मुस्कान चौधरी
साल 2013. झारखंड की राजधानी रांची से 163 किलोमीटर दूर सिमडेगा जिले के करंगागुड़ी गांव के खपड़े के घर में दस साल की बच्ची बांस के डंडे से किसी गोलाकार वस्तु के साथ खेल रही थी. आंगन में जब वो खेल रही थी, उसे उसकी मां के रोने की आवाज सुनाई पड़ी.
अंदर गई. इस 13 साल की बच्ची के सिर से पिता का साया उठ चुका था. रोने के सिवा शायद कुछ सोचने की क्षमता उस वक्त नहीं थी.
मां की हिम्मत ने उसे दौड़ना सिखाया. ऐसी दौड़ी की 100/60 गज के मैदान पर दौड़ते-दौड़ते भारत को गोल्ड दिया दिया.
ये कहानी है भारतीय सीनियर हॉकी महिला टीम की खिलाड़ी, एशियन चैंपियन दीपिका सोरेंग की.
जोहार शक्ति शृंखला में हम ऐसी कहानियों को आप तक लाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे महिला शक्तियों और उसकी सफलता से आपको परिचित करा सकें.
दीपिका जोहार लाइव से कहती हैं, पिता डेनियल सोरेंग की मृत्यु के बाद मां के ऊपर घर चलाने का जिम्मा आ गया. तीन भाई के साथ मैं सबसे छोटी थी. लेकिन मां ने अकेले मजदूरी करना चुना और वो राउड़केला चली गई. यहां वो दिहाड़ी मजदूरी करने लगी. कभी दिन के 200 तो कभी 300 रुपए. कभी वो भी नहीं.
मैं यहां सिमडेगा के अपने गांव करंगागुड़ी में अपने तीन भाइयों के साथ रह रही थी. गांव के जिस स्कूल आरसी उत्क्रमित मध्य विद्यालय में पढ़ाई करती थी, वहां नियम ही यही था कि बिना हॉकी स्टिक के कोई बच्चा या बच्चियां स्कूल नहीं आ सकती थी.
एक दिन मैं बिना स्टिक के स्कूल चली गई, मुझे तत्काल वापस भेज दिया गया. भला मजदूर मां और मजदूर भाई कहां से स्टिक खरीद पाते. ऐसे में मेरे भाई ने बांस से स्टिक बनाकर दी. मैं लगी खेलने.
मेरे भाई और पिता भी हॉकी के खिलाड़ी थे. मेरे अंदर यह जेनेटिक क्षमता थी. मेरे खेल का स्तर सुधरने लगा. इसी दौरान इलाके के खेल प्रशासक मनोज कोनबेगी की नजर मुझ पर पड़ी. उन्होंने मुझे सिमडेगा डिस्ट्रिक्ट हॉकी सेंटर में दाखिला दिला दिया.
सेंटर की कोच प्रतिमा बरवा की नजर मुझ पर पड़ी. जितनी मेहनत मैं अपने खेल के स्तर को सुधारने के लिए कर रही थी, उससे कहीं ज्यादा प्रतिमा मैम कर रही थी.
एक जरूरी बात की तरफ वो ध्यान दिलाती हैं. दीपिका कहती हैं, सेंटर में रहने का सबसे बड़ा फायदा ये हुआ कि मुझे और मेरे परिवार को खाने-पढ़ाने या हॉकी सिखाने की चिंता या उसके लिए अतिरिक्त प्रयास से मुक्त कर दिया. मैं खुलकर खेलने लगी. अब बस दिमाग में चल रहा था कि किसी तरह स्टेट टीम में शामिल होना है.
मेहनत के बीच मां फ्रिस्का सोरेंग की याद कमजोर तो नहीं कहूंगी, लेकिन रुआंसी जरूर कर देती थी. छुट्टियों में जब मैं मां के पास जाती थीं, तो उन्हें लगातार काम करते, 200 से 400 रुपए के लिए जूझती देख मन दुखी होता था. कैसे इसे इस मजदूरी से बाहर करूं, यही दिमाग में चलता रहता था. लगा, मेहनत बढ़ानी होगी.
स्टेट खेलने लगी. समय आया साल 2019 और मैं इंडिया कैंप में शामिल हो गई.
ठहरिये, भला स्ट्रगल के बिना सफलता नसीब कहां होती है. कैंप में जाते ही दीपिका बीमार पड़ गई और उसे बाहर होना पड़ा.

कोविड में एक वक्त के खाने पर आफत, लेकिन मजबूती फौलाद सी
फिर आया कोविड का समय. बड़े भाई कुलदीप सोरेंग, दीपक एरिक सोरेंग और छोटे भाई अमित सोरेंग और मां फ्रिस्का सोरेंग, सबकी मजदूरी बंद. पीडीएस से मिला चावल और जंगल के कंद-मूल ही सहारा बचे. दीपिका कहती है, इन सब चीजों से एक चीज बढ़ती गई, वो थी मेरी इच्छाशक्ति. खुद को कमजोर होने देने के बजाय मैंने इसे और मजबूत बना लिया.
अब साल आया 2021. मेरी नेशनल जूनियर टीम में वापसी हुई. साल 2023 में महिला जूनियर एशिया कप के लिए चयन हुआ तो दीपिका ने यहां खुद को, अपने सपने को, परिवार को साबित किया. स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय टीम में अहम भूमिका निभाई थी. उसी साल उन्हें हॉकी इंडिया का असुंता लकड़ा पुरस्कार भी मिला था, जो अंडर-21 वर्ग की उभरती महिला खिलाड़ी को दिया जाता है.
दीपिका सोरेंग की मजबूती और निरंतरता को ऐसे मापिये. जब से वो टीम इंडिया में शामिल हुई है, एक बार भी टीम से बाहर नहीं हुई है. करंगागुड़ी गांव से सिमडेगा हॉकी सेंटर लाने वाले हॉकी झारखंड के महासचिव मनोज कोनबेगी कहते हैं, दीपिका की सबसे बड़ी ताकत है उसके लड़ने की क्षमता.
सफलता की सीढ़ी अब दीपिका का इंतजार करने लगी. साल 2024 में सीनियर कैंप में चयन हो गया. कभी बांस की स्टिक से हॉकी खेलने वाली बच्ची, जिसके पास हॉकी स्टिक खरीदने के पैसे तक नहीं थे, वो पहुंच चुकी थी सपनों के उड़ान को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने के लिए.
यहां पहुंचने में खास बात ये रही कि दीपिका बचपन में जिस भारतीय हॉकी खिलाड़ी असुंता लकड़ा के बारे में सुना करती थी. कभी कभार उन्हें खेलता भी देखी थी, जब दीपिका का सीनियर टीम में चयन हुआ, उस वक्त उसकी आइडल असुंता ही चयनकर्ता थी.
बड़ी उपलब्धि कर रही थी इंतजार
लगातार बेहतर प्रदर्शन ने ईनाम दिया और वो मौका आया, जिसके लिए हर नेशनल खिलाड़ी सपना देखता है. दीपिका एशियन चैंपियनशिप के लिए चुनी गई टीम का हिस्सा बन गई.
टीम ने पूरे टूर्नामेंट में धुआंधार प्रदर्शन किया. भारत ने पहले मैच में उज्बेकिस्तान को 19-0 से हराया, फिर इंडोनेशिया को 17-1 और थाईलैंड को 20-1 से मात दी. इसके बाद जापान को 3-1 और सिंगापुर को 7-0 से हराकर टीम ने अपना दबदबा कायम रखा. सेमीफाइनल में भारत ने दक्षिण कोरिया को 2-0 से शिकस्त दी. फाइनल में चीन को 1-0 से हराकर भारत ने 44 साल बाद महिला हॉकी में एशियन गेम्स का स्वर्ण पदक जीता और 2028 ओलंपिक का टिकट भी हासिल किया.
दीपिका कहती हैं कि पहले उन्हें बहुत कम लोग जानते थे, लेकिन अब दुनिया उन्हें पहचानने लगी है. मैदान पर उनके प्रदर्शन के साथ परिवार को भी पहचान मिली है. उन्हें सबसे ज्यादा खुशी इस बात से होती है कि लोग उनकी मां को बताते हैं कि उनकी बेटी अच्छा खेल रही है और देश का नाम रोशन कर रही है.
जापान में टूर्नामेंट जीतने के बाद दीपिका फिलहाल रांची में अपने परिवार के साथ समय बिता रही हैं. जिस वक्त हमारी बात हुई, वो रूटीन चेकअप के लिए अपनी मां को डॉक्टर के पास ले जा रही थी.
दीपिका फिर तैयार हो रही है. आगामी 25 अक्टूबर को उन्हें बेंगलुरु लौटना है, जहां भारतीय टीम का अभ्यास फिर शुरू होगा. अब उनका ध्यान 2028 ओलंपिक की तैयारी पर है.
पिता की मृत्यु ने मजबूत बनाया. मां की मजदूरी ने चट्टान बना दिया. जाहिर है, सफलता को ऊंचा स्वर मिलना ही था.

