकी दी गई. जान से मारकर कहीं फेंक देने की धमकी मिलने की बात भी उन्होंने कही. इसके बावजूद उन्होंने अपना अनुभव साझा किया.
रिपोर्ट के बाद कार्रवाई, 400-500 लड़कियों को नर्क से निकाला गया
महिमा के मुताबिक, रिपोर्ट सामने आने के बाद बिहार पुलिस ने छापेमारी की और कार्रवाई हुई. उन्होंने अनुमान जताया कि इस कार्रवाई के बाद करीब 400 से 500 लड़कियों को बचाया गया, जिनमें 300 से अधिक नाबालिग थीं. महिमा ने बताया कि कुछ लड़कियों को गैर-सरकारी संगठनों की मदद से आश्रय और शिक्षा उपलब्ध कराने की कोशिश की गई. उनके मुताबिक, दिल्ली के एक एनजीओ ने भी इस दिशा में भारत सरकार को प्रस्ताव दिया था.
महिमा के लिए इस रिपोर्टिंग का महत्व सिर्फ खबर प्रकाशित होने तक सीमित नहीं था. वह चाहती थीं कि जिन लड़कियों को उस माहौल से बाहर निकलने का मौका मिला, उन्हें आगे सुरक्षित जिंदगी जीने का अवसर भी मिले. उनके मुताबिक, अगर कोई लड़की एनजीओ में रहकर पढ़ाई कर पाती है या कम से कम उस माहौल से छुटकारा पा जाती है, तो यह उसके जीवन में बड़ा बदलाव है.
महिमा ने कहा कि उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यही होगी कि उनकी कोशिश से एक लड़की की भी मदद हो जाए. वह चाहती थीं कि लड़कियों को केवल वहां से निकालना ही पर्याप्त न माना जाए, बल्कि उन्हें सुरक्षित रहने, पढ़ने और अपने भविष्य के फैसले खुद लेने का मौका भी मिले.

बाहर निकलने के बाद दो-तीन दिन तक सोती रहीं
महिमा ने बताया कि वहां से बाहर निकलने के बाद उनके मन में लगातार उन लड़कियों की कहानियां घूमती रहती थीं. उन्होंने कई लड़कियों को रोते देखा था और उनकी जिंदगी की तकलीफें सुनी थीं. वह एक-दो दिन तक बहुत रोईं. बाहर आने के बाद सबसे पहले उन्होंने अच्छी तरह नहाया, क्योंकि पांच दिनों तक गर्मी और गंदगी के बीच रहने के कारण उन्हें ठीक से नहाने का मौका नहीं मिला था.
इसके बाद उन्होंने अपना फोन बंद कर दिया और दो-तीन दिन तक लगातार सोती रहीं. उनके चेहरे, हाथ और पैरों पर मच्छरों के काटने के निशान थे और सिर में दर्द बना हुआ था. लेकिन शारीरिक थकान के साथ उनके मन में उन लड़कियों की जिंदगी को लेकर भी कई सवाल थे.
महिमा ने बताया कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि उनकी रिपोर्ट को देशभर से इतना समर्थन मिलेगा. बिहार और झारखंड के अलावा दूसरे राज्यों से भी लोगों ने फोन और संदेश भेजे. लोगों की प्रतिक्रियाओं से उन्हें लगा कि समाज में ऐसे मुद्दों को समझने और उनकी अहमियत पहचानने वाले लोग भी हैं.
परिवार को थी सुरक्षा की चिंता, अब पिता को गर्व
महिमा के इस काम से उनका परिवार शुरुआत में बेहद चिंतित था. उनके मुताबिक, उनके पिता करीब चार-पांच दिनों तक उनसे बात नहीं कर पाए. भाई नितेश ने भी लगभग दो महीने तक बातचीत नहीं की. कुछ रिश्तेदारों ने दो-तीन महीने तक उनसे बात नहीं की. परिवार को डर था कि इस तरह की रिपोर्टिंग के कारण उनकी जान को खतरा हो सकता है. परिजनों ने उनसे वीडियो हटाने तक को कहा.
महिमा ने बताया कि उनके पिता को पहले पत्रकारिता के क्षेत्र में जाने पर ही चिंता थी. उन्हें लगता था कि इस पेशे में बेटी को समाज की आलोचना का सामना करना पड़ेगा और शादी के लिए भी मुश्किल हो सकती है. कई बार पिता ने उनसे कहा था कि कैमरा लेकर घूमने के बजाय कोई ऐसी नौकरी करें, जिसे समाज में बेहतर माना जाता है.
लेकिन जब रिपोर्ट सामने आई और लोगों ने महिमा के काम की सराहना की, तो धीरे-धीरे परिवार का नजरिया बदला. महिमा के मुताबिक, उनकी टीम ने भी परिवार को भरोसा दिलाया कि उनकी सुरक्षा का ध्यान रखा जा रहा है. अब उनके पिता को उन पर गर्व है. वह खुद कहते हैं कि उन्होंने पहले इस काम का विरोध किया था, लेकिन महिमा ने अपने काम से उन्हें गलत साबित किया.
महिमा के लिए यह बदलाव भी महत्वपूर्ण था. जिस फैसले को लेकर परिवार सबसे ज्यादा चिंतित था, उसी काम ने उन्हें अपनी बेटी की क्षमता और हिम्मत को नए नजरिये से देखने का मौका दिया.
एक लड़की की भी मदद हो जाए, तो सबसे बड़ी उपलब्धि
महिमा कहती हैं कि उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह होगी कि उनकी रिपोर्टिंग से किसी एक लड़की की जिंदगी में भी बदलाव आए. अगर कोई लड़की शोषण से बाहर निकल सके, उसे पढ़ने का मौका मिले या वह सुरक्षित जगह पर रहकर नई जिंदगी शुरू कर सके, तो यही उनके काम का असली मकसद है.
नवरात्र में मां दुर्गा की शक्ति को याद करने का अर्थ केवल पूजा तक सीमित नहीं है. अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना, दूसरों के दर्द को समझना और मुश्किल परिस्थितियों में मदद के लिए आगे आना भी साहस का रूप है. महिमा सिंह ने अपनी पत्रकारिता के जरिए इसी दिशा में कदम बढ़ाने की कोशिश की. उन्होंने अपनी पहचान छिपाकर उन लड़कियों की दुनिया को करीब से देखा, जिनकी जिंदगी के बारे में बाहर बैठे लोग अक्सर सिर्फ अनुमान लगाते हैं.
प्रस्तुति : विजय उराँव
(यह पूरी स्टोरी पत्रकार महिमा सिंह और जोहार लाइव के संवाददाता विजय उराँव के बीच हुई बातचीत पर आधारित है.)
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